किसानों को बदनाम करना आसान नहीं!

एक तरफ तो केंद्र सरकार किसानों से बातचीत कर रही है। कह रही है वह अहंकारी नहीं है और खुल मन से किसानों की बात सुन कर उनकी आपत्तियों का जवाब दे रही है। किसानों को खाना-पीना ऑफर कर रहे है, जिसे उन्होंने नहीं स्वीकारा। दूसरी ओर पूरी ताकत से किसान आंदोलन की साख बिगाड़ने का अभियान चलाया जा रहा है। इसमें भारतीय जनता पार्टी सीधे शामिल है और संभव है कि सरकार की भी मशीनरी शामिल हो। आखिर यह पहली बार हुआ कि पार्टी की आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने एक किसान नेता पर पुलिस के लाठी चलाने की हकीकत बदलने के लिए फोटोशॉप किया हुआ फोटो पोस्ट किया और ट्विटर ने उसे फ्लैग करते हुए मैनिपुलेटड पोस्ट बताया।

यह सिर्फ एक मिसाल है, जिससे पता चल रहा है कि पार्टी की ओर से किसान आंदोलन की साख बिगाड़ने के लिए क्या क्या किया जा रहा है। मुंबई से बात बात में कंट्रोवर्सी खड़ी करने वाली एक अभिनेत्री को भी उतारा गया, जिसने पंजाब की एक बुजुर्ग महिला किसान महेंदर कौर को शाहीन बाग के आंदोलन की दादी यानी बिलकिस बानो बता दिया और ट्विट कर दिया कि सौ-सौ रुपए में ये महिलाएं आंदोलन में पहुंच रही हैं। पार्टी के पढ़े-लिखे, बौद्धिक और समझदार नेता भी आंदोलन में खालिस्तानी, मुसलमान, टुकड़ा-टुक़ड़ा गैंग पर संदेह में साजिश देख रहे हैं। किसी को लग रहा है कि इस आंदोलन को खालिस्तान का समर्थन है तो किसी को लग रहा है कि पंजाब के आढ़तिए अपना कारोबार बचाने के लिए आंदोलन को हवा दे रहे हैं तो किसी को लग रहा है कि पंजाब की कांग्रेस सरकार और कांग्रेस पार्टी आंदोलन भड़का रही है।

खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ऐसा लग रहा है कि विपक्ष किसानों को गुमराह कर रहा है और आंदोलन भड़का रहा है। पार्टी के बड़े नेताओं ने कहा है कि यह आंदोलन देश के विरोध में है और दिल्ली की सीमा पर, हाईवे पर दूसरा शाहीन बाग बनाया जा रहा है। भाजपा के केंद्रीय मंत्री किसानों से बात कर रहे होते हैं और भाजपा के नेता टेलीविजन चैनलों में बैठ कर यह बता रहे होते हैं कि किसानों का आंदोलन सीएए पार्ट टू यानी नागरिकता कानून के विरोध के आंदोलन का पार्ट टू बनता जा रहा है। वे इसे टुकड़े टुकड़े गैंग के साथ भी जोड़ रहे हैं तो इसमें पाकिस्तान की साजिश भी देखी जाने लगी है।

सोचें, क्या किसी भी सभ्य समाज में किसी लोकतांत्रिक आंदोलन के मामले में ऐसा सोचा जा सकता है? लेकिन अफसोस की बात है कि भारत में पिछले छह साल से हर आंदोलन को इसी नजरिए से देखा जा रहा है, जैसे सरकार की नीति पर सवाल उठाने वाला हर आंदोलन देशद्रोह है। इसी अंदाज में संशोधित नागरिकता कानून यानी सीएए विरोधी आंदोलन को ब्रांड किया गया था। पर किसानों के आंदोलन को उस तरह से ब्रांड करना मुश्किल हो रहा है। किसानों को विलेन ठहराने में भाजपा के नेता कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। मीडिया और सोशल मीडिया में तमाम झूठे-सच्चे वीडियो और फोटो प्रसारित करने के बावजूद किसान को विलेन के रूप में पेश करना संभव नहीं हो रहा है।

किसानों को विलेन बनाना इसलिए मुश्किल हो रहा है क्योंकि वे किसान हैं और उनका कोई गुप्त एजेंडा नहीं है। दूसरे, उन्हें अपने प्रदेश और पूरे समुदाय का साथ मिला हुआ है। केंद्र सरकार ने अलग अलग राज्यों के किसान संगठनों को बुला कर उनसे बात करने और किसान एकता को तोड़ने का भी प्रयास किया था पर किसानों ने इसे फेल कर दिया। उन्होंने इसे न तो सिख किसानों का मुद्दा बनने दिया और न पंजाब के किसानों का। यह जितना सिखों का है उतना ही गैर सिखों का है, जितना पंजाब का है, उतना ही हरियाणा और उत्तर प्रदेश, राजस्थान के किसानों का है। पंजाबी सिंगर और पंजाबी फिल्मों के हीरो-हीरोइन किसानों के समर्थन में खुल कर उतरे तो हरियाणावी सिंगर और अभिनेता भी खुल कर उनके समर्थन में आए।

मुश्किल इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय आईकॉन स्तर के खिलाड़ियों ने पूरी ताकत से किसानों का समर्थन किया। पंजाब और हरियाणा के ओलंपिक पदक जीतने वाले और बड़े पुरस्कार हासिल करने वाले खिलाड़ी किसानों के समर्थन में आए। राष्ट्रीय मीडिया भले किसानों को विलेन बनाने के प्रयास में लगा रहा पर क्षेत्रीय मीडिया पूरी तरह से किसानों के साथ खड़ा रहा। पंजाब और हरियाणा दोनों जगह के किसान चूंकि आर्थिक रूप से सक्षम हैं और उन्हें पूरे समुदाय की मदद हासिल है इसलिए वे किसी चीज के लिए मोहताज नहीं हैं। सो, उन्हें तंबू गाड़ कर ठंड में हाईवे को घर बनाने या लंगर लगाने के लिए किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ी। वे खुद यह काम करते रहे और रियल टाइम में हर किस्म के प्रोपेगेंडा का जवाब देते रहे। एक तरफ से पंजाब के सिख किसानों ने कमान संभाली तो दूसरी ओर से हरियाणा के योगेंद्र यादव और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राकेश टिकैत के संगठन भी किसानों के साथ डटे रहे। इसका नतीजा यह हुआ कि इसे एक रंग में रंगने का प्रयास नाकाम हो गया। गड़बड़ी करने वालों को किसान खुद ही पकड़ कर पुलिस के हवाले करने लगे। सो, लग नहीं रहा है कि इस आंदोलन के किसानों को सीएए विरोध की तरह या जेएनयू के छात्र आंदोलन के विरोध की तरह विलेन बनाया जा सकेगा।

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