आंदोलन, टकराव के कई संकेत - Naya India
हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप| नया इंडिया|

आंदोलन, टकराव के कई संकेत

घमासान राजनीतिक लड़ाई के संकेतों के अलावा सरकार का नागरिक संगठनों से टकराव रहेगा तो विपक्ष से भी। संसद का बजट सत्र शुरू होने के साथ इसके संकेत मिल गए है। बजट सत्र में विपक्ष ने राष्ट्रपति के अभिभाषण का बहिष्कार किया। हाल-फिलहाल की राजनीति में यह पहली बार हुआ है कि विपक्ष की 18 पार्टियों ने राष्ट्रपति के अभिभाषण का विरोध और बहिष्कार किया। किसान आंदोलन के प्रति एकजुटता दिखाने और संसद के पिछले सत्र में राज्यसभा से जोर-जबरदस्ती कृषि विधेयकों को पास कराने के विरोध में विपक्षी पार्टियों ने यह स्टैंड लिया।

ध्यान रहे राष्ट्रपति का भाषण संसदीय परंपरा का हिस्सा होता है और एक किस्म की औपचारिकता होती है, जिसका कोई खास राजनीतिक मतलब नहीं होता है। राष्ट्रपति के अभिभाषण में सिर्फ सरकार की उपलब्धियों का गुणगान होता है, जो वैसे भी प्रधानमंत्री हर दिन करते रहते हैं। शुक्रवार के अभिभाषण में शायद ही कोई ऐसी बात थी, जो गुरुवार को प्रधानमंत्री ने दावोस सम्मेलन को संबोधित करते हुए नहीं कही थी। इसके बावजूद राष्ट्रपति के अभिभाषण का बहिष्कार बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम है। यह पक्ष-विपक्ष में भरोसा कम होने और टकराव बढ़ने का संकेत है। नए साल के पहले महीने में ही इस किस्म का टकराव इस बात का संकेत है कि विपक्ष अपना तेवर नहीं छोड़ेगा और सरकार अपनी जिद नहीं छोड़ेगी।

इसी तरह अंदाजा लगाया जा रहा था कि किसानों का आंदोलन नए साल में खत्म हो जाएगा। गणतंत्र दिवस से पहले आंदोलन खत्म होने की पूरी संभावना थी। लेकिन उसके बाद उलटा आंदोलन और तेज हो गया। गणतंत्र दिवस के दिन किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान पुलिस और किसानों के बीच झड़प हो गई, जिसके बाद टकराव और बढ़ गया। इस झड़प को लेकर जिस किस्म का माहौल बना है और सरकार ने जैसी प्रतिक्रिया दी है उससे ऐसा लग रहा है कि किसानों के साथ सरकार के संबंधों में एक स्थायी गांठ पड़ गई है। पुलिस के साथ झड़प में कुछ  पुलिसकर्मी घायल हुए थे तो बड़ी संख्या में किसान भी घायल हुए, लेकिन सरकार की ओर से इस बारे में सहानुभूति का एक शब्द नहीं कहा गया। गृह मंत्री घायल पुलिसकर्मियों से मिलने गए पर न तो उन्होंने, न कृषि मंत्री ने और न प्रधानमंत्री ने किसानों के बारे में कुछ कहा। उलटे इस झड़प को बहाना बना कर किसानों पर कार्रवाई की तैयारी हो गई। इससे ऐसा लगा कि सरकार ने अपने ही देश के लोगों को अपना दुश्मन मान लिया है।

केंद्र सरकार संशोधित नागरिकता कानून, सीएए को लेकर दुविधा में है। उसे लग रहा है कि इसके नियमों को अधिसूचित करके लागू किया गया तो हो सकता है कि पश्चिम बंगाल में कुछ फायदा हो पर असम में इसका नुकसान हो सकता है। इसलिए सरकार इसमें देरी कर रही है पर असम की कई राजनीतिक पार्टियों व सामाजिक संगठनों ने सीएए के विरोध में दोबारा आंदोलन शुरू कर दिया है। कोरोना वायरस के संक्रमण की वजह से आंदोलन रोक दिया गया था पर अब फिर से इसे चालू किया गया है। सो, सरकार इसके नियम बना कर इसे लागू करे या न करे असम में यह आंदोलन चलता रहेगा। अगर सरकार इसके नियम बना कर इसे लागू करती है तो आंदोलन तेज होगा।

सामाजिक सरोकारों और आंदोलनों के साथ साथ टकराव का एक मुद्दा वाक-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाई जा रही पाबंदियां भी हैं। वेब सीरिज ‘तांडव’ पर जिस किस्म की प्रतिक्रिया हुई है या स्टैंडअप कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी की गिरफ्तारी को लेकर जिस तरह के कदम उठाए गए हैं वह नागरिक समजाज के लिए चिंतादायी  हैं। इन दोनों मामलों में अदालतों का रुख सबसे ज्यादा हैरान करने वाला है। ऐसे ही एक गलत ट्विट करने पर पत्रकार के ऊपर पाबंदी लगाने, वेतन काटने और पुलिस की ओर से राजद्रोह का केस किए जाने की घटना भी बेहद चिंताजनक है। सो, तय मानें कि सामाजिक सरोकार के मुद्दों और बोलने की आजादी वगैरह को लेकर भी टकराव बढ़ सकता है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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