हिंदू चाहते हैं गुलामी!

यदि नरेंद्र मोदी जनमत संग्रह करा कर पूछें कि लोग उन्हें क्या उम्रपर्यंत निरंकुश राष्ट्रपति चाहेंगे तो अपना मानना है कि लोग भारी बहुमत से ठप्पा लगा कहेंगे कि भगवन, हमारे मन की चाहना है कि जब तक बैकुंठ न जाएं तब तक आप भारत राष्ट्र-राज्य के सर्वशक्तिमान रक्षक बने रहें। आप हमारे भगवान और हम आपके अनुयायी। भगवान व अनुयायी या मालिक-गुलाम का हिंदू दिमाग में विशेष फर्क नहीं है। हजार साल गुलामी में जीवन जीते हुए औसत हिंदू के दिमाग में ये बीज गहरे-पुराने हैं कि अपने जो राजा थे, वे अच्छे थे। मैं आजादी पूर्व की पीढ़ी से मेवाड़ के राजे-रजवाडों की अच्छाइयों के किस्से खूब सुना करता था। यह भी बहुत सुना कि अंग्रेज अच्छे थे, उनका राज अच्छा था। इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के अनुशासन पर्व की बात भले विनोबा भावे ने कहीं हो लेकिन आम हिंदू भी उस तानाशाही के फायदे गिनाता मिलता था।

इसलिए नरेंद्र मोदी यदि हिंदुओं से आह्वान करें कि मैं तानाशाह बनना चाहता हूं, जीवन भर के लिए राष्ट्रपति बन रहा हूं तो हिंदू बेताबी से ठप्पा लगा कहेंगे हुजूर जल्दी कीजिए। हम तो कब से मरे जा रहे हैं।

निश्चित ही मेरे पाठकगण मेरी सोच से सहमत नहीं होंगे। लेकिन भारत राष्ट्र-राज्य की व्यवस्था और नागरिकों के व्यवहार को 45 साल से अनुभव करते हुए हिंदू बुद्धि पर जितना अपना सोचना बढ़ रहा हैं उसका लब्बोलुआब है कि हिंदू की बुद्धि बुनियादी तौर पर सत्ता, पॉवर की गुलाम है। वह सत्ता-पॉवर से इतर कुछ सोच नहीं सकती है। सब कुछ सत्ता-पॉवर में केंद्रित और उससे आश्रित हैं। हिंदू का निज दमखम, बुद्धि बल जीरो है। वह राजा से ही सुरक्षा मानता हैं। 21वीं सदी का हिंदू इस्लाम की चुनौती में यदि उद्वेलित है तो लंगूरी फौज चाहे जितनी चिल्लपौं करे वह पूरी तरह पुलिस और फौज पर आश्रित है। मतलब पेरिस में एक कार्टूनिस्ट याकि गैर-मुस्लिम की स्वतंत्रता के लिए जनता जैसे सड़कों पर उतरी थी, उससे फिर जनमानस के दबाव में सरकार ने जैसा दो टूक स्टैंड लिया था वैसा जन दबाव हिंदू के बस की बात नहीं है।

तभी हिंदू की बेसिक चाहना, हजार साला गुलामी के अनुभव, डर, खौफ की कुंद-मंद बुद्धि में बेसिक सोच हिंदू मर्द राजा की है। वह अपनी रक्षा में, अपनी सोच में निर्भय, स्वंयस्फूर्त स्वतंत्रचेता, क्रांतिकारी, विद्रोही हो ही नहीं सकता। उसकी जान पर आ पड़े तब भी हिंदू में सवाल पूछने की हिम्मत नहीं होगी। यदि साहस, हौसला, हिम्मत होती तो हजार साला लंबी गुलामी में कैसे रहा हुआ होता? सोचें, वर्ष 1918-20 के वक्त की महामारी और सन् 2020 के वक्त की महामारी में हिंदू व्यवहार की क्या समानता है? दोनों ही स्थितियों में सरकार की लापरवाही, रामभरोसे के समान भाव को हिंदू बरदाश्त करता हुआ है। तब भी लोगों के बेमौत मरने, लाशों के कंकाल बन जाने की बातें सुनी गईं और ताजा सुनी खबर है कि इंदौर के अस्पताल में कई दिनों से वायरस की शिकार लाश को चुहे कुतर गए!

यह सब हिंदू के लिए अचेतन, गुलाम मनोभाव में सहनीय है। उसका ऐसे ही जीने का सदियों का अनुभव है। रामजी जैसे रखेंगे, राजा जैसे चाहेंगे वैसे रह लेंगे की मनोदशा वाले हिंदुओं के बीच इंदिरा गांधी की गलती थी, जो उन्होने इमरजेंसी लगाई। बिना इमरजेंसी के ही जब नरेंद्र मोदी ने लोकतंत्र को लॉकडाउन करने का अनुभव करा दिया है, ताला लगा हुआ है तो यह हिंदू मानस के लिए गौरव की, खास काबलियत, करिश्मे वाली बात है। वाह क्या मर्द नेता हैं नरेंद्र मोदी। जो चाहे करा ले रहे हैं तो इसके सम्मोहन में हिंदू वह सब करेगा जो नरेंद्र मोदी चाहेंगे।

इसलिए न नरेंद्र मोदी को चिंता करनी चाहिए और न उन हिंदुवादियों को जो सोचते हैं कि लोकतंत्र की जगह पुतिनशाही लाना हिंदुओं को जंचेगा या नहीं? फिर सबसे बड़ी बात हिंदू की बुद्धि में यह सब सोचने की गुंजाइश कहां है? यों भी नरेंद्र मोदी की जादुई कलाओं, लगूंरी सेना के उस्तरों, नैरेटिव के आगे बुद्धि को न फुरसत है और न होगी। इसलिए जो करना है करें, और दबा कर करें!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares