कितनी तरह के डर से घिरे भारतीय?

कोरोना के संकट का समय चल है और दुनिया के किसी भी सभ्य और विकसित देश के शायद ही लोग इस बात पर आगे यकीन करेंगे कि भारत में डर की वजह से लोग कोरोना जैसी बीमारी छिपाते है। सवाल है कि आखिर लोग किस बात से डर रहे थे? उन्हें कई किस्म के डर थे। पहला डर अस्पतालों का था। उन्हें पता है कि इस देश में अस्पताल लूट के अड्डे हैं। एक बार अगर कोई व्यक्ति अस्पतालों के चक्कर में पड़ा तो उसे हो सकता है कि सालों तक मुक्ति न मिले। ऊपर से कोरोना के बीच अस्पतालों ने बीमारी की आपदा को अवसर बना लिया। हजारों-लाखों के बिल बनाने लगे। इस डर से लोगों ने बीमारी छिपाई। सरकारी अस्पतालों के कुप्रबंधन से भी लोग परिचित थे इसलिए उसका भय अलग था। उनको लगता था कि एक बीमारी के इलाज के लिए सरकारी अस्पताल में भरती हुए तो पता नहीं कितनी और बीमारियां पकड़ेंगी।

कोरोना के मरीजों को एक डर सामाजिक बहिष्कार का अलग था। जैसे ही किसी के कोरोना संक्रमित होने की खबर आती थी पूरा मोहल्ला या गांव उसको और उसके परिवार को ऐसे संदेह की नजर से देखने लगता था कि वह अपमान किसी बीमारी से मर जाने से ज्यादा था। इस वजह से भी लोगों ने टेस्ट कराने और अपनी बीमारी का पता लगाने की बजाय घर में बंद होकर काढ़ा आदि पीकर अपने को ठीक करने का ज्यादा प्रयास किया। अस्पताल में खर्च का डर, सरकारी अस्पताल में खराब सुविधाओं का भय और सामाजिक बहिष्कार का भय यह कोरोना की बीमारी का भारत का सच कम गंभीर नहीं है। यह सच भी भारत की आजादी के बाद जैसा समाज और जैसी व्यवस्था अपने यहां बनी है उसी का आईना है।

कोरोना का वायरस तो अभी आया है पर डर का वायरस पहले से लोगों के दिल-दिमाग में बैठा हुआ है। वह डर कई तरह का है। लोग पुलिस से डरते हैं, अदालतों से डरते हैं, अस्पतालों से डरते हैं, नगर निगमों के कर्मचारियों से डरते हैं, नेताओं से डरते हैं, तमाम तरह की जांच एजेंसियां अलग तरह का खौफ पैदा किए रहती हैं, जिस तरह से जंगल में छोटे-छोटे जानवर  बड़े और शक्तिशाली जानवरों के खौफ में रहते हैं उसी तरह देश का आम नागरिक 24 घंटे किसी न किसी खौफ में रहता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि देश में कानून के राज को मजबूत नहीं किया गया। संस्थाओं के प्रति लोगों में भरोसा नहीं पैदा किया गया। गुणवत्ता और काबिलियत को प्राथमिकता नहीं दी गई। यहां माईबाप सरकार बनाई गई, जिसके डंडे से सारी एजेंसियों को हांका जाता है और फिर वहीं एजेंसियां अपने डंडे से नागरिकों को हांकती हैं।

यहां छोटे से छोटे व्यक्ति से लेकर बड़े ताकतवर लोगों को अपने साथ अन्याय होने का भय रहता है। सत्ता की नजर टेढ़ी हुई तो बड़े से बड़ा उद्योगपति सड़क पर आ जाता है और बड़ा से बड़ा नेता जेल में होता है। यह इस व्यवस्था का कमाल है कि अनगिनत लोग बैंक लूट कर और देश के करोड़ों लोगों को अरबों रुपए का चूना लगा कर फरार हो गए और दूसरी ओर ईमानदारी से काम करने वाले लोग थानों में या एजेंसियों के चक्कर लगा रहे हैं। ईमानदारी से काम करने वालों को भी भय रहता है कि कहीं आय कर विभाग का नोटिस न आ जाए, कहीं नगर निगम वाले नोटिस न भेज दें, कहीं पुलिस न दरवाजा खटखटा दे। सब कुछ ठीक होने के बावजूद इस बात का डर लगा रहता है कि एक बार किसी एजेंसी के चक्कर में फंसे तो महीनों, सालों लग सकते हैं उससे निकलने में। आम लोगों में इस बात का डर रहता है कि कहीं बिजली, पानी का बिल न ज्यादा आ जाए। क्योंकि अगर बिजली, पानी के बिल ज्यादा आ गए तो उन्हें ठीक कराना हिमालय पर चढ़ने की तरह होता है। और उसमें ज्यादा संभावना इस बात की रहती है कि एक बार कनेक्शन कटेगा, भले उसके बाद बिल ठीक हो।

भारत में सरकार ने सूचना के अधिकार कानून के तहत सवाल पूछने और जवाब मांगने का हक दिया है पर इस कानून का इस्तेमाल करने वाले सैकड़ों आरटीआई कार्यकर्ता अब तक देश में मारे जा चुके हैं। सूचना अधिकार का इस्तेमाल कर खबर निकालने और लिखने वाले पत्रकारों पर हमले हुए हैं और कई लोग उसमें मारे गए हैं। तभी भारत में व्यवस्था से साधारण से सवाल पूछने के लिए लोगों को बड़े साहस की जरूरत होती है। कितने लोग यह साहस जुटा पाते हैं? यह भारत की हकीकत है कि यहां आरटीआई कार्यकर्ताओं को सवाल का जवाब मिलने से पहले सवाल उन लोगों तक पहुंच जाते हैं, जिनके हितों को उससे चोट पहुंचती हो। इस भय से अब लोगों ने सवाल पूछना बंद कर दिया है। अब पत्रकार आरटीआई के जरिए सूचना निकाल कर खबरें नहीं लिखते हैं क्योंकि इससे नौकरी जाने का खतरा है और जान भी बन सकती है।

सूचना अधिकार की तरह ही भारत में सरकार ने रोजगार की गारंटी दी हुई है पर अपने रोजगार को लेकर दुनिया में सबसे ज्यादा डर भारत के लोगों में होता है। हर आदमी इस बात को लेकर हमेशा डरा रहता है कि उसकी नौकरी न चली जाए या काम धंधा न बंद हो जाए। यहां लोग नौकरी बचाने में लगे रहते हैं, जिसकी वजह से कुछ भी मौलिक नहीं कर पाते हैं। कोरोना वायरस और इस सरकार की खराब आर्थिक नीतियों ने लोगों को रोजगार और नौकरी के मोर्चे पर और कमजोर बनाया है। करोड़ों की संख्या में लोगों की नौकरियां गई हैं।

जिन लोगों के लिए प्रधानमंत्री ने पकौड़ा को रोजगार बताया था या गृह मंत्री ने कहा था कि सरकार ने आठ करोड़ लोगों को स्वरोजगार दिया है उनमें से ज्यादा का रोजगार खत्म हो गया है। ऐसे स्वरोजगार करने वाले सबसे ज्यादा डर डर कर काम करते हैं। इस कोरोना के संकट के बीच इंदौर से लेकर लखनऊ और दिल्ली से लेकर बेंगलुरू तक से एक जैसी तस्वीरें और वीडियो देखने को मिले। सैकड़ों जगहों से सड़क पर ठेला, रेहड़ी, खोमचा पलटते हुए पुलिस की वीडियो आई। यह भारत में छोटे-छोटे काम करने वाले लोगों का स्थायी डर है। लोग रोज सुबह अपना हाथ रिक्शा, ई रिक्शा, पानी का ठेला, पकौड़े का खोमचा, सब्जी की रेहड़ी लेकर निकलते हैं तो इस डर में रहते हैं कि कहीं पुलिस वाले पीट कर ठेला न पलट दें या रिक्शा न छीन लें। उन्हें पुलिस वालों से लेकर नगरपालिका के अधिकारियों, कर्मचारियों तक को हफ्ता देना होता है तब जाकर वे सड़क के किनारे खड़े हो पाते हैं। कोरोना रोकने के लिए लागू दिशा-निर्देशों ने पुलिस और नगरपालिकाओं के कर्मचारियों को ठेला पलटने का लाइसेंस अलग से दे दिया है।

भारत में डर का दायरा इतना व्यापक है, जितना पूरा ब्रह्मांड है। कोई अपने को सुरक्षित नहीं मान सकता है। बाहर निकले तो जबरदस्ती अपराधी बता कर लिंच किया जा सकता है, फिर भले आप साधु क्यों न हों। अगर कोई अपराधी पकड़ा जाता है तो उसे कानून और अदालत तक पहुंचने से पहले इस बात का भय रहता है कि कहीं मुठभेड़ के नाम पर उसकी हत्या न कर दी जाए! सो, साधु हो या अपराधी, छोटे बच्चे हों या बड़े उद्योगपति सब किसी न किसी तरह के डर में जी रहे हैं।

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