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Monday, May 10, 2021
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कांग्रेस की राजनीति का अहम मुकाम

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हरिशंकर व्यासhttp://www.nayaindia.com
भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था।आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य।संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

जाता हुआ साल कांग्रेस पार्टी की राजनीति को एक अहम मुकाम पर ले आया है। कांग्रेस में पहले से बहुत कुछ बदल रहा था या बदलने का प्रयास किया जा रहा था। किसी दूसरी पार्टी या संस्थान के मुकाबले कांग्रेस में संक्रमण का काल थोड़ा लंबा चल गया और ऐसा अहमद पटेल की वजह से हुआ, जिनकी राजनीतिक सक्रियता से सोनिया गांधी की राजनीति चलती रही और राहुल गांधी को पीछे रहना पड़ा। परंतु अहमद पटेल के निधन के साथ अचानक सब कुछ बदल गया है। अब गांधी-नेहरू परिवार और पार्टी के बीच कोई बफर नहीं है। और यहीं कारण है कि पिछले 20 साल में कांग्रेस की राजनीति का यह सबसे अहम मुकाम है। अब यहीं से तय होगा कि कांग्रेस का आगे भविष्य क्या होगा। वैसे भी कांग्रेस में पुरानी पीढ़ी रिटायर हो गई है या पुराने नेताओं का निधन हो गया है। हाल में कांग्रेस के तीन और दिग्गजों- प्रणब मुखर्जी, तरुण गोगोई और मोतीलाल वोरा का निधन हुआ। जनार्दन द्विवेदी, ऑस्कर फर्नांडीज जैसे नेता लगभग रिटायर हो चुके हैं। इसके बाद की पीढ़ी के नेता भी आखिरी राजनीतिक पारी खेल रहे हैं।

सो, अब तक इंदिरा और राजीव गांधी के समय राजनीति में चमके नेताओं पर आश्रित रही कांग्रेस पार्टी अब उनके साये से मुक्त हो रही है। दूसरी अहम बात यह है कि सोनिया गांधी ने इंदिरा और राजीव गांधी के समय बनी टीम से काम चलाया था। उन्होंने अपनी कोई ऐसी टीम नहीं बनाई थी, जिसके ऊपर वे राहुल और प्रियंका की जिम्मेदारी छोड़ते। जैसे भारतीय क्रिकेट के बारे में कहा जाता है कि सौरव गांगुली ने दुनिया की बेहतरीन टीम बना कर महेंद्र सिंह धोनी को सौंपी थी, जिसके दम पर वे क्रिकेट के दो फॉर्मेट का विश्व कप जीते लेकिन धोनी ने वैसी टीम विराट कोहली के लिए नहीं छोड़ी। वैसे ही कांग्रेस में इंदिरा, राजीव और संजय गांधी ने मजबूत, लोकप्रिय, भरोसेमंद और बड़े नेताओं की टीम छोड़ी थी, जिसके दम पर सोनिया ने 20 साल राजनीति की, जिसमें दस साल केंद्र में कांग्रेस की सरकार रही और एक समय 14 राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनी।

कांग्रेस के लिए अफसोस की बात रही कि इतनी लंबी अवधि में सोनिया गांधी ने नेताओं की ऐसी टीम नहीं तैयार की, जो राहुल-प्रियंका के साथ खड़ी रहे। यह एक अजब संयोग है कि सोनिया के समय के जो नेता इस समय और बड़े होते या राहुल-प्रियंका की ताकत होते उन सबका असमय निधन हो गया। माधव राव सिंधिया, राजेश पायलट, वाईएसआर रेड्डी, दोरजी खांडू आदि सबका किसी न किसी दुर्घटना में निधन हो गया। बहरहाल, चाहे जिस कारण से हो पर जब राहुल गांधी राजनीति में आए तो उन्हें या तो बड़े नेताओं के बेटे मिले या ऐसे पुराने नेता मिले, जिनके साथ तालमेल बैठाना उनके लिए मुश्किल था। यह भी संयोग है कि राहुल गांधी ने जो टीम बनाई या जिन पर भरोसा किया उनमें से अनेक लोग पार्टी छोड़ कर चले गए या राजनीति की कसौटी पर खरा नहीं उतरे। हो सकता है कि ऐसा पुरानी पीढ़ी के नेताओं के अत्यधित हस्तक्षेप की वजह से हुआ हो।

बहरहाल, अब राहुल और प्रियंका के पास मौका है कि वे अपनी टीम के साथ अपने हिसाब से राजनीति करें। अब ज्यादातर राज्यों में पुराने नेता रिटायर हो गए हैं या रिटायर होने वाले हैं। इस समय अगर कांग्रेस पार्टी नहीं संभलती है और अगले पांच-दस साल के विजन के साथ संगठन नहीं तैयार करती है तो उसके लिए बहुत मुश्किल होगी। अभी समय है कि सोनिया गांधी अपनी देख-रेख में राहुल और प्रियंका की टीम बनवाएं और कांग्रेस का लंबे समय से चल रहा संक्रमण काल खत्म कराएं। सोचें, कांग्रेस का संक्रमण काल 2015 में राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाने के समय से चल रहा है। अब उनके पास 15 साल की सक्रिय राजनीति का अनुभव है और वे चौथी बार लोकसभा के सांसद बने हैं।

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