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सरकार को सच बताना चाहिए

चीन के सैनिकों ने नौ दिसंबर 2022 को अरुणाचल प्रदेश में घुसपैठ की कोशिश की। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद के दोनों सदनों में इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि चीन ने एकतरफा तरीके से यथास्थिति बदलने का प्रयास किया, जिसे भारतीय सैनिकों ने बहादुरी के साथ असफल कर दिया। ऐसे बयान पहले भी जारी होते रहे हैं। सवाल है कि चीन हर बार यथास्थिति बदलने का प्रयास क्यों और कैसे करता है? वह सीमा पर हर बार विवाद का नया बिंदु पैदा करता है और फिर दोनों देशों के सैन्य कमांडर उसे सुलझाने में लग जाते हैं। वह भारत को कोई डेढ़ दर्जन इलाकों मे उलझाए हुए है। भारत क्यों नहीं पलटवार करता है? भारत क्यों नहीं इस तरह से उसकी सीमा के भीतर विवाद के बिंदु बनाता है? उसके कब्जाए हुए अपने इलाकों को वापस हासिल करने की पहल करता है? भारत क्यों हर समय रक्षात्मक बना रहता है और देश के नागरिकों को हकीकत क्यों नहीं बताता है?

सोचें, नौ दिसंबर 2022 को चीन ने घुसपैठ की कोशिश की, लेकिन इसका खुलासा तीन दिन बाद 11 दिसंबर को हुआ। सरकार ने 12 दिसंबर को संसद में जवाब दिया। घटना के अगले ही दिन क्यों नहीं इस बारे में देश को बताया गया है? उससे भी अधिक हैरान करने वाली बात है जो  संसद में सरकार के बयान के बाद एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें भारतीय सैनिक चीन के सैनिकों से लड़ते और उन्हें खदेड़ते दिखाई दे रहे हैं। समूचा सोशल मीडिया और टेलीविजन न्यूज चैनल इस वीडियो पर पागल हो गए। उन्होंने ऐसे दिखाया, जैसे यह वीडियो नौ दिसंबर का हो। लेकिन बाद में पता चला कि यह पुराना वीडियो है। सरकार चुप्पी साधे रही जबकि फैक्ट चेक करने वाले पत्रकारों व वेबसाइट्स ने बताया कि यह 2021 का वीडियो है।

मतलब यह कि 2021 में भी ऐसी घटना हुई थी और उस समय किसी को इस बारे में बताया ही नहीं गया था! अभी की घटना बता कर पुराना वीडियो वायरल कराने और उस पर चुप्पी साधे रखने का क्या मतलब है? सरकार क्यों भला जनता को बरगलाना चाहती है?

ध्यान रहे 2020 में जब पूर्वी लद्दाख में विवाद हुआ और जून में गलवान घाटी में हिंसक झड़प हुई तो उसके बाद प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय बैठक बुलाई। उसमें कहा गया कि भारत की सीमा में न कोई घुसा है और न कोई घुस आया है। हकीकत इसके उलट है, दिखती हुई है। सेटेलाइट की तस्वीरों के हवाले कई सामरिक विशेषज्ञों का दावा है कि चीन ने भारत की जमीन कब्जा की है। उसने भारत को पुराने पेट्रोलिंग प्वाइंट से पीछे किया है। अभी भी केंद्रीय गृह मंत्री का कहना था कि जब तक नरेंद्र मोदी की सरकार है, तब तक कोई एक इंच भी भारत की जमीन कब्जा नहीं कर सकता। ये अच्छी बात है। लेकिन नागरिकों को सच बताया जाना चाहिए। सरकार नागरिकों को सच नहीं बताती, जिससे चीन का हौसला बढ़ता है। उसको लगता है कि सरकार सीमा की सुरक्षा से ज्यादा अपने लोगों के बीच अपनी इमेज को लेकर चिंतित है। इसलिए वह अपने नागरिकों को भी सच नहीं बताएगी। इससे उसको भारत की जमीन में घुसने और कब्जा करने का हौसला मिलता है।

नौ दिसंबर की घटना को ही लें, उसके बारे में कितनी तरह की बातें प्रचार में हैं। सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि छह सौ चीनी सैनिक आए थे। दूसरे सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि दो सौ चीनी सैनिक आए थे। सूत्रों के हवाले से खबर है कि 34 भारतीय सैनिक घायल हुए। कुछ सूत्र बता रहे हैं कि छह भारतीय सैनिक घायल हुए। इस बीच सरकार ने संसद में कहा कि कोई भारतीय जवान शहीद नहीं हुआ है और न गंभीर रूप से घायल है। फिर एक मीडिया रिपोर्ट आई कि जब कोई गंभीर रूप से घायल नहीं हुआ है तो छह दिन से जवान अस्पताल में क्यों भर्ती हैं? भारत के जवानों की बहादुरी पर किसी को संदेह नहीं है। उन्होंने चीन के सैनिकों को खदेड़ दिया होगा। वीडियो चाहे 2021 का हो पर उससे भारतीय जवानों की वीरता का पता चलता है। लेकिन सरकार की क्या जिम्मेदारी है? क्या सरकार को इस बारे में विस्तार से सारी जानकारी नहीं देनी चाहिए? क्या खुद ही सरकार को नहीं बताना चाहिए था कि कितने चीनी सैनिक आए थे, कितने भारतीय सैनिक थे और कितने भारतीय सैनिक घायल हुए? सरकार ईमानदारी से इस बारे में सारी जानकारी देती तो उसकी विश्वसनीयता बनती और लोगों को भी गर्व होता। चीन भी सबक लेता।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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