किसी भ्रम में रहने की जरूरत नहीं है

किसी भी देश के राजनीतिक नेतृत्व का तकनीकी मामलों से अपरिचित होना और किसी प्राकृतिक-कृत्रिम आपदा के वास्तविक खतरे को नहीं समझ पाना सामान्य सी बात होती है। पर जिन लोगों के ऊपर उस आपदा से लड़ने की जिम्मेदारी हो वे नासमझी दिखाएं या लापरवाही करें या किसी तरह का भ्रम पैदा करें तो यह बहुत गंभीर और खतरनाक बात होती है। मिसाल के तौर पर डोनाल्ड ट्रंप की लापरवाही और उनका अज्ञान समझ में आता है पर डॉक्टर एंथनी फोची अगर वहीं गलती करें तो यह अक्षम्य है। ऐसे ही अगर भारत के प्रधानमंत्री के या किसी राज्य के मुख्यमंत्री को कोरोना का संकट समझ में नहीं आ रहा है तो यह स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों, एम्स जैसे संस्थानों के निदेशकों और आईसीएमआर से जुड़े लोगों की जिम्मेदारी है कि वे हकीकत बताएं। वे राजनीतिक नेतृत्व या बाबुओं का मुंह देख करके हकीकत छिपाते रहे तो भारत के लिए खतरा बहुत बड़ा हो जाएगा।  जैसे इंडियन कौंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च, आईसीएमआर के निदेशक ने गुरुवार को कहा कि लॉकडाउन के 30 दिन पूरे हो गए हैं और मरीजों की तुलना में आज भी हम वहींहैं, जहां 30 दिन पहले थे। उन्होंने दावा किया कि हमारे यहां संक्रमण ज्यादा नहीं फैला है।

आईसीएमआर के निदेशक ने लॉकडाउन का फायदा बताते हुए कहा कि इससे संक्रमण की चेन टूट गई है।दूसरेसंक्रमितों की संख्या दोगुना होने की रफ्तार घट गई है और तीसरा ज्यादा से ज्यादा लोगों की टेस्टिंग हो रही है। हकीकत यह है कि गुरुवार की शाम तक पांच लाख 25 हजार लोगों की टेस्टिंग हुई थी और संक्रमितों की संख्या 23 हजार से कुछ ज्यादा थी। इस आधार पर दावा किया गया कि भारत में संक्रमण की दर चार फीसदी है। पर यह आंकड़ा जितना सच बता रहा है उससे ज्यादा छिपा रहा है। इसकी सचाई सरकार के ही एक दूसरे आंकड़े से पता चल जाती है। भारत में सबसे ज्यादा 90 हजार के करीब टेस्टिंग महाराष्ट्र में हुई है और साढ़े छह हजार मामले हैं। यानी टेस्ट के अनुपात में संक्रमितों की दर 15 फीसदी है। चार फीसदी का जो राष्ट्रीय औसत बताया जा रहा है वह इस वजह से है कि देश के कई हिस्सों में अभी कोरोना का संक्रमण पहुंचा नहीं है या फैला नहीं है। दूसरे, ऐसे राज्यों में टेस्टिंग की सुविधा अच्छी नहीं है। सैंपल लेने और लैब तक पहुंचाने के बीच ही सैंपल खराब हो जा रहे हैं।

इसी तरह आईसीएमआर के निदेशक ने एक तरह से कोरोना पर काबू पाने का दावा करने के अंदाज में कहा कि प्लाज्मा तकनीक से इलाज हो रहा है और ब्लड प्लाज्मा डोनेट करने वाले लोग खुद सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह गंभीर बीमारी नहीं है। अब 90-95 फीसदी लोग खुद ठीक हो रहे हैं। सोचें, अगर भारत में वैज्ञानिक रिसर्च का जिम्मा संभालने वाली संस्था यह दावा करे तो उससे कितनी गलतफहमी पैदा होगी। अगर आईसीएमआर की ही बात मानें तो बाकी पांच-दस फीसदी लोगों के इलाज की व्यवस्था क्या सरकार के पास है? अगर देश की पांच फीसदी आबादी भी संक्रमित होती है और उसमें से दस फीसदी का भी गंभीर इलाज करने की जरूरत पड़ी तो वह आंकड़ा 50 लाख से ज्यादा लोगों का बनेगा। जबकि भारत के पास आधिकारिक रूप से अभी 13 हजार के करीब वेंटिलेटर हैं और सवा लाख आईसीयू बेड हैं।

इसी तरह की बात एम्स के निदेशक ने कही है कि कोरोना कोई गंभीर बीमारी नहीं है, इसमें मृत्यु दर बहुत कम है और इसके मुकाबले इसका स्टिग्मा यानी लांछन या कलंक ज्यादा बुरी बात है। उनको लग रहा है कि लोग इस चिंता में ज्यादा हैं कि कोरोना मरीज होने का लांछन लग जाएगा। पर यह बात भी लोगों को भ्रमित करने वाली है। लांछन लग जाने के भय से हो सकता है कि कुछ लोग जांच के लिए या इलाज के लिए नहीं जाते हों पर यह सिर्फ एक लांछन नहीं है, बल्कि गंभीर बीमारी है, जिसके बारे में अभी दुनिया को बहुत कुछ पता नहीं है। ध्यान रहे शुरुआत में इसे लेकर जितनी तरह की बातें कही गई थीं सब गलत हो गई हैं। यह न तो गरमी बढ़ने से मर रहा है और न सिर्फ बूढ़े-बुजुर्गों को मार रहा है।

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