क्या हर्ड इम्युनिटी पर काम हो रहा?

भारत सरकार कोरोना वायरस से निपटने के लिए क्या हर्ड इम्युनिटी यानी सामूहिक रोगप्रतिरोधक क्षमता के सिद्धांत को आजमा रही है? यह सवाल इसलिए उठा है क्योंकि दुनिया के किसी भी देश में ऐसा नहीं हुआ है कि जब संक्रमण बढ़ रहा हो और पीक की तरफ जा रहा हो तब देश में सब कुछ खोल दिया जाए। ध्यान रहे भारत में जब पहली बार लॉकडाउन लागू किया गया तब पांच सौ के करीब मामले थे। तब दुनिया के सबसे बड़ा और सबसे सख्त लॉकडाउन भारत में लागू हुआ था और आज जब देश में एक लाख 20 हजार के करीब मामले हैं और हर दिन पांच से छह हजार मामले आ रहे हैं तो सब कुछ चालू किया जा रहा है। ट्रेन और हवाई सेवा तक चालू कर दी गई है। दुनिया के जिन देशों में कोरोना वायरस के केसेज घटने लगे हैं उन्होंने भी अभी सार्वजनिक परिवहन शुरू करने के बारे में विचार नहीं किया है। पर भारत में सब कुछ चालू किया जा रहा है।

तभी लग रहा है कि सरकार लोगों को भ्रम में रख कर हर्ड इम्युनिटी का प्रयोग कर रही है। यह बेहद खतरनाक और घातक हो सकता है। स्वीडन ने अपने यहां इस प्रयोग को किया। उसने दुनिया के दूसरे देशों की तरह अपने यहां लॉकडाउन नहीं किया और लोगों में अपने आप इस वायरस के संक्रमण से लड़ने की ताकत पैदा होने देने यानी हर्ड इम्युनिटी का प्रयोग किया, जो लगभग फेल हो गया है। स्वीडन ने माना है कि उसके यहां आठ फीसदी के करीब लोगों में एंटीबॉडी विकसित हुई है, जबकि किसी भी वायरस से लड़ने के लिए 70 से 90 फीसदी लोगों में एंटीबॉडी विकसित होना जरूरी है।

अब भारत का मामला देखें, यहां पहले से कहा जा रहा है कि देश के 80 फीसदी लोगों में इस वायरस से लड़ने की क्षमता मौजूद है और वे अपने आप ठीक हो रहे हैं। यह आंकड़ा हर्ड इम्युनिटी के लिए जरूरी आंकड़े के एकदम बीच का है। दूसरे, भारत में नीति निर्माण से जुड़ा हर आदमी कह रहा है कि कोरोना के साथ रहना सीखना होगा। कोरोना के साथ रहना सीखने का मतलब है कि उससे लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता अपने अंदर विकसित करनी होगी। चाहे वह काढ़ा पीकर हो या किसी और तरीके से हो। इससे भी जाहिर होता है कि सरकार बिना किसी से कहे हर्ड इम्युनिटी का प्रयोग कर रही है। पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन, डब्लुएचओ की मुख्य वैज्ञानिक सौम्या स्वामीनाथन ने कहा कि कोरोना वायरस क दो-चार हफ्ते में या दो-चार महीने में खत्म नहीं होने वाला है।

यह चार-पांच साल तक रहने वाला है। डब्लुएचओ ने यह भी कहा हुआ है कि कोरोना वायरस का टीका अभी तत्काल नहीं आने वाला है। टीका आने में एक साल लग सकता है और यह भी कहा है कि हो सकता है कि कभी टीका नहीं बन पाए। ऐसी स्थिति में भारत या दुनिया का कोई भी देश सारे लोगों को इतने लंबे समय तक लॉकडाउन में नहीं रख सकता है। जो विकसित देश इलाज और लॉकडाउन से होने वाले आर्थिक नुकसान को अफोर्ड कर सकते हैं उन्होंने अपने यहां इस पर काबू पा लिया है। लेकिन भारत न तो इलाज अफोर्ड कर सकता है औऱ न पूरे देश का बंद रहना। इसलिए आसान तरीका यह है कि सब कुछ खोल दिया जाए और लोगों को संक्रमित होने दिया जाए ताकि उनके अंदर अपने आप रोग से लड़ने की क्षमता पैदा हो।

अब भारत में हर्ड इम्युनिटी के प्रयोग की पुष्टि करने वाली असली बात देखिए। अमेरिका की दो बेहद प्रतिष्ठित संस्थाओं- सेंटर फॉर डिजीज डायनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी यानी सीडीडीईपी और प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी ने एक शोध के बाद बताया कि भारत में कोरोना वायरस से लड़ने के लिए जरूरी हर्ड इम्युनिटी का स्तर सात महीने में यानी दिसंबर तक हासिल किया जा सकता है। इन दोनों संस्थाओं के मुताबिक अगर भारत में 60 साल से कम उम्र के लोगों को हर काम करने की छूट दे दी जाए तो सात महीने में भारत हर्ड इम्युनिटी का वो स्तर हासिल कर लेगा, जिससे वायरस से लड़ा जा सकेगा और उस पर जीत हासिल की जा सकेगी। इन दोनों संस्थाओं के इस शोध को भारत सरकार के अधिकारियों और स्वास्थ्य मंत्री की बात से मिला कर देखिए, फिर अपने आप साफ हो जाएगा कि सरकार बिना लोगों को बताए यह प्रयोग कर रही है और तभी लॉकडाउन से छूट देने वाले हर दिशा-निर्देश में कहा जा रहा है कि 60 साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्ग और दस साल से कम उम्र के बच्चे घरों से नहीं निकलें। बाकी लोग मास्क, सैनिटाइजर और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए सारे काम के लिए निकल सकते हैं।

भारत को यह रणनीति अपनाने की प्रेरणा इसलिए भी मिली हो सकती है क्योंकि भारत में 82 फीसदी आबादी 50 साल से कम उम्र के लोगों की है, जिनमें कोरोना वायरस से मरने की दर 0.2 फीसदी है। इसके बाद आठ फीसदी आबादी 50 से 59 साल के लोगों की है, जिनके बीच मृत्यु दर 0.4 से एक फीसदी तक है। अगर इस 90 फीसदी आबादी को सब कुछ करने की छूट दे दी जाए तो भारत हर्ड इम्युनिटी का स्तर हासिल कर लेगा और इस क्रम में जान का नुकसान होगा पर जहान पूरी तरह से बच जाएगा। जान का नुकसान भी बहुत मामूली होगा। भारत में इसे आजमाने में हालांकि यह मुश्किल आएगी कि ज्यादातर बुजुर्ग संयुक्त परिवारों में रहते हैं, उन्हें परिवार से अलग नहीं किया जा सकता। जो भी हो इस प्रयोग के अलावा दूसरी कोई वजह नहीं दिखाई देती है, जिससे सरकार के लॉकडाउन में छूट देने के कदम की कोई तर्कसंगत व्याख्या हो सके।

अगर सचमुच भारत सरकार यह प्रयोग कर रही है तो यह बहुत खतरनाक है। खतरनाक इसलिए क्योंकि भारत में अगर इस प्रयोग के तहत दो फीसदी लोग भी संक्रमित हुए तो वह संख्या तीन करोड़ के करीब होगी और उनमें से दो फीसदी भी गंभीर मामले हुए तो छह लाख लोगों के इलाज की भारत में कोई व्यवस्था नहीं है। भारत के पास सिर्फ एक लाख आईसीयू बेड्स हैं और वेंटिलेटर की संख्या सिर्फ 50 हजार है। यह प्रयोग कम आबादी वाले उन देशों के लिए है, जिनके पास मेडिकल की पर्याप्त सुविधा है। अगर भारत में यह प्रयोग जरा भी इधर-उधर हुआ तो लाखों लोग मरेंगे।

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