देरी फिर भी चलो दुरुस्त आए

जो अब हो रहा है वह सब पहले हो जाना था। दिसंबर-जनवरी-मध्य फरवरी में जब चीन और दक्षिण कोरिया दोनों कोरोना वायरस के संकट का सामना कर रहे थे और अपने-अपने तरीके से उससे उबरने का प्रयास कर रहे थे उसी समय उनके अनुभव से सबक लेना था। चाणक्य ने ढाई हजार साल पहले कहा था कि दूसरों के अनुभव से सीखें, अपने अनुभव से सीखने के लिए आपकी उम्र बहुत कम पड़ जाएगी। अगर भारत ने दक्षिण कोरिया और चीन के अनुभव से सीखा होता तो आज पैनिक की स्थिति नहीं बनती। आज कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने के लिए किए जा रहे प्रयासों से हालात ऐसे बन गए हैं कि बीमारी से ज्यादा पैनिक कंट्रोल करने की भी जरूरत है।

पैनिक ऐसा हो गया है कि लोग खाने-पीने की परवाह किए बगैर, बच्चों को कंधों पर लेकर, सामान उठाए सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने घर की यात्रा पर निकल गए हैं। बहरहाल, अब कहा जा सकता है कि देर आए, दुरुस्त आए। सरकार ने इस सप्ताह से मेडिकल सुविधाओं पर ध्यान देना शुरू किया है। अब जांच के लिए जरूरी उपकरणों से लेकर, डॉक्टरों-नर्सों के लिए जरूरी सुरक्षा उपकरणों, अस्पतालों आदि की तैयारी शुरू हो गई है। यह हकीकत है कि भारत अभी तक पारंपरिक जांच के तरीके से ही कोरोना वायरस के मरीजों का पता लगा रहा था, जिसमें कई दिन लग जाते हैं। जबकि दक्षिण कोरिया ने महीने पहले सेरोलॉजिकल टेस्ट या एंटीबॉडी टेस्ट के जरिए कोरोना मरीजों की पहचान शुरू कर दी थी और इसी वजह से उसे सबसे ज्यादा फायदा हुआ। वह इस वायरस का प्रसार रोकने में पूरी तरह से सफल रहा। उसके इस मॉडल का दुनिया भर में अध्ययन हो रहा है।

अब जाकर भारत सरकार ने सेरोलॉजिकल टेस्ट शुरू करने का फैसला किया है। जब बीमारी पूरे देश में फैल गई और 21 दिन का लॉकडाउन पीरियड शुरू हो गया तब इस बारे में फैसला हुआ और इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च, आईसीएमआर ने इसका टेंडर निकाला। आईसीएमआर ने कहा है कि उसे पांच लाख एंटीबॉडी टेस्ट किट चाहिए। ध्यान रहे सेरोलॉजिल या एंटीबॉडी टेस्ट किट के जरिए जांच में सिर्फ एक ब्लड टेस्ट होता है और उससे वायरस का पता चल जाता है। यह टेस्ट दो घंटे में हो सकता है। अगर ऐसे किट पहले से जमा किए गए होते तो टेस्टिंग के मामले में आज भारत इतना पिछड़ा नहीं रहता। ध्यान रहे भारत में 24 मार्च तक दस लाख लोगों पर सिर्फ 16 लोगों की जांच हो रही थी। जबकि अमेरिका में दस लाख लोगों पर 336 की और दक्षिण कोरिया में दस लाख लोगों पर 61 सौ लोगों की जांच हुई। कहने की जरूरत नहीं है कि दक्षिण कोरिया का जांच का यह मॉडल सबसे सफल रहा।

एंटीबॉडी टेस्ट का फैसला करने के बाद सरकार ने पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट, पीपीई की जरूरत समझी है। आईसीएमआर ने इसकी कमी बताई है लेकिन खबर है कि पर्याप्त मात्रा में इसे उपलब्ध कराने का फैसला हुआ है। असल में यह इसलिए जरूरी है ताकि डॉक्टर जब एंटीबॉडी टेस्ट करेंगे, तब वे ज्यादा से ज्यादा लोगों के संपर्क में आएंगे या संक्रमित रक्त की जांच करेंगे। ऐसे में उनका काम सिर्फ मास्क या दस्तानों से नहीं चलने वाला है। इसके लिए उनको पीपीई की जरूरत होगी। अगर डॉक्टरों, नर्सों या पैथोलॉजिक सेंटर पर काम करने वालों को पीपीई नहीं मिली तो वे संक्रमित होंगे। ऐसा दिल्ली में हुआ। मोहल्ला क्लीनिक के एक डॉक्टर को संक्रमण हुआ और फिर उसके पूरे परिवार को संक्रमण हो गया। ऐसा दूसरे डॉक्टरों, नर्सों या स्वास्थ्यकर्मियों के साथ न हो इसके लिए पीपीई जरूरी है।

सरकारी अस्पतालों में क्रिटिकल केयर यूनिट्स नहीं हैं। ज्यादातर अस्पतालों में आईसीयू हैं या हैं तो बेड्स बहुत कम हैं। पूरे देश में सिर्फ एक लाख आईसीयू बेड हैं। अब स्वास्थ्य मंत्रालय और आईसीएमआर ने निर्देश दिया है कि सभी अस्पतालों में आईसीयू बनाए जाएं और बेड्स की संख्या बढ़ाई जाए। अब जाकर जब समस्या बहुत बढ़ गई है तब दो बड़े फैसले हुए हैं। एम्स में टास्क फोर्स बनाई गई है, जो कोविड-19 संक्रमण की जांच और निगरानी का काम कर रही है और निजी अस्पतालों को जांच व इलाज के काम में लगाया गया है। इसी हफ्ते निजी लैब्स को जांच की इजाजत दी गई और शुक्रवार से निजी अस्पतालों ने कोरोना वायरस का इलाज शुरू किया है। अलग अलग राज्यों में निजी अस्पतालों की शृंखला को इस काम में जोड़ा गया है। इन अस्पतालों ने अपने यहां पूरे आइसोलेशन में दस से लेकर 30 बेड्स तक की व्यवस्था की है, जहां कोरोना के मरीजों का इलाज होगा।

इसी तरह लंबे इंतजार के बाद सेना को सिविलयन ड्यूटी के लिए तैयार रहने को कहा गया है और डीआरडीओ के मेडिकल उपकरण बनाने के काम में लगाया गया है। सेना प्रमुख ने कहा है कि हर सेंटर पर सेना के अस्पताल कोरोना वायरस के मरीजों का इलाज करने के लिए तैयार हैं। इसी तरह डीआरडीओ ने वेंटिलेटर सहित कई मेडिकल उपकरण बनाने शुरू किए हैं। ध्यान रहे इस वायरस के मरीजों की जान बचाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी वेंटिलेटर हैं क्योंकि इसके मरीजों की मौत सांस की तकलीफ से हो रही है।

2 thoughts on “देरी फिर भी चलो दुरुस्त आए

  1. Sir if only our government had stockpiled the necessary equipment in time and taken the necessary decision the economic impact would have been much less. Also the chaos due to sudden lock down would have been avoided. Instead of international photo-ops we must focus on managing the looming crisis at home.

  2. RBI se 1.4 lack crore, NDEF aur PM Rahat mae 30 hazar crore…phir bhi paise maange jaarahe hai…kondega itne paiso ka hisaab.
    Jo medical test kit 100 ki hai usko yeh log 1 lack mae kharidege.
    Sab jagha curruption hai….

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