लोगों पर भी फोड़ेंगे ठीकरा - Naya India
हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप| नया इंडिया|

लोगों पर भी फोड़ेंगे ठीकरा

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, एम्स के रणदीप गुलेरिया ने गुरुवार को कई बातें ऐसी कहीं, जिनसे भविष्य का अंदाजा लग रहा है। इसमें खासतौर से गौर करने वाली एक बात उन्होंने कही। गुलेरिया ने कहा कि लॉकडाउन से भारत को फायदा हुआ है, इससे संक्रमण की रफ्तार कम हुई और मेडिकल तैयारियों के लिए वक्त मिला। इसके आगे उन्होंने कहा कि लॉकडाउन का ज्यादा फायदा मिला होता, अगर लोग ज्यादा नियंत्रण में रहते। वैसा न होने का नतीजा है कि आज देश में 56 हजार मामले हैं। गुलेरिया ने यह बात अनायास नहीं कही है। यह आगे की तैयारी का हिस्सा है। मोदी सरकार के लंगूरों में आगे आम जनता को बलि का बकरा बनाने की तैयारी चल रही है।

अगर आप ध्यान से देखेंगे तो ऐसा प्रयास पहले दिन से होता दिखाई देगा। याद करें कैसे मार्च के आखिरी हफ्ते में प्रशासन से लेकर सोशल मीडिया के लंगूरों ने तबलीगी जमात को जिम्मेदार ठहराया था। यह नैरेटिव बनाया कि सारी गलती तबलीगी जमात की है। अगर वे नहीं होते तो देश में कोरोना वायरस फैलता ही नहीं। इसका नतीजा यह हुआ कि पूरे देश में नफरत और हिंसा का माहौल बना। अस्पतालों में मारपीट की झूठी-सच्ची खबरें आईं और डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिस के ऊपर हमले की भी खूब कहानियां दिखाई गईं। धीरे धीरे उनका मामला थम गया। करीब चार हजार तबलीगी जमात के लोग इलाज के लिए अस्पताल भेजे गए थे या क्वरैंटाइन किए गए थे। वे अब ठीक हो गए हैं और उनको छोड़ा जा रह है। इसके बावजूद देश में बड़ी तेजी से मामले बढ़ रहे हैं तो किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा?

उसके लिए आम जनता को बकरा बनाया जा रहा है और इसलिए लॉकडाउन में छूट दी गई है। नहीं तो क्या कारण था कि जब मामले कम थे तब प्रधानमंत्री हाथ जोड़ कर लोगों से घरों में रहने की अपील कर रहे थे या ट्विट करके राज्य सरकारों को निर्देश दे रहे थे कि वे लॉकडाउन सख्ती से लागू करें और अब अचानक लॉकडाउन हटाया जाने लगा, जबकि मामले बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं? कोरोना संक्रमण की संख्या बढ़ने के बावजूद लॉकडाउन खोलने का एक कारण तो यह हो सकता है कि आर्थिकी संकट में है। पर सिर्फ यहीं कारण नहीं है।

यह भी सोचने की बात है कि पहले जब दो बार लॉकडाउन के बारे में घोषणा खुद प्रधानमंत्री ने की तो तीसरी बार वे घोषणा करने क्यों नहीं आए। उन्होंने दो हफ्ते लॉकडाउन बढ़ाने की घोषणा नहीं की। सिर्फ गृह मंत्रालय ने एक आदेश जारी कर दिया। इसमें दो हफ्ते लॉकडाउन बढ़ाने का ऐलान था पर साथ ही देश को तीन जोन में बांट कर लॉकडाउन की शर्तों में छूट देने की भी बात थी। अब लोग लॉकडाउन में छूट के मजे ले रहे हैं। बिना यह सोचे समझे कि उनके बाहर निकलने का क्या दुष्परिणाम हो सकता है। लेकिन देश की मेडिकल रणनीति बनाने वालों और राजनीतिक नेतृत्व को पता है कि इस समय जबकि संक्रमण का मामला तेजी से बढ़ रहा है, अगर लॉकडाउन में छूट दी गई तो उसका क्या दुष्परिणाम हो सकता है। इसके बावजूद जान-बूझकर छूट दी गई है तो यह किसी साजिश का हिस्सा लगता है।

वैसे भी इस समय देश में रमजान का महीना चल रही है। ऊपर से सरकारों ने लॉकडाउन में कई तरह की छूट दे दी है और कई किस्म की दुकानें भी खोल दी हैं। सो, ईद आते आते बड़ी संख्य में लोग खरीदारी के लिए निकलेंगे। अल्पसंख्यकों के अलावा दूसरे लोगों को भी कार्यालय जाना है या खरीदारी करनी है। ध्यान रहे सरकारी दफ्तर सौ फीसदी खुल गए हैं और निजी दफ्तरों में भी 33 फीसदी उपस्थिति के साथ कामकाज हो रहा है। सो, तय मानें कि इन सब जगहों पर नए मामले आएंगे। उसके बाद जब सरकार के हाथ खड़े करने की बारी आएगी तो कह दिया जाएगा कि लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं किया, लॉकडाउन का उल्लंघन किया या ईद की खरीदारी में भीड़ जुटाई, जिसकी वजह से मामले बढ़ गए हैं।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

1 comment

  1. एकबात तो शत प्रतिशत सही है कि आमतौर पर लाकडाउन का पालन जैसे करना चाहिए था वैसा नहीं हो पाया है और इस ढिलाई का परिणाम भी लाकडाउन का उपहास उडाने वाले लोगों को ही भोगना होगा आप भी उचित ढंग से मामले को गंभीरता से नहीं रख रहे हैं

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