उफ! शर्मनाक और भयावह! - Naya India
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उफ! शर्मनाक और भयावह!

तब तो दुनिया में भारत की साख अफ्रीका के जिंब्बावे, दक्षिण अमेरिका के बरबाद वेनेजुएला से भी अधिक खराब होनी है। मैंने नोटबंदी के तुरंत बाद आर्थिकी का भट्ठा बैठने का दो टूक जो अनुमान लिखा था उसी अंदाज में आज फिर दुनिया के 200 वैश्विक-भारतीय अर्थशास्त्रियों की भारत सरकार से अपील का सत्व-तत्व समझते हुए लिख रहा हूं कि कहीं भारत की आर्थिकी आग वेनेजुएला, जिब्बावे जैसी ही न हो जाए। वह बहुत भयावह होगा। जैसे इन देशों की सरकार, उसके आंकड़ों पर दुनिया, वैश्विक कारोबारी, इनवेस्टर विश्वास नहीं करते है वैसे ही भारत पर भरोसा टूटने के प्रोसेस में है। 21 नवंबर को वैश्विक अर्थशास्त्रियों का बयान दुनिया में सभी तरफ नोट हुआ होगा। इन अर्थशास्त्रियों ने कहा कि सरकार (मोदी सरकार) अपने ही देश के ख्याति प्राप्त साख्यिंकी संस्थाओं की साख पर हमला बोले हुए है। संस्थाएं जो सर्वें करती है उनके आंकड़े जब सरकार की इच्छा, उसके विमर्श के माफिक नहीं आते है तो बिना कोई कारण इनकी रिपोर्ट दबा देती है। सर्वे के तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करती है। हम सरकार से अपील करते है कि वह आंकड़े इसलिए नहीं दबाए क्योंकि उससे देश की माली हालात की तस्वीर अच्छी नहीं बनती है। सरकार सच्चाई जाहिर होने दे।

यह अपील पेरिस स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स से लेकर, मुंबई के आईजीआईडीआर जैसे संस्थान के अर्थशास्त्रियों, आर्थिक- राजनीति के पंडितों, योजना आयोग के पूर्व सदस्य, विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरो के दस्तखत से वैश्विक मीडिया को जारी हुआ है। इन्होने अपने बयान में ब्यौरा दिया है कि सरकार ने सांख्यिकी संस्थाओं के कितनी तरह के सर्वे या रपट दबाई। मतलब विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, रैटिंग एजेंसियों, वैश्विक कंपनियों, निवेशकों और उनके अर्थशास्त्रियों की लंबी-चौड़ी वैश्विक जमात के बीच यह बयान, व नोटबंदी के बाद से लगातार आंकड़े छुपाने, फर्जी बनाने के विवादों से यह धारणा पक्की बन गई है या बन रही होगी कि भारत में सरकारक आर्थिकी में फर्जीवाडा कर रही है। सरकार सच्चाई, आंकड़े छुपा रही है। भारत में निवेश-धंधा नहीं करना चाहिए क्योंकि सही कुछ नहीं है!

200 अर्थशास्त्रियों ने सरकार द्वारा जिस सर्वे को दबाने पर बयान जारी किया वह राष्ट्रीय सांख्यिकी आफिस याकि एनएसओ का सन् 2017-18 में उपभोक्ताओं याकि खरीददारो को लेकर 75वां सर्वे है। इस सर्वे के तथ्य-डाटा को एक आर्थिक अखबार बिजनेश स्टेंडर्ड ने 15 नवंबर को लीक किया। उसने रिपोर्ट में जाहिर यह सच्चाई छापी कि पिछले चालीस सालों में पहली बार लोगों की खरीदारी घटी और एक वजह देहात में डिमांड सुस्त होना है।

खबर ज्योहि छपी सरकार ने सर्वे को ही यह कहते खारिज किया कि डाटा क्वालिटी सही नहीं हैं। और एक्सपर्ट कमेटी का हवाला देते हुए सर्वे की रिपोर्ट बिना जारी किए दबा दिया। उसे जारी नहीं किया। इस पर फिर अखबार ने 21 नवंबर को बताया कि एक्सपर्ट कमेटी ने डाटा क्वालिटी पर संदेह नहीं जताया है।

सोचे, पूरा प्रकरण क्या मतलब लिए हुए है? अर्थ है कि भारत सरकार सत्य छुपा रही है। सर्वे, आकड़ों में फर्जीवाड़ा कर रही है। देश की आर्थिकी व माली हालात बरबाद है लेकिन सरकार उसे गुलाबी दिखला रही है। मानने को तैयार नहीं है कि देश में मंदी है, बदहाली है और भारत की विकास दर वापिस न्यूनतम याकि 3-4 प्रतिशत वाली हिंदू विकास दर की और लौट रही है।

मैं लगातार लिखता रहा हूं कि नोटबंदी के बाद से सरकार आंकड़ों, डाटा में फर्जीवाड़ा कर रही है। हकीकत छुपा रही है। पांच ट्रिलियन की आर्थिकी बनाने की जुमलेबाजी या सात, छह, पांच प्रतिशत विकास दर वाले जीडीपी के आंकडे, और उनका विश्वास रियलिटी को छुपाने का प्रपंच है। एक सुधी आर्थिक पत्रकार ने तर्क दिया कि लोगो की खरीददारी चालीस साल के रिकार्ड में इतनी कम इसलिए नहीं हो सकती है क्योंकि विकास दर का इतने सालो का औसत जब सात प्रतिशत से ऊपर है तो उपभोग कैसे कम होगा? जाहिर है ऐसा तर्क देने वाला मान रहा है कि सीएसओ से सरकार ने 2014 से 2019 के बीच 7.5 प्रतिशत सालाना जीडीपी विकास का जो आंकड़ा जारी कराया है वह सत्य है।

सोचंे, सन् 2014 और उससे पहले वाला विकास, बम-बम आर्थिकी का माहौल क्या कही है? पर सरकार दस तरह से झूठ बोल कर, जुमलो से मंदी की हकीकत को मानने को तैयार नहीं है। संसद के मौजूदा सत्र के पहले दिन केरल के सांसद प्रेमचंद्रन का सरकार से सवाल था कि क्या सरकार ने मंदी के कारण चिंहित किए है और ढहती आर्थिकी को थामने के लिए क्या करने का इरादा है? इस पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का जवाब था-सीएओओ की रीलिज डाटा में 2014 से 2019 के बीच भारत में सालाना विकास दर 7.5 प्रतिशत रही जो दुनिया के अमीरतम जी-20 देशों में सर्वाधिक है। विश्व बैंक ने भी 2019-20 में भारत की विकास दर के जी-20 ग्रुप में सर्वाधिक फास्ट होने का अनुमान लगाया है। यह जवाब तब था जब डा मनमोहन सिंह ने उससे ठिक पहले लेख लिख खुलाया किया था कि जीडीपी विकास पंद्रह साल के न्यूनतम स्तर पर है। बेरोजगारी 45 सालों में सर्वाधिक होने का रिकार्ड लिए हुए। घरों का खर्च-उपभोग चालीस साला बाद न्यूनतम है। बट्टेखाते का लोन उच्चतम तो बिजली उत्पादन 15 साल में सर्वाधिक नीचे। हर कोई उद्योगपति, बैंकर, नियंत्रक, उद्यमी और नागरिक, नीति निर्माता विश्वास खोए हुए है।

मगर सरकार यह कोई बात मानने को तैयार नहीं है। मंदी है, नोटबंदी ने भट्ठा बैठाया है, इस बेसिक बात को मानने को सरकार तैयार नहीं है। और यदि आकंड़ो, सर्वे रिपोर्टों से हकीकत बाहर निकलती है तो उसे या तो दबा दिया जाता है या लीपापोती के साथ उस पर उलटे गुलाबी तस्वीर उभार दी जाती है। मतलब दुनिया में अब जितने देश फेल हुए, दिवालिया हुए, उसके जिंब्बावे, वेनेजुएला की सरकारों जैसा व्यवहार!

तभी नोटबंदी की महागलती के बाद आर्थिक सच्चाई को ऐसे छुपाना वह बलडंर है, जिसके परिणाम आने वाले सालों में नोटबंदी से भी ज्यादा खराब होंगे!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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