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सारे सूचकांकों में हम गिर रहे हैं!

समझ नहीं आ रहा है कि दुनिया भारत के मौजूदा वक्त की हकीकत को सूचंकाकों से, रेंटिग में जाहिर कर रही है लेकिन भारत के हम लोगो को, केंद्र सरकार में रत्ती भर यह चिंता नहीं दिख रही है कि हम किस दशा में है और किधर जा रहे हंै। सरकार प्रचार कर रही है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद दुनिया भर में भारत का डंका बज रहा है। सारी दुनिया भारत की बात ध्यान से सुन रही है। पर दूसरी ओर दुनिया के पैमाने पर किसी भी देश की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक दशा बताने वाले तमाम सूचकांकों में भारत लगातार गिरता जा रहा है।

हां, वैश्विक नजरिए में भारत की स्थिति सुधरने, बेहतर होने की बजाय खराब होती जा रही है। डेमोक्रेसी सूचकांक, करप्शन सूचकांक, ह्यूमन राइट्स सूचकांक, करेंसी इंडेक्स, हेल्थ इंडेक्स, आर्थिकी इंडेक्स जैसे तमाम सूचकांकों में और खासकर निवेश के वैश्विक फैसले करवाने की निर्णायक रेटिंग एजेंसियो में भारत की ग्रेडिग व रेटिंग लगातार खराब होती गई है।

आर्थिकी की दशा को फिलहाल दरकिनार रखें। उससे ज्यादा चिंता वाली बात लोकतंत्र के सूचकांक में भारत का गिरना है। 2019 में भारत सीधे दस पायदान नीचे लुढ़क गया है। दुनिया भर के देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था का आकलन करके सूचकांक बनाने की शुरुआत 2006 में हुई थी। द इकोनॉमिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट के 2019 के सूचकांक में भारत 6.9 अंक के साथ दस पायदान गिर कर 51वें स्थान पर आ गया है। चुनाव व बहुलता, नागरिक स्वतंत्रता, सरकारी कामकाज, राजनीतिक भागीदारी और राजनीतिक संस्कृति के पांच पैमानों पर लोकतंत्र की दशा का आकलन होता है। इन सारे पैमानों पर भारत का प्रदर्शन खराब है। सोचें, दुनिया में शोकेस बनने के लिए भारत के पास बुद्ध और गांधी के बाद सिर्फ लोकतंत्र ही है पर उसमें भी हमारी दशा खराब है।

पिछले दिनों ग्लोबल करप्शन इंडेक्स जारी हुआ है। दुनिया भर में सरकारों के कामकाज में पारदर्शिता और ईमानदारी का आकलन करने वाली संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने यह रैंकिंग जारी की है। इसमें भारत दो स्थान गिर कर 80वें नंबर पर पहुंच गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब कहा था कि वे चौकीदार हैं और न खाएंगे और न किसी को खाने देंगे तो देश में भ्रष्टाचार की संस्कृति खत्म होने की उम्मीद जगी थी पर वास्तव में इसका उलटा हो रहा है और यह दुनिया कह रही है!

गुरुवार को मुद्रा को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट आई है, जिसके मुताबिक सिर्फ पिछले एक साल में भारतीय मुद्रा यानी रुपया डॉलर के मुकाबले दो फीसदी गिरा है। थाईलैंड, फिलीपीन और मलेशिया जैसे दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों की मुद्रा में डॉलर के मुकाबले सुधार हुआ है पर भारत का रुपया गिर गया है। मोदी प्रधानमंत्री बनने से पहले कहा करते थे कि जैसे जैसे मुद्रा की कीमत गिरती है वैसे वैसे देश की इज्जत भी गिरती जाती है। बहरहाल, दुनिया में भारत का डंका बजने की एक सचाई यह है कि भारत के पासपोर्ट का दर्जा भी गिर गया है। हेनली एंड पार्टनर्स की ओर से जारी होने वाले सालाना सूचकांक में इस साल भारत 82वें स्थान से गिर कर 84वें पर आ गया है। यह रिपोर्ट इंटरनेशल एयर ट्रांसपोर्ट, आईएटीए की रिपोर्ट के आधार पर बनती है। स्वास्थ्य, मानवाधिकार आदि के सूचकांकों में भी भारत की स्थिति में गिरावट आई है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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