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हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप| नया इंडिया|

मुश्किल समय की चीफ जस्टिस की चिंता!

यह बात चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एसए बोबड ने कही है। उनके सामने एक याचिका आई थी, जिसमें याचिकाकर्ता ने कहा था कि सर्वोच्च अदालत संशोधित नागरिकता कानून को संवैधानिक घोषित करे। यह हैरान करने वाली याचिका थी और चीफ जस्टिस ने सही ही हैरानी जताते हुए कहा कि पहली बार किसी कानून को संवैधानिक घोषित कराने के लिए याचिका दायर की गई है। ध्यान रहे संसद से पास होने और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून संवैधानिक ही होता है, जब तक कि सुप्रीम कोर्ट उसे असंवैधानिक न घोषित कर दे। सो, सुप्रीम कोर्ट में याचिका कानून को असंवैधानिक घोषित कराने के लिए आती है पर एक अति उत्साही याचिकाकर्ता कानून को संवैधानिक घोषित कराने पहुंच गया। इस पर टिप्पणी करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि देश इस समय मुश्किल दौर से गुजर रहा है। उन्होंने आगे कहा कि देश में हिंसा रूके तभी वे इस मसले पर सुनवाई करेंगे।

चीफ जस्टिस ने यहीं बात करीब एक महीने पहले भी कही थी। दिसंबर के दूसरे हफ्ते में जब पुलिस अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में घुसी और छात्रों के साथ मारपीट हुई और फिर दिल्ली पुलिस ने जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में घुस कर लाइब्रेरी में पढ़ाई कर रहे छात्रों की पिटाई की तब कुछ वकील सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। उस समय भी चीफ जस्टिस ने उनसे कहा था कि वे हिंसा बंद कराएं उसके बाद सुनवाई होगी। इसके अगले दिन सुनवाई हुई और जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह ऐसा आदेश नहीं दे सकती है कि लोग पुलिस पर पथराव करते रहें और पुलिस चुपचाप देखती रहे।

उसके बाद से जैसे देश की पुलिस को प्रदर्शन कर रहे लोगों पर लाठी चलाने, उन पर मुकदमा करने, पकड़ कर जेल में डालने या उनके खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई करने का लाइसेंस मिल गया है। उत्तर प्रदेश की पुलिस के पिछले एक महीने का कारनामा इसकी मिसाल है। पुलिस ने लोगों पर लाठी चलाई और आंसू गैस के गोले छोड़े और फिर लोगों से ही इसका खर्च वसूलने का काम शुरू किया। बिना किसी सबूत के लोगों को उठा कर जेल में डाल दिया, जहां से अब लोगों की जमानतें हो रही हैं। दर्जनों लोग अब भी जेल में बंद हैं, जिनके खिलाफ कार्रवाई के लिए कोई ठोस सबूत नहीं है। हालांकि उत्तर प्रदेश की पुलिस की असलियत अपने कारणों से अलग जाहिर हो रही है। एक महिला से अश्लील चैटिंग के आरोप में फंसे एक एसएसपी ने मुख्यमंत्री और डीजीपी को चिट्ठी लिख कर पोल खोली है कि कैसे जिलों में एसपी के पद लाखों रुपए में बेचे जा रहे हैं और कौन-कौन बड़ा आदमी इसमें शामिल है। राज्य की पुलिस कैसे बलात्कार के आरोपियों को बचाने और पीड़ित को जेल में डालने या पीड़ित युवती के परिवार को जेल में बंद कर पिटाई करने के आरोपों में फंसी यह अलग कहानी है। उसी पुलिस ने जांच, गिरफ्तारी और इनकाउंटर का आतंक मचा रखा है कि लोग खुल कर पूछ भले नहीं रहे हों पर मन ही मन सोच रहे होंगे कि यह कब तक चलेगा!

गुरुवार को दिल्ली में जेएनयू के छात्रों ने प्रदर्शन का ऐलान किया और सुबह से ही लुटियन की दिल्ली तक पहुंचने वाले तमाम रास्तों पर या तो ट्रैफिक बंद कर दिया गया या रास्ते बदले गए, जिससे संसद मार्ग से लेकर रायसीना रोड, फिरोजशाह रोड, मंडी हाउस, बाराखंभा रोड, बहादुरशाह जफर मार्ग, इंडिया गेट के एप्रोच रोड जैसी दर्जनों सड़कों पर ट्रैफिक जाम लगा रहा। लोग घंटों परेशान होते रहे। उधर जामिया के इलाके में शाहीन बाग में पिछले एक महीने से 24 घंटे का धरना चल रहा है, जिसकी वजह से कालिंदी कुंज के रास्ते नोएडा को जोड़ने वाली सड़क या तो बंद है या ट्रैफिक जाम का शिकार है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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