क्या बज रहा भारत का डंका? - Naya India
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क्या बज रहा भारत का डंका?

कहां तो हल्ला मचा था कि पूरी दुनिया में भारत का डंका बज रहा है और दावा किया जा रहा था कि पहली बार भारत की बात को दुनिया गंभीरता से सुन रही है। भाजपा और सरकार के मंत्रियों का भी दावा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वजह से दुनिया में भारत की ताकत बढ़ी है। पर पहली बार कोई मामला आया और भारत दुनिया भर के देशों से घिर गया। भारत के समर्थन में बोलने वाले गिने-चुने मिलेंगे और विरोध में दर्जनों देश खड़े हो गए। राष्ट्रपति ट्रंप ने भी दिल्ली के दंगों को और कुछ हद तक सीएए को भारत का आंतरिक मामला बताया था पर कश्मीर के मामले में वे भी पंचायत के लिए तैयार हैं। उन्होंने भारत में साझा प्रेस कांफ्रेंस में भी कहा कि अगर दोनों देश यानी भारत और पाकिस्तान चाहें तो वे मध्यस्थता के लिए तैयार हैं। सवाल है कि जब भारत हजार बार कह चुका है कि उसे तीसरे पक्ष का दखल मंजूर नहीं है तो वह क्यों चाहेगा कि अमेरिका इसमें पंचायत करे? फिर भी ट्रंप बार बार यह बात दोहराते रहते हैं।

ध्यान रहे दुनिया के ज्यादातर देश, जिनमें यूरोपीय देश भी शामिल हैं, इस्लामोफोबिया से ग्रस्त हैं। वे इस्लामी कट्टरता या इस्लामी आतंकवाद को रोकने के लिए अपने यहां तरह तरह के उपाय भी कर रहे हैं। तभी भारत सरकार को उम्मीद रही होगी कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुस्लिमों को नागरिकता नहीं देने और इस्लामिक घुसपैठियों को रोकने के उसके कदम को दुनिया में समर्थन मिलेगा। पर ऐसा नहीं हुआ। उलटे दुनिया भर के देश भारत के खिलाफ हो गए या भारत को सांप्रदायिक सद्भाव की नसीहत देने लगे।

इसे क्या कहा जाए? यह भारत की कमजोर कूटनीति का नतीजा है या यह माना जाए कि भारत की विश्व हैसियत अभी ऐसी नहीं बनी है कि वह चाहे जो करे, कोई उसकी आलोचना नहीं कर सकता? गौरतलब है कि चीन ने अपने एक प्रांत में उइगर मुसलमानों पर दस किस्म की पाबंदियां लगाई हैं और उनको अपनी सामान्य धार्मिक मान्यताओं को मानने से भी रोका हुआ है। पर किसी की मजाल नहीं हो रही है कि चीन के खिलाफ चूं-चपड़ करे। उलटे सारे मुस्लिम देश भी उसकी लल्लो-चप्पो में लगे हैं। कारण यह है कि चीन की जरूरत सबको है। या तो भारत अपने को चीन जैसा मजबूत करे, अपनी जरूरत बनाए, दुनिया के देशों को अपने पर निर्भर करे या फिर ऐसी कूटनीति करे, जिससे दुनिया का कोई देश उसके आंतरिक मामलों में नहीं बोल पाए।

अनुच्छेद 370, सीएए, एनआरसी आदि के मसलों पर जिस तरह से भारत ने घरेलू प्रतिक्रिया का सही तरीके से आकलन नहीं किया, ऐसा लग रहा है कि उसी तरह अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया का भी आकलन भारत नहीं कर सका। उसको लगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप इस समय इस्लामिक आतंकवाद से लड़ने में लगे हैं और दुनिया इस्लामोफोबिया से ग्रस्त है तो आतंकवाद खत्म करने और घुसपैठ रोकने के नाम पर भारत को समर्थन मिल जाएगा।

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