नए क्षत्रपों के उभरने का साल - Naya India
हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप| नया इंडिया|

नए क्षत्रपों के उभरने का साल

जाते हुए साल की सबसे खास बात यह रही कि इसने देश को कम से कम चार नए क्षत्रप दिए हैं, जिनसे आने वाले दिनों में अलग अलग राज्यों की राजनीति प्रभावित होगी। चार महीने पहले तक किसी ने सोचा भी नहीं था कि महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार का कोई सदस्य चुनाव मैदान में उतरेगा और उस परिवार का कोई व्यक्ति राज्य का मुख्यमंत्री बनेगा। पर सारे अंदाजे गलत हुए। पहले आदित्य ठाकरे चुनाव मैदान में उतरे और चुनाव नतीजों के बाद उद्धव ठाकरे बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बाद मुख्यमंत्री बने।

इसके साथ ही महाराष्ट्र में एक नए दौर की राजनीति शुरू हो गई है। कई दशक तक भाजपा के साथ रह कर राजनीति करने वाली शिव सेना ने अपने को इस तरह से बदला, अपनी ऐसी पोजिशनिंग की, जिससे कांग्रेस और एनसीपी ने उसके साथ हाथ मिलाया। यह महाराष्ट्र नहीं देश के स्तर पर पैराडाइम शिफ्ट यानी राजनीति की पूरी वैचारिक धुरी को बदलने वाला घटनाक्रम है। इस एक घटनाक्रम में कई छोटी छोटी दूसरी घटनाएं भी हैं, जिन्होंने राजनीति को प्रभावित किया है। उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने से पहले भाजपा ने अजित पवार के साथ मिल कर तीन दिन की सरकार बनाई और इसके साथ ही भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी लड़ाई के स्टैंड के हमेशा के लिए खत्म कर लिया। शिव सेना, कांग्रेस और एनसीपी के मिल कर सरकार बनाने से हिंदुत्व और धर्मनिरपेक्षता दोनों की राजनीति सिरे से बदल गई है। अब महाराष्ट्र की राजनीति वैसी नहीं रह गई, जैसी अक्टूबर में हुए चुनाव से पहले थी।

महाराष्ट्र के चुनाव के साथ ही हरियाणा में विधानसभा के चुनाव हुए थे। इस चुनाव में हरियाणा को नया क्षत्रप मिला। जननायक जनता पार्टी बना कर पहली बार विधानसभा चुनाव में उतरे दुष्यंत चौटाला ने दस विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की और भाजपा के साथ मिल कर सरकार बनाई। ध्यान रहे हरियाणा में राजनीति तीन लालों- देवीलाल, बंशीलाल और भजनलाल के परिवारों के ईर्द-गिर्द घूमती रही है। भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने इसमें चौथा कोण बनाया था। पर ऐसा लग रहा है कि देवीलाल के पड़पोते ने हरियाणा की जाट राजनीति पर मजबूत दावेदारी कर दी है। दुष्यंत चौटाला के रूप में जाटों को नया नेता मिला है। हरियाणा की राजनीति में दुष्यंत एक मजबूत धुरी होंगे।

महाराष्ट्र और हरियाणा के बाद झारखंड में चुनाव हुए, जहां झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने भाजपा को निर्णायक रूप से हराया। इसका श्रेय जेएमएम के नेता हेमंत सोरेन को जाता है। हेमंत सोरेन पहले भी मुख्यमंत्री बने हैं पर वह चुनाव जीत कर नहीं बने थे। अपनी पार्टी की 19 सीटों की बदौलत वे कांग्रेस और दूसरी पार्टियों की मदद से मुख्यमंत्री बन गए थे। इस बार उनकी पार्टी ने ऐतिहासिक प्रदर्शन किया है और वे इस प्रदर्शन की धुरी बने हैं। उन्होंने अपने पिता शिबू सोरेन की बनाई पार्टी का विस्तार पूरे प्रदेश में किया है। शिबू सोरेन की कमान में जेएमएम संथालपरगना इलाके की पार्टी बनी रही पर हेमंत सोरेन की कमान में यह समूचे झारखंड की पार्टी बनी है। 81 सदस्यों की विधानसभा में जेएमएम ने 30 सीटें जीती हैं। यह उसका ऐतिहासिक प्रदर्शन है। झारखंड में आगे गठबंधन का जो भी भविष्य हो पर हेमंत सोरेन प्रदेश की राजनीति की सबसे मजबूत धुरी बने हैं। वे अपने पिता की विशाल छाया से बाहर निकल गए हैं और अपने दम पर एक बड़े नेता की छवि बनाई है।

देश की राजनीति में वर्ष 2019 में उभरे चौथे क्षत्रप जगन मोहन रेड्डी हैं। 2009 के विधानसभा चुनाव में भारी भरकम जीत के बाद जब उनके पिता वाईएसआर रेड्डी का हेलीकॉप्टर दुर्घटना में निधन हुआ तो कांग्रेस ने उनको मुख्यमंत्री नहीं बनाया था। इसके बाद पांच साल तक वे अपने पिता के नाम से राजनीति करते रहे। अंततः उनको जीत तभी हासिल हुई, जब उन्होंने अपने को पिता की छाया और विरासत से अलग किया। पिछले पांच साल उन्होंने गांव-गांव पदयात्रा करके ऐसी राजनीतिक मिसाल बनाई है, जिसे राजनीति करने के इच्छुक नेताओं को समझना चाहिए। आंध्र प्रदेश की राजनीति अब तक टीडीपी और चंद्रबाबू नायडू की धुरी पर घूमती थी पर अब मुख्य धुरी वाईएसआर कांग्रेस और जगन मोहन रेड्डी हैं।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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