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जाट लड़े, जिताए और रोए भी!

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बात जाट की ही नहीं है। हर उस हिंदू की है, जिसने सन् 2014 में नरेंद्र मोदी को यह सोच कर जिताया था कि हिंदुओं का सशक्तिकरण होगा। उनके सत्य से दुनिया मानेगी-जानेगी कि हिंदू सच्चे, स्वाभिमानी, साहसी और सनातनी-अच्छे संस्कारों में लोकतंत्र में क्या से क्या कर सकते हैं। दुनिया को हिंदुओं की चिंता और उसका आधुनिक समाधान समझ आएगा। पर हुआ क्या? दुनिया भारत को झूठ में और रोते-बरबाद होते देख रही है। क्या दुनिया ने भारत के किसानों को पिटते-गालियां सुनते नहीं देखा? जाट नेता को फूट-फूट कर रोते नहीं देखा? क्या ब्राह्मण अपनी संख्या के सबसे बड़े प्रदेश यूपी में अपमान, जलालत व उपेक्षा में जीते हुए नहीं हैं? पिछड़ों और उनके नेताओं ने अपमान के घूंट पीते क्या पांच साल नहीं गुजारे? क्या हिंदू और ज्यादा बिखरा व विभाजित नहीं है? jat politics Narendra modi

सात सालों के सत्य में यदि हिंदू राजनीति की कसौटी में भी सोचें तो हिंदू अधिक विभाजित और मुस्लिम एकजुट हुआ है? क्या किसी कांग्रेस राज में चरण सिंह या देवीलाल आदि किसी जाट नेता को वैसे रोता हुआ देखा गया, जैसे मोदी-योगी के राज में टिकैत को रोता देखा गया?

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कई मायनों में जाट और यूपी अब हिंदू राजनीति का आईना है। जैसे 2017 में था वैसा अब भी है। अमित शाह ने तब भी जाटों को बुलाकर पानीपत की तीसरी लड़ाई और मुसलमानों की याद करवाई तो इस बार भी जाटों को साढ़े छह सौ साल मुगलों से लड़ने का हवाला दे कर वोट मांगा। जैसे आपने लड़ाई लड़ी वैसे हम भी लड़ रहे हैं। सोचें, लड़ने के लिए लड़ने में साथ की अमित शाह की इस जुमलेबाजी में लड़ना कितना है और बनिए की चतुराई कितनी है? यदि यहीं बात होती तो भला कैसे किसानों को, हरियाणा-पंजाब-यूपी के जाट किसानों की साल भर दिल्ली की सीमाओ पर वह ठुकाई होती जो पहले कभी नहीं हुई। उन्हें देश विरोधी-और खालिस्तानी तक करार दिया गया। राकेश टिकैत जान बचा कर भागने की नौबत में फूट-फूट कर रोए। दूसरे शब्दों में मोदी और योगी के राज में हिंदुओं की रूलाई ज्यादा हुई या मुसलमान की?

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मोदीशाही का तर्क है कि हमने कर्ज दिया, पैसा बांटा और तीन जाट राज्यपाल व नौ सांसद बनाए। यहीं बात बाकि जातियों व हिंदू के लिए हैं लेकिन इस सबसे हिंदुओं में स्वाभिमान, साहस, समझ और मुसलमान या कथित देश विरोधियों से लड़ने का क्या कोई हौसला बना या उलटे सब बरबादी का जीवन जीते हुए है? उत्तर प्रदेश में योगी के ठोको राज में हिंदुओं याकि जातियों के जनप्रतिनिधियों, नेताओं और लोगों के मान-सम्मान पर क्या अधिक बुलडोजर नहीं चला? तभी तथ्य है कि यूपी में भाजपा के जनप्रतिनिधियों को अपने इलाके, अपने चुनाव क्षेत्र और जातीय आधार में जैसी नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है वह जमीन का यह हिंदू सत्य लिए हुए है कि उनके लड़ाने से हम लड़ते-लड़ते खुद ही लूट गए। मुसलमान ने पता नहीं कब जाट को रूलाया लेकिन मोदी-योगी राज में तो जाट रोया इसलिए वोट दे तो कैसे? यहीं सभी जातियों और भाजपा के 2017 के वोट आधार के असंख्य हिंदुओं की दुविधा होगी।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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