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कृषि कानून क्यों नहीं बदल रही सरकार?

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changing the agriculture law : केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसानों का आंदोलन शुरू होने के बाद संसद का दूसर सत्र शुरू होने वाला है। किसानों के साथ सरकार ने आखिरी बार 22 जनवरी को बात की थी। उसके बाद किसानों से बात करने और आंदोलन खत्म कराने का कोई प्रयास नहीं हुआ है। सरकार की ओर से बार बार कहा जा रहा है कि कानूनों को रद्द करने के अलावा बाकी हर मुद्दे पर वह किसानों से बात करने को तैयार है। अब तो किसानों के हितैषी और विपक्ष के महत्वपूर्ण नेता शरद पवार ने भी कह दिया है कि कानून पूरी तरह से रद्द करने की जरूरत नहीं है, बल्कि जिन प्रावधानों से किसानों को आपत्ति है उन्हें बदला जाए।

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तभी सवाल है कि केंद्र सरकार इन कानूनों को बदलने की पहल क्यों नहीं कर रही है? सरकार ने किसानों के साथ आखिरी बार बातचीत से पहले कुछ बदलावों पर सहमति जताई थी। तीनों कानूनों को मिला कर कोई एक दर्जन प्रावधान थे, जिन्हें बदलने को सरकार तैयार थी। सरकार ने खुद कहा था कि वह कांट्रैक्ट पर खेती की मंजूरी देने वाले कानून में अदालत में सुनवाई का प्रावधान करने को राजी है। अभी तक कांट्रैक्ट पर खेती वाले कानून में यह प्रावधान है कि किसी तरह का विवाद होने पर एसडीएम के यहां सुनवाई होगी। changing the agriculture law.

इस तरह से कानूनों में कई छोटे-छोटे बदलावों के लिए सरकार राजी हो गई थी। अगर सरकार सचमुच इनके प्रति गंभीर है तो इन बदलावों को लागू क्यों नहीं किया जा रहा है। सरकार तीनों कानूनों में जरूरी संशोधन का प्रस्ताव संसद में ला सकती है। उसके बाद सरकार बदले हुए कानून को सामने रख कर किसानों से बात करे तो विवाद सुलझाने में आसानी होगी। सरकार को इससे राजनीतिक फायदा भी संभव है क्योंकि पवार की पार्टी इन बदलावों का समर्थन कर सकती है। इससे संसद में विपक्ष बंटा हुआ दिखेगा। उसके बाद सरकार के ऊपर कानून को पूरी तरह से रद्द करने का दबाव कम होगा। अगर सरकार गंभीर होती और वह किसान आंदोलन खत्म कराने के बारे में गंभीरता से सोच रही होती तो उसका पहला कदम यह होता कि वह अपनी तरफ से पहल करके कानूनों में संशोधन करती।

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ऐसा लग रहा है कि सरकार इस चिंता में संशोधन नहीं कर रही है कि एक बार फिर संसद में किसान कानून का मुद्दा आया तो विपक्ष को हंगामा करने का मौका मिलेगा। ध्यान रहे पहली बार जब कानून पास कराया गया था तब राज्यसभा में बहुत विवाद हुआ था और विपक्ष के सांसदों को निलंबित भी किया गया था। उस किस्म के किसी विवाद से बचने के लिए सरकार चुपचाप बैठी है। वह न तो किसानों से बात कर रही है और कानून में अपनी तरफ से कोई संशोधन कर रही है। उलटे कृषि क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को मजबूती देने के एक लाख करोड़ रुपए के प्रावधान का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। हालांकि किसान ऐसी किसी बात के असर में नहीं आ रहे हैं।

तभी ऐसा लग रहा है कि संसद के मॉनसून सत्र पर किसान आंदोलन की छाया रहेगी। किसानों ने तय किया है कि वे 22 जुलाई से हर दिन संसद के सामने प्रदर्शन करने जाएंगे। संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा है कि हर दिन दो सौ किसान दिल्ली जाएंगे और प्रदर्शन करेंगे। यह तय है कि पुलिस ऐसे किसी प्रदर्शन की इजाजत नहीं देगी। लेकिन अगर दो सौ किसानों का जत्था दिल्ली की ओर मार्च करेगा तो पुलिस उसे कहां रोकेगी? क्या किसानों को जंतर-मंतर या संसद मार्ग तक पहुंचने दिया जाएगा? अगर किसान जंतर-मंतर या संसद मार्ग तक पहुंच गए और वहां से नहीं लौटे तो क्या होगा? फिर दिल्ली किसान आंदोलन का केंद्र बन जाएगा।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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