ताला न खोलें, खिड़की खुले!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्रियों की वीडियो कांफ्रेंस ने वायरस से लड़ने की एप्रोच के बदलने का खटका बनाया है। सरकार आर्थिकी का भट्ठा बैठने की चिंता में है। प्रधानमंत्री ने 14 अप्रैल के बाद कैसे ताला खोलने का रास्ता बने, इसके मुख्यमंत्रियों से एक्जिट सुझाव मांगे हैं। कैबिनेट सचिव ने पहले ही बताया हुआ है कि 14 अप्रैल बाद तालाबंदी बढ़ाने की सोच नहीं है। जाहिर है देश की माली, खाली आर्थिक स्थिति में परिवहन, निर्यात और खाद्य-उपभोक्ता सामान के उद्योग के चक्के फिर शुरू करने पर सरकार में सोच-विचार है। शायद यह सोचा जाए कि वायरस से सर्वाधिक प्रभावित इलाकों, हॉटस्पॉट को चिन्हित कर वहां तालाबंदी महाकर्फ्यू की तरह रहे और शेष देश में सामाजिक दूरी के साथ रूटिन कामधंधे चले व जिंदगी सामान्य बने। मतलब जैसे अभी भी अमेरिका के कुछ राज्य बिना लॉकाडाउन के हैं, ब्रिटेन में न्यूनतम सेवाएं चलने दी गई वैसा 14 अप्रैल के बाद भारत में हो।

जाहिर है बिना आगा-पीछे सोचे जैसे 21 दिन की तालांबदी घोषित हुई वैसे ही अब आर्थिकी के एकदम जाम होने, सप्लाई चेन भी न होने, खेतों में खड़ी फसल की कटाई, मंडी के तमाम रास्ते बंद होने के पैनिक में विचार हो रहा है। मतलब बिना आंकड़ों, बिना मेडिकल तैयारी और भारत में वायरस के फैलाव के वैज्ञानिक-आंकड़ा आधारित विश्लेषण पर बने संभावी अलग-अलग सिनेरियो, बिना रोडमैप के तालाबंदी हटाने का आइडिया भारत सरकार में जोर मार रहा है।

ऐसा करना बहुत घातक होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार आर्थिकी को अगस्त तक भूल जाए। जब विकसित देश अपनी आर्थिकी नहीं बचा सकते और डोनाल्डी ट्रंप भी तालाबंदी मानने को मजबूर हैं, जब अमेरिका में कोरोना वायरस का पीक जून-जुलाई तक जाता लगता है तो भारत के लिए अगस्त तक तालाबंदी में रहना अनिवार्यता है। तालाबंदी को खत्म करने की सोचना भी नहीं चाहिए।

पर भारत अंधविश्वास में जीने वाला है। यदि कोई भारतीयों के बीच आज जनसर्वेक्षण करे तो भारत का औसत नागरिक आज यह सोचते हुए मिलेगा कि 14 अप्रैल के बाद भारत में गर्मी वायरस को मार देगी। भारत में स्पेन, इटली जितने बूढ़े नहीं हैं, नौजवान आबादी से वायरस दबा रहेगा या यह धारणा कि काढ़ा पीने, शाकाहार से हमारा इम्यून सिस्टम ज्यादा मजबूत है। ऊपर से ज्योतिष की यह गणित अलग चली हुई है कि 14 अप्रैल के बाद गुरू की वक्र दृष्टि या शुक्र-शनि की ग्रह चाल में परिवर्तन से कोरोना वायरस मरा मिलेगा।

ईश्वर करे 130 करोड़ लोगों पर ऐसी विशेष मेहरबानी हो। पर मैं चीन, अमेरिका, स्पेन, इटली, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर के वायरस अनुभव और इंपीरियल कॉलेज, लंदन, अमेरिकी जॉन हापकिंस विश्वविद्यालय के रिसर्चरों, उनके प्रोजेक्शन-अध्ययन, सीएनएन-बीबीसी-इकॉनोमिस्ट आदि वैश्विक मीडिया पर वैश्विक वैज्ञानिकों-चिकित्सकों के निचोड़ में विश्वास करता हूं और उस अनुसार अपना मोटा आकलन है कि मई तो भारत में वायरस के पीक की और बढ़ने का मोड होगा। सो, अप्रैल-मई का महीना भारत का वह पहला चरण होगा जब सरकारों को समझ आने लगेगा कि कितने अस्पताल चाहिए, कितने बिस्तर, मास्क, वेंटिलेशन चाहिए। भारत में अमेरिका की आज वाली स्थिति मई-जून में बनना शुरू होगी।

तभी कल्पना करें कि 14 अप्रैल को तालाबंदी खत्म हो और रेल-बस सेवा याकि परिवहन की न्यूनतम (दिल्ली-मुंबई में मेट्रो-लोकल ट्रेन आदि) सेवा भी शुरू हुई तो वायरस को आवाजाही का क्या भयावह मौका नहीं मिलेगा? तथ्य ध्यान में रहे कि 14 अप्रैल तक भारत में टेस्ट भी पर्याप्त संख्या में शुरू नहीं होने वाले है। तालाबंदी के पहले दस दिनों में जिस कछुआ अंदाज में टेस्टिंग आगे बढ़ी है उससे कई गुना अधिक रफ्तार में अकेले तबलिगियों ने ही कोरोना को पूरे भारत में फैला दिया है। उनसे पहले एयरपोर्ट के जरिए दुनिया भर से आए भारतीयों में से वायरस कितना फैला होगा, इसकी टेस्टिंग की अपर्याप्तता के चलते हमें थाह नहीं है।

इसलिए आर्थिकी, देश को चालू करने का ख्याल ही दिमाग से निकाले रहना चाहिए। अगस्त तक सबको घर में बैठाए रख कर भजन करवाओ। मगर हां, वायरस से ही लड़ाई की प्राथमिकता में सरकार तालाबंदी के बीच खिड़की खोल लोगों की नियंत्रित आवाजाही होने दे। मतलब महानगरों-शहरों में लंबी तालाबंदी के सिनेरियो को सोचते हुए झुग्गी-झोपड़, कच्ची बस्ती, सघन बस्तियों को लोगों से खाली करवाने का वह सिस्टम बने, जिससे लोग अपने गांव, अपने मूल घर जा सकें। खिड़की खोलने के छोटे-गुपचुप तरीके से ही जरूरी सामान के ट्रांसपोर्टेशन, सप्लाई चेन जैसी व्यवस्थाएं बनाई जा सकती हैं।

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