Lok sabha election 2022 नेताओं की महत्वाकांक्षा बाधा है
हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप| नया इंडिया| Lok sabha election 2022 नेताओं की महत्वाकांक्षा बाधा है

नेताओं की महत्वाकांक्षा बाधा है

अगले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनने की कोशिश कर रहे विपक्ष के नेताओं की महत्वाकांक्षा उनके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है। पिछले दो-ढाई दशक से प्रधानमंत्री बनने की राजनीति कर रहे नेताओं में से ज्यादातर का करियर खत्म हो गया है या अब वे रेस से बाहर हो चुके हैं। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद, चंद्रबाबू नायडू आदि नेता अब हाशिए पर हैं। उस पीढ़ी के नेताओं में अकेले शरद पवार बचे हुए हैं, जिनकी दावेदारी अब भी बरकरार है। उनके अलावा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तीन ऐसे नेता हैं, जिन्होंने खुल कर अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर की है और प्रयास किया है या कर रहे हैं। कांग्रेस की ओर से घोषित दावेदार राहुल गांधी हैं और विपक्ष की ओर से अघोषित नेता या डार्क हॉर्स के तौर पर अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे का नाम आता है। हालांकि इन सबकी कुछ न कुछ सीमाएं हैं।

बड़ा सवाल है कि इनमें से कौन ऐसा नेता है, जो अगले चुनाव में नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सकता है? यह तो तय है कि कोई एक पार्टी अपने संगठन या नेता के दम पर भाजपा और उसके नेता को चुनौती नहीं दे सकती है। भाजपा अब इतनी बड़ी पार्टी हो गई है और नरेंद्र मोदी का चेहरा इतना बड़ा हो गया है कि उन्हें चुनौती देना आसान नहीं है। चुनौती साझा विपक्ष की ओर से ही दी जा सकती है। लेकिन क्या विपक्ष के नेता किसी एक के चेहरे पर सहमत होंगे? और पूरी ताकत के साथ उसकी मदद करेंगे? इसकी संभावना कम है क्योंकि हर नेता की अपनी महत्वाकांक्षा हैं। ऊपर से सबने यह गलतफहमी पाली हुई है कि 2024 के चुनाव में नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ 10 साल की एंटी इनकम्बैंसी होगी और ज्यादातर राज्यों में भाजपा की सरकारों के खिलाफ भी एंटी इनकम्बैंसी होगी इसलिए अपने आप विपक्ष के लिए मौका बनेगा।

सो, अपनी महत्वाकांक्षा और 2024 के चुनाव को लेकर बनी गलतफहमी की वजह से हर नेता अपने लिए मौका देख रहा है। शरद पवार की उम्र 80 साल हो गई है और सेहत भी ठीक नहीं रहती है इसलिए उनकी पार्टी मान रही है कि यह उनके लिए आखिरी मौका है। ममता बनर्जी  भी 67 साल की हो गई हैं और 2024 के चुनाव तक 69 साल की हो चुकी होंगी। इसलिए वे भी 2029 का इंतजार करने की स्थिति में नहीं हैं। उद्धव ठाकरे के साथ सेहत की समस्या है। अगर वे ठीक हो जाते हैं और विपक्ष के साथ उनका गठबंधन जारी रहता है तो वे हिंदुवादी चेहरे के साथ विपक्ष की ओर से साझा उम्मीदवार के तौर पर अच्छा चेहरा हो सकता है। उनके अलावा राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव अपेक्षाकृत युवा हैं और 50 साल की उम्र के ऊपर-नीचे हैं। इन सबके लिए आगे भी मौका बन सकता है। दक्षिण भारत के नेताओं में एमके स्टालिन तमिलनाडु की राजनीति से बाहर निकलने की न तो स्थिति में हैं और उसके लिए तैयार हैं। के चंद्रशेखर राव जरूर भागदौड़ कर रहे हैं और वे हाल ही में राजद के नेता तेजस्वी यादव से मिले हैं। पहले भी उन्होंने विपक्षी एकता का प्रयास किया था लेकिन वे विपक्ष को एकजुट नहीं कर सकते हैं। चंद्रबाबू नायडू के साथ मुश्किल यह है कि उनके यहां विधानसभा का चुनाव लोकसभा के साथ ही होगा। इसलिए संभव नहीं है कि वे 2024 में अपना विधानसभा चुनाव छोड़ कर लोकसभा में विपक्षी एकजुटता बनाने का प्रयास करें।

अगर मौजूदा स्थिति की बात करें तो कुल मिला कर कांग्रेस और राहुल गांधी के प्रति ज्यादातर विपक्षी पार्टियों का सद्भाव है। स्टालिन उनका समर्थन करते हैं तो लालू और तेजस्वी यादव भी उनके साथ हैं। शिव सेना के नेता भी उनका समर्थन कर रहे हैं। ममता बनर्जी को रोकने के लिए लेफ्ट पार्टियों का बिना शर्त समर्थन भी राहुल गांधी को मिल सकता है। लेकिन राहुल को साझा विपक्ष का नेता बनने के लिए इतना काफी नहीं होगा। अभी की स्थिति में न ममता बनर्जी उनका समर्थन करती दिख रही हैं और न अरविंद केजरीवाल। शरद पवार की स्थिति भी संशय वाली है। इन तीनों नेताओं की महत्वाकांक्षा विपक्ष की एकता के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बनेगी। ममता और पवार अपने लिए आखिरी मौका मान कर दांव लगाएंगे तो केजरीवाल का प्रयास किसी तरह से राहुल और प्रियंका को रोकना होगा ताकि आगे अपने लिए रास्ता बना रहे।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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