बेरोजगारों का दर्द बहुत बड़ा है

सरकार भले इनकार करे पर बेरोजगारी के आंकड़े भयावह हैं। बेरोजगारी की भयावह तस्वीर जमीन पर दिख रही है। सरकार का श्रम व नियोजन मंत्रालय अपनी ओर से बेरोजगारी का कोई आंकड़ा नहीं पेश कर रहा है। उसने तो प्रवासी मजदूरों के बारे में भी कह दिया कि शहरों से पलायन करने में कितने मजदूर बने और कितने लोगों ने नौकरी गंवाई उसका रिकार्ड सरकार के पास नहीं है। सो, उससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वह बेरोजगारी का आंकड़ा पेश करेगी। यह भी इस सरकार की राजकाज की शैली है कि जानकारी नहीं देंगे। लेकिन बेरोजगारी का आंकड़ा और पीएम-केयर्स फंड के आंकड़े में फर्क है। पीएम-केयर्स फंड की जानकारी नहीं देने पर लोगों को पता नहीं चलेगा पर बेरोजगारी ऐसी चीज है, जिसे सरकार छिपा नहीं सकती है। अब उसे लोग महसूस करने लगे हैं।

बेरोजगारी का आंकड़ा देने का काम सेंटर फॉर म़ॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी, सीएमआईई ने किया है। उसने भारत की बेरोजगारी का आंकड़ा बहुत विस्तार से पेश किया है। सीएमआईई ने बताया है कि भारत में दो करोड़ दस लाख वेतनभोगियों की नौकरी गई है। अप्रैल से लेकर अगस्त के अंत तक ये नौकरियां गई हैं। अप्रैल में भारत में वेतनभोगियों की कुल संख्या साढ़े करोड़ से कुछ ज्यादा थी, इसमें दो करोड़ दस लाख की कमी आ गई है। अब साढ़े छह लाख से कुछ कम वेतनभोगी भारत में है। सीएमआईई ने यह भी बताया है कि 66 लाख व्हाइट कॉलर जॉब कम हुए हैं। इनमें सबसे ज्यादा इंजीनियर हैं।

इंजीनियर या दूसरे पेशेवरों ने नरेंद्र मोदी को पिछले दो चुनावों में सबसे ज्यादा पसंद किया था और उनकी मदद में दिन-रात एक किया था। नौकरी से छुट्टी लेकर पेशेवरों ने उनके लिए लिए काम किया था। जब भाजपा का अपना आईटी सेल नहीं बना था या इतना मजबूत नहीं हुआ था तब इन्हीं लोगों ने सोशल मीडिया में मोदी का प्रचार किया था। पर आज सबसे बड़ा खतरा इनकी नौकरियों पर है। सरकारी और निजी दोनों सेक्टर सिकुड़ रहे हैं। अर्थव्यवस्था की खराब हालत से कंपनियां छंटनी कर रही हैं। तभी जो वर्ग छह-सात साल पहले नरेंद्र मोदी का सबसे बड़ा समर्थक बना था उसका मोहभंग हुआ है। वह मोहभंग कई तरह से दिख रहा है। प्रधानमंत्री के भाषणों की वीडियो को लाइक से ज्यादा डिसलाइक मिलना एक संकेत है। डिसलाइक इतनी ज्यादा हो गई कि यूट्यूब पर प्रधानमंत्री के वीडियो को लाइक, डिसलाइक या कमेंट करने के विकल्प को बंद करना पड़ा। दूसरा संकेत 17 सितंबर को दिखा, जब हैशटैग राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस ट्विटर पर ट्रेंड करता रहा। 25 लाख से ज्यादा लोगों ने ट्विट करके इसे ट्रेंड कराया।

असल में पिछले कुछ दिनों से युवा, छात्र और नौकरी कर रहे पेशेवर कई कारणों से सरकार से नाराज हुए हैं। इंजीनियरिंग और मेडिकल में दाखिले के लिए होने वाली जेईई मेन्स और नीट की परीक्षा हो, बंद पड़े स्कूल-कॉलेजों की फीस भरने का मामला हो या रोजगार का मामला हो। यह वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। दो करोड़ दस लाख वेतनभोगियों की नौकरी जाने का मतलब है कि दो करोड़ परिवार, जिनमें हर महीने एक निश्चित तारीख को वेतन के पैसे आते थे, वो संकट में आए हैं। इस तरह से मोटे तौर पर दस करोड़ लोगों का जीवन प्रभावित हुआ है। इसमें अगर स्वरोजगार करने वाले 12 करोड़ लोगों के रोजगार छीन जाने का आंकड़ा शामिल  करें तो यह संख्या बहुत बड़ी हो जाती है। यह नाराजगी अब जमीनी आंदोलनों से लेकर सोशल मीडिया तक में जाहिर होने लगी है। तभी यह अनायास नहीं है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि अगर उसे मीडिया के नियमन का कानून बनाना है तो सबसे पहले डिजिटल मीडिया के नियमन का कानून बनाया जाए। जिस डिजिटल मीडिया ने भाजपा और नरेंद्र मोदी का सबसे ज्यादा साथ दिया उसे ही नियमित करने की जरूरत सबसे पहले महसूस हो रही है तो इसका मतलब है कि आम लोगों की भावना वहां प्रकट होने लगी है। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया को लेकर सरकार चिंता में नहीं है।

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