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हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप| नया इंडिया|

राष्ट्रीय बनाम स्थानीय मुद्दों का चुनाव

इस बार राज्यों का चुनाव इस लिहाज से बहुत दिलचस्प है कि केंद्र और दोनों राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा राष्ट्रीय मुद्दों के आधार पर चुनाव लड़ना चाह रही है। महाराष्ट्र और हरियाणा में दोनों जगह भाजपा ने पांच साल सरकार चलाई है। केंद्र और दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में डबल इंजन की सरकार थी। पर दोनों राज्यों में डबल इंजन की सरकार की उपलब्धियां कोई नहीं बता रहा है। जिस तरह दिल्ली में अरविंद केजरीवाल अपनी उपलब्धियों का प्रचार कर रहे हैं उस तरह महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा की सरकार ने अपनी उपलब्धियों का प्रचार नहीं किया। उन्होंने अपने काम का प्रचार जरूर किया पर दोनों राज्यों के नेताओं को पता है कि उन्होंने राष्ट्रीय मुद्दों पर चुनाव लड़ना है।

दोनों राज्यों में चुनावों की घोषणा से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा की रैलियां हुईं। इन रैलियों में सबने जोर शोर से जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को खत्म किए जाने को मुद्दा बनाया। इसके अलावा मुस्लिम समाज मे प्रचलित तीन तलाक की प्रथा को अपराध बनाने का कानून पास कराने का भी जोर शोर से जिक्र किया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने कैसे सारी दुनिया में भारत का मान बढ़ाया है यह भी प्रचार का विषय रहा। असल में इन दोनों राज्यों के चुनाव में अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर ही भाजपा वोट मांग रही है और इस भरोसे में है कि निश्चित जीत हासिल करेगी।

यह एक भावनात्मक मुद्दा है, जिसे भुनाने का भाजपा को पूरा भरोसा है। तीन तलाक कानून और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, के जरिए मुस्लिम महिलाओं का वोट भाजपा को नहीं लेना है, बल्कि उसके जरिए हिंदू समाज में यह मैसेज दिया गया है कि केंद्र की भाजपा सरकार ने मुसलमानों को ठीक करना शुरू कर दिया है और जल्दी ही समान नागरिक संहिता भी लागू हो जाएगी। इसी तरह राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, एनआरसी के जरिए भी हिंदू बहुसंख्या को यह मैसेज दिया जा रहा है कि सरकार मुस्लिम घुसपैठियों को छोड़ेगी नहीं। एक लिहाज से यह अनुच्छेद 370, तीन तलाक, एनआरसी आदि के ऊपर जनमत संग्रह की तरह है। हालांकि राष्ट्रीय मुद्दों में ही आर्थिक संकट का भी मुद्दा है। पर उस पर भाजपा क्यों बोलेगी। उसे बोलना भी है तो वह पांच हजार अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की बात करती है।

यह विपक्षी पार्टियों के ऊपर है कि वे आर्थिक मंदी को कितना बड़ा मुद्दा बना सकते हैं। हरियाणा के मानेसर में मारूति कंपनी की फैक्टरी है, जहां लगातार उत्पादन गिर रहा है। मारूति और दूसरी कारों की बिक्री कम हो रही है। लोगो के रोजगार जा रहे हैं। पता नहीं विपक्ष इस राष्ट्रीय संकट को मुद्दा बना पाता है या नहीं। बहरहाल, एक तरफ भाजपा अनुच्छेद 370, तीन तलाक, एनआरसी आदि का मुद्दा बना रही है तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टियां आर्थिक मंदी के साथ साथ दोनों राज्यों की सरकारों के कामकाज पर फोकस कर रही हैं। राज्यों में कांग्रेस, एनसीपी या इनेलो के नेताओं का सारा फोकस मुख्यमंत्रियों के कामकाज पर है। वे उसमें कमियां निकाल रहे हैं। उन्हें विफल बता रहे हैं। राज्यों में विपक्षी पार्टियों के नेता नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने से बच रहे हैं। वे चुनाव को स्थानीय मुद्दों पर ही सीमित रखना चाहते हैं। उनको पता है कि अगर चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर राष्ट्रीय नेतृत्व के चेहरे पर हुआ तो उनके लिए कोई संभावना नहीं बचेगी।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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