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Saturday, April 17, 2021
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न आंदोलन हो और न आलोचना

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हरिशंकर व्यासhttp://www.nayaindia.com
भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था।आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य।संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

देश देश में इससे पहले भी केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों या फैसले के खिलाफ आंदोलन होते रहे हैं। मनमोहन सिंह की सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में जितने आंदोलन और प्रदर्शन देखे, उसकी मिसाल आजाद भारत के इतिहास में नहीं है। लेकिन आंदोलन करने वालों को न तो देशद्रोही कहा गया, न उनके लिए टुकड़े टुकड़े गैंग का जुमला गढ़ा गया और न उनको चीन, पाकिस्तान का एजेंट ठहराया गया। पिछले साढ़े छह साल में यह सब बदल गया है। लोगों ने पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले पर टिप्पणी की तो राजद्रोह का मामला दर्ज हुआ। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ लिखा या बोला तो राजद्रोह के मामले दर्ज हुए। किसान आंदोलन के समर्थन में लिखने-बोलने पर राजद्रोह के मामले दर्ज हो रहे हैं। यहां तक कि उत्तर प्रदेश के हाथरस या उन्नाव में बलात्कार और हत्या की घटना हुई तो उसके बारे में भी लिखने-बोलने पर राजद्रोह की धाराएं लगा दी गईं।

लोकतंत्र में असहमति और आलोचना लोगों का मौलिक अधिकार है। इसके बिना किसी सफल लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती है। लेकिन पिछले साढ़े छह साल में सबसे ज्यादा मेहनत असहमति की आवाजों को दबाने के लिए किया गया है। इसके लिए अनेक किस्म की यांत्रिकी ईजाद की गई। आईटी सेल बना कर हजारों की संख्या में साइबर सोल्जर बहाल किए गए। उनकी मदद से सरकार के आलोचकों को देशद्रोही ठहराया गया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल इसी काम के लिए किया गया। जब ऐसा लगने लगा कि सोशल मीडिया का मूड बदल रहा है और वहां सरकार अपनी बढ़त खो रही है तो लोगों के ऊपर राजद्रोह के मुकदमे होने लगे। साथ के साथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स चला रहीं कंपनियों को धमकाया गया। कई कंपनियों में अधिकारियों को दबाव में इस्तीफा देना पड़ा और जब उससे काम नहीं चला तो डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए नए कानून का मसौदा जारी कर दिया गया। सवाल है कि आखिर चुनी हुई सरकार को अपने ही नागरिकों की आलोचना से इतना डर क्यों लग रहा है? क्यों सरकारें असहमति की आवाज को दबाने का प्रयास कर रही है? क्यों विरोधी पार्टियों को दुश्मन माना जाने लगा है?

यह कैसा लोकतंत्र बनाया जा रहा है कि नागरिक महंगाई की शिकायत करें तो उनको देशद्रोही ठहराया जाए? क्या सरकार चाहती है कि लोकतंत्र मतदान केंद्रों पर खत्म हो जाए? लोग वोट डाल कर अपना नागरिक कर्तव्य भूल जाएं? लोगों ने जिस विपक्ष को चुना है क्या वह अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाए? असल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पूरी राजनीति प्रचार के जरिए बनाई गई धारणा पर आधारित है। उनकी राजनीतिक सफलता भी धारणा पर आधारित है। उन्होंने अपनी छवि को लेकर एक धारणा बनवाई है। मुश्किल यह है कि वास्तविकता के धरातल पर धारणा की राजनीति ज्यादा समय तक नहीं चलती है। जैसे अब लोगों के सामने गुजरात मॉडल की हकीकत भी खुलने लगी है और मर्द हिंदुवादी नेता होने की भी सचाई सामने आने लगी है। सोशल मीडिया ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है। इसलिए अगर सोशल मीडिया पर रोक नहीं लगाई गई या लोगों को आलोचना से नहीं रोका गया तो धारणा बदलते देर नहीं लगेगी। और उसके बाद सारी राजनीतिक सफलता हवा में उड़ जाएगी।

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