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Friday, May 14, 2021
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कितना कुछ बदल गया

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हरिशंकर व्यासhttp://www.nayaindia.com
भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था।आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य।संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

कोरोना वायरस की महामारी शुरू होने के बाद एक साल में कितना कुछ बदल गया है। इसमें कुछ बदलाव अच्छे हैं तो कुछ खराब और कुछ बहुत खराब। इनके अलावा कुछ ऐसे भी बदलाव हैं, जो पहले भी मायने नहीं रखते थे और अब तो खैर उनका कोई मतलब ही नहीं है। जैसे कोरोना वायरस का संक्रमण शुरू हुआ तो ताली-थाली बजवाई गई, घरों के बाहर दीये जलवाए गए, अस्पतालों के ऊपर हेलीकॉप्टर से फूल बरसाए गए और सेना की बैंड से धुन बजवाई गई। कहा गया स्वास्थ्यकर्मियों के प्रति आभार जताने के लिए ऐसा है। तो क्या अब उनके प्रति आभार जताने की जरूरत नहीं है? अगर है तो फिर क्यों नहीं ऐसा कोई इवेंट हो रहा है? अगर उस समय ताली-थाली बजाने से ऐसी कॉस्मिक वेब्स उत्पन्न हो रही थीं, जिनसे कोरोना खत्म हो रहा था तो अब भी वैसा कुछ आयोजन होना चाहिए। लेकिन हुआ इसके उलटा है। जितने लोगों ने ज्यादा जोर-शोर से ताली-थाली बजाई थी वे सब लोग कोरोना संक्रमित मिले हैं। महानायक अमिताभ बच्चन से लेकर क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर तक और परेश रावल से लेकर अक्षय कुमार तक!

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एक साल में एक बड़ा बदलाव यह है कि अपनी दवाओं से कोरोना का इलाज करने या कोरोना को रोक देने का दावा करने वाले बाबा रामदेव गायब हो गए हैं। वे खुद और उनकी कोरोनिल का कहीं अता-पता नहीं है। हैरानी की बात है कि उनकी कथित दवा का प्रचार देश के पढ़े-लिखे और डॉक्टरी की डिग्री रखने वाले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने खुद किया था। लेकिन अब वे भी रामदेव की दवा छोड़ कर वैक्सीन के प्रचार में बिजी हो गए हैं।

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पहली लहर में धर्मादा करने वाले, लंगर चलाने वाले, लोगों की मदद करने वाले लोग और संस्थाएं भी गायब हो गई हैं। सोनू सूद भी अब लोगों को नौकरी आदि दिलाने जैसे कुछ काम करने लगे हैं। क्या धर्मादा चलाने वाले लोगों के पैसे खत्म हो गए? कोई हैरानी नहीं होगी क्योंकि प्यू रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना महामारी के दौरान 2020 में भारत में साढ़े सात करोड़ गरीबों की संख्या बढ़ी है। करीब सवा तीन करोड़ मध्य वर्गीय लोग गरीबों की श्रेणी में आ गए हैं। सोचें, एक गरीब को मध्य वर्ग में आने में औसतन सात पीढ़ी का समय लगता है। लेकिन एक साल में सवा तीन करोड़ लोग मध्य वर्ग से गरीब वर्ग में आ गए। यानी औसतन 45 हजार रुपया महीना कमाने वाले सवा तीन करोड़ लोग साढ़े चार हजार रुपया महीना कमाने वाली श्रेणी में आ गए। फिर धर्मादा कौन करेगा? अमीर तो अपनी संपत्ति बढ़ाने में लगे हैं!

दिल्ली, मुंबई, सूरत और दूसरे कारोबारी केंद्रों में लगाई जा रही पाबंदियों से घबरा कर एक बार फिर प्रवासी मजदूरों का पलायन शुरू हो गया है पर इस बार इसका कहीं हल्ला नहीं दिख रहा है। प्रवासी मजदूरों के पलायन और दिल्ली, मुंबई में रेलवे स्टेशनों पर बढ़ी भीड़ में एक बदलाव यह है कि इस बार सिर्फ पुरुष सदस्य भाग रहे हैं। उनके साथ महिलाएं या छोटे-छोटे बच्चे नहीं हैं। जाहिर है महामारी में हजार मुसीबत झेल कर गांव लौटे मजदूर इस बार काम पर लौटे तो अकेले आए। उन्होंने महिलाओं, बच्चों को गांव में ही छोड़ा हुआ है। इस बार उनकी मदद करने वाले लोग भी नहीं दिख रहे हैं।

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इस बार एक फर्क तबलीगी जमात बनाम कुंभ मेले के आयोजन का भी है। पिछले साल अप्रैल-मई में तबलीगी जमात का हल्ला मचा था। सारे टेलीविजन चैनल देश में बढ़ रहे कोरोना संक्रमण के लिए तबलीगी जमात को जिम्मेदार ठहरा रहे थे। दिल्ली से लेकर हैदराबाद, पटना, रांची तक इस बात की पड़ताल हो रही थी कि दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज में तबलीगी जमात के जो लोग आए थे, वे कहां कहां लौटे और उन्होंने कितना कोरोना फैलाया। सरकार, पुलिस, अदालत सब उसी में बिजी थे। आज हरिद्वार में कुंभ मेले का आयोजन हो रहा है और राज्य के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने लोगों से बड़ी संख्या में उसमें हिस्सा लेने की अपील की  है। साथ ही यह भी कहा कि कोई भी कोरोना किसी आस्थावान का कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। सोचें, इसी आस्था के नाम पर मरकज में इकट्ठा हुए तबलीगी जमात के लोगों को विलेन बनाने वाला मीडिया कुंभ में भीड़ जुटाने वाली अपील पर खामोश है।

कोरोना वायरस के एक साल का कुल जमा हासिल यह है कि लोग इस वायरस को पहचान गए हैं और उनका डर खत्म हो गया है। अब पहले की तरह खौफ नहीं है। लोगों में छूत का वैसा  भाव नहीं है। किसी को खांसते-छींकते देख कर भाग खड़े होने की स्थिति अब नहीं है। अब अस्पतालों में भी पीपीई किट पहने डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी नहीं दिखते। उनके हाथों में दस्ताने और चेहरे पर मास्क भर होता है। दूसरी लहर आने के बाद श्मशानों में भीड़ बढ़ने लगी है पर यह स्थिति नहीं है कि लोग अपनों की लाश को छूने से इनकार कर रहे हैं। यह अच्छा बदलाव है कि लोग भय से उबर कर सामाजिक, पारिवारिक और निजी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने लगे हैं। लोगों में कोरोना का भय खत्म हुआ है पर ऐसा नहीं है कि चिंता मिट गई है। जान का खौफ कम हुआ है पर जहान की चिंता बढ़ गई है। तभी लोग नहीं चाहते हैं कि सरकार लॉकडाउन लगाए या किसी तरह की पाबंदी बढ़ाए। एक साल में बरबाद हुए करोड़ों लोग वापस अपने पैरों पर खड़े होने की जद्दोजहद में लगे रहना चाहते हैं। उनको पता है कि इस बार वे घरों में बैठे तो कोरोना की बजाय आर्थिक तंगहाली से जान जाएगी। लोगों को कोरोना से ज्यादा नौकरी, रोजगार की चिंता है। भय खत्म है पर चिंता बढ़ गई है। लोगों की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि लोग आपदा को अवसर बनाने लगे हैं।

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साभार - ऐसे भी जाने सत्य

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