हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप | बेबाक विचार

सरकार ने धोखा दिया

कोरोना वायरस की महामारी का एक कटु सच यह है कि भारत में सरकार ने लोगों के साथ धोखा किया। सरकार ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। सरकार को कोरोना से मुकाबला करने के लिए एक साल से ज्यादा का समय मिला फिर भी वहीं ढाक के तीन पात वाली स्थिति है। केसेज बढ़ते ही एक बार फिर अस्पतालों में बेड्स की कमी होने लगी है। पीएम केयर्स फंड के पैसे से जो असली-नकली वेंटिलेटर खरीदे गए थे वे छह महीने से भी कम समय में खराब होने लगे हैं। कई राज्यों में ऑक्सीजन के सिलिंडर की कमी होने लगी है। एक बार फिर रेमेडिसिवीर दवा की काला बाजारी शुरू हो गई है। गुजरात, महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में एक बेड पर कोरोना के दो-दो मरीजों का इलाज होने की खबरें और तस्वीरें भी आई हैं। एंबुलेंस की कमी की वजह से गोद में बच्चा लिए और ऑक्सीजन का सिलिंडर घसीटते अस्पताल पहुंचने वालों की तस्वीरें आने लगी हैं। अस्पताल में बेड नहीं मिलने पर कोरोना मरीज के अनशन शुरू करने और वहीं दम तोड़ देने की खबरें भी आने लगी हैं। यह सब जनता के साथ धोखे का नतीजा है।

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अगर सरकार ने अपनी जिम्मेदारी निभाई होती और आपदा को अवसर बना कर चहेते पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने की बजाय स्वास्थ्य सेवाओं पर ध्यान दिया होता तो यह स्थिति नहीं बनती। केंद्र सरकार ने एक साल का मौका गंवा दिया। यहां तक कि इस साल के बजट में स्वास्थ्य खर्च में 137 फीसदी की बढ़ोतरी का जो दावा किया गया वह भी फर्जी निकला। बाद में पता चला कि वैक्सीन के मद में आवंटित रकम और पेयजल व स्वच्छता मंत्रालय के पैसे को भी स्वास्थ्य मंत्रालय के खर्च में दिखा दिया गया। सोचें, कोरोना की महामारी में जनता के साथ इस तरह के छल का क्या मतलब है?

एक साल में प्रधानमंत्री ने एक हजार करोड़ रुपए की लागत वाले नए संसद भवन की नींव रखी और कई हजार करोड़ रुपए के चंदे से बनने वाले राम मंदिर का भी शिलान्यास किया लेकिन ध्यान नहीं आ रहा है कि उन्होंने ऐसा आयोजन किसी अस्पताल या मेडिकल रिसर्च फैसिलिटी के लिए किया। कोई खबर नहीं है कि सरकार ने कोविड-19 पर रिसर्च के लिए हजार करोड़ रुपए का आवंटन किया। देश में बड़ी संख्या में अस्पताल बनाने या मेडिकल कॉलेज खोलने की भी खबर नहीं है। नर्सिंग स्टाफ के लिए कॉलेज या प्रशिक्षण केंद्र खोले जाने की भी खबर नहीं है। निजी उद्यम से जरूर कुछ लोग पीपीई किट्स, मास्क आदि बना रहे हैं या दशकों पहले निजी उद्यम से शुरू हुई कंपनियों में वैक्सीन बन रही है या दूसरों की वैक्सीन शीशी में भरी जा रही है, उसी का श्रेय प्रधानमंत्री लेने में लगे हैं। न वैक्सीन पर शोध के लिए पैसा खर्च हो रहा है और न दवा पर शोध के लिए हो रहा है।

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लोगो को आर्थिक राहत देने के नाम पर 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को पांच किलो अनाज और एक किलो चना दिया जा रहा है। केंद्र ने 21 लाख करोड़ रुपए का जो कथित राहत पैकेज जारी किया था, उससे किसी आम नागरिक को फायदा हुआ हो, इसकी एक भी मिसाल नहीं है। पीएम केयर्स फंड में हजारों करोड़ रुपए जमा हुए लेकिन उनको किस मद में खर्च किया जा रहा है यह न तो बताया जा रहा है और न ही कोई जान सकता है। जनता के पैसे से बने इस फंड को सूचना के अधिकार कानून के दायरे से बाहर कर दिया गया है। कई आर्थिक संस्थाओं ने बताया कि देश में 10 करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार हुए हैं। करोड़ों लोगों के गरीबी रेखा के नीचे जाने की खबर है। इसके बावजूद कोरोना राहत के नाम पर किसी खाते में एक धेला सरकार ने नहीं डाला है। दुनिया के तमाम विकसित देशों ने अपने नागरिकों को आर्थिक मुश्किलों से निजात दिलाने के लिए उनके खातों में पैसे डाले हैं। भारत ऐसा देश है, जहां सब कुछ ठीक होने का दावा किया जा रहा है, दुनिया के देशों की मदद का दावा भी किया जा रहा है पर अपने नागरिकों के खाते में कोई पैसा नहीं डाला गया। लोगों ने अपने खर्च से महंगे टेस्ट कराए, इलाज कराए और अब वैक्सीन भी लगवा रहे हैं। कोरोना के काल में अस्पतालों को लूट की छूट रही और सरकार मुंह देखती रही।

यह देश के नागरिकों के साथ बड़ा धोखा है। यह सामाजिक संविदा का उल्लंघन है, जिस पर राज्य का अस्तित्व निर्भर करता है। राज्य और समाज का अस्तित्व सामाजिक संविदा पर आधारित है, जिसमें साझे हितों के आधार पर कामकाज होते हैं। सरकार ने उस संविदा का उल्लंघन किया है। नागरिकों ने महामारी में अपनी जिम्मेदारी निभाई पर सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल रही। महामारी शुरू होने के बाद सरकार ने जो-जो कहा वह सब नागरिकों ने किया। सरकार की अपील पर लोग अपने काम धंधे बंद करके घरों में बंद हो गए। लोगों की नौकरियां चली गईं और स्वरोजगार खत्म हो गया। सोशल डिस्टेंसिंग ऐसी हुई कि लोग अपने करीबियों को अस्पतालों में अकेले छोड़ कर घरों में रहे, अपने लोगों का शव छूने तक से इनकार किया, मास्क पहनते रहे, जिससे जितना बन सका उतना सैनिटाइजर से या साबुन से हाथ धोता रहा। लेकिन इससे क्या हासिल हुआ? लोगों को सिवाए परेशानी और आर्थिक बरबादी के कुछ भी हासिल नहीं हुआ। तभी आज अगर लोग सरकार से सहयोग नहीं कर रहे हैं या सरकार की अपील पर ध्यान नहीं दे रहे हैं तो इसके लिए नागरिकों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता नहीं पूरी की इसलिए वह लोगों से सहयोग की उम्मीद नहीं कर सकती। सामाजिक संविदा का सिद्धांत जिम्मेदारियों के साझा निर्वहन पर आधारित होता है। सरकार अपनी जिम्मेदार निभाए बगैर बहुत ज्यादा समय तक लोगों से उम्मीद नहीं कर सकती है कि वे उसका साथ देंगे। एक पक्ष अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल होता है तो दूसरा पक्ष भी देर-सबेर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह फेरता है, लापरवाह होता है। यही स्थिति एक साल बाद देखने को मिल रही है। लोगों ने एक साल तक सरकार के साथ सहयोग किया है पर अब उनका भरोसा टूट रहा है।

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