विपक्ष का मतलब सिर्फ कांग्रेस नहीं

कांग्रेस पार्टी को देश की मुख्य विपक्षी पार्टी का दर्जा भी हासिल नहीं है पर ऐसा लग रहा है कि देश में विपक्ष के नाम पर सिर्फ कांग्रेस है। ऐसे हालात बनाने में कांग्रेस का अपना भी हाथ है पर उससे ज्यादा खुद विपक्षी पार्टियों ने अपने को पंगु बनाया है। राज्यों में प्रादेशिक पार्टियों ने भाजपा के आगे इस तरह से सरेंडर किया है, जैसा पहले कभी देखने को नहीं मिला। कांग्रेस चुनाव के समय तो विपक्षी पार्टियों को जोड़ने के प्रयास करती है या संसद के सत्र वगैरह के समय फ्लोर कोऑर्डिनेशन की बैठकें करती है पर कोरोना वायरस, आर्थिक संकट, चीन के अतिक्रमण और मजदूरों के पलायन के ऐतिहासिक संकट के बीच कांग्रेस ने सिर्फ एक बार विपक्षी पार्टियों के साथ वर्चुअल मीटिंग की।

सबसे बडी विपक्षी पार्टी के नाते यह कांग्रेस की जिम्मेदारी थी कि वह राज्यों में विपक्षी पार्टियों को एकजुट करे। पर उसने ऐसा नहीं किया। यह कांग्रेस की कमी है पर उससे ज्यादा विपक्षी पार्टियों की कमजोरी है, जो उन्होंने पूरी तरह से सरेंडर किया। उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी है। चार महीने से चल रहे संकट के बीच कहीं भी पार्टी राजनीतिक गतिविधियों में शामिल नहीं दिखी। भाजपा ने और उसकी राज्य सरकार ने कह दिया कि यह राजनीति करने का समय नहीं है और सपा के नेता घर बैठ गए कि चलो यह राजनीति करने का समय नहीं है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस सात विधायकों की पार्टी है ले-देकर उसी ने सवाल उठाए और सरकार को कठघरे में खड़ा किया। प्रियंका गांधी वाड्रा ने कोरोना के बढ़ते संक्रमण, अलग अलग शहरों में हो रही मौतों और प्रवासी के घर लौटने के मामले में सरकार से सवाल पूछे और अपनी तरफ से जो मदद हो सकती थी, वह मुहैया कराई। पर इस पूरे मामले में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और दूसरी छोटी-छोटी विपक्षी पार्टियां अपने अपने खोल में सिमटी हैं। बयान तक जारी करने में इनको डर लग रहा है कि सत्तापक्ष और मीडिया कहना शुरू कर देंगे कि वे राजनीति कर रहे हैं।

यहीं हाल बिहार में राष्ट्रीय जनता दल का है। राजद बिहार की सबसे बड़ी पार्टी है। उसके 80 विधायक हैं और बिहार को कोरोना वायरस से अगले कुछ दिनों में सबसे बुरी तरह से प्रभावित होने वाला राज्य माना जा रहा है। इससे पहले भी मजदूरों के पलायन की जो ऐतिहासिक घटना हुई उसका केंद्र भी बिहार ही था और चीन की गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प भी बिहार रेजिमेंट के साथ हुई थी। इन सब मुद्दों पर सत्तापक्ष ने जम कर राजनीति की है। बिहार रेजिमेंट में बिहार के अलावा देश भर के सैनिक थे और देश भर के सैनिक शहीद हुए पर खुद प्रधानमंत्री ने इसे बिहार की बहादुरी के साथ जोड़ कर राजनीतिक दांव चला। पर बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी न तो मजदूरों के मसले पर कोई आंदोलन खड़ा कर पाई, न कोरोना वायरस से लड़ने में सरकार की अक्षमता को मुद्दा बना पाई और न चीन के मसले पर कोई सवाल उठा पाई। चाहे बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी हो या उत्तर प्रदेश की, इनको लग रहा है कि चुनाव के समय अपने जातीय समीकरण के आधार पर अपना बंधुआ वोट हासिल कर लेंगे और उसी से जीवन भर राजनीति करेंगे।

यह देश के उन दो राज्यों का हाल है, जहां सबसे ज्यादा राजनीति होती है, जिनके बारे में माना जाता है कि वहां के लोग राजनीति ओढ़ते-बिछाते हैं वहां का दुर्भाग्य है कि विपक्षी पार्टियां सत्तापक्ष को जिम्मेदार ठहराने के लिए जन सरोकार के मुद्दे उठाने में सबसे ज्यादा पिछड़ी हैं। हकीकत यह है कि चाहे इमरजेंसी का समय रहा हो या कांग्रेस के एकछत्र राज का कोई समय रहा हो, इन राज्यों में विपक्ष भले संख्या बल से कमजोर रहा हो पर उसने सरकार को जिम्मेदार बनाने के लिए जन सरोकार के मुद्दे उठाना बंद नहीं किया। दुर्भाग्य की बात है कि देश ऐतिहासिक संकट के दौर से गुजर रहा है और राजनीतिक रूप से दो सबसे जागरूक राज्यों में विपक्ष दुबका बैठा है।

यहीं हाल पूरे भारत के विपक्ष का है। पिछले चार महीने में कहीं से यह सुनने, देखने या पढ़ने को नहीं मिला कि तेलुगू देशम पार्टी के नेता चंद्रबाबू नायडू ने राज्य की वाईएसआर सरकार को निशाना बनाया हो। आंध्र में कोरोना वायरस के केसेज तेजी से बढ़ रहे हैं पर सब तरह सन्नाटा छाया है। संक्रमितों की संख्या के लिहाज से तमिलनाडु और दिल्ली में दूसरे और तीसरे स्थान पर रहने की लड़ाई चल रही है। तमिलनाडु में 70 हजार से ज्यादा मामले हो गए पर मुख्य और बेहद ताकतवर विपक्षी पार्टी डीएमके कहीं भी राजनीति करती नहीं दिखाई दे रही है। डीएमके ने केंद्र या राज्य की सरकार को जिम्मेदार ठहराने के लिए एक वास्तविक या आभासी आंदोलन नहीं किया है। कम्युनिस्ट पार्टियों ने देश में कई बड़े आंदोलन खड़े किए हैं पर आज पोलित ब्यूरो से बयान जारी करने के अलावा कम्युनिस्ट पार्टियों की कोई गतिविधि देखने को नहीं मिल रही है। पश्चिम बंगाल में कोरोना की वजह से हालात बिगड़ते जा रहे हैं पर कम्युनिस्ट नेताओं की बजाय भाजपा वहां तृणमूल कांग्रेस से लड़ रही है।

इसके उलट उन राज्यों को देखें, जहां भाजपा विपक्ष में है, जैसे पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, झारखंड, राजस्थान, दिल्ली इन राज्यों में भाजपा ने सरकारों को जीना मुश्किल किया हुआ है। प्रदेश भाजपा के नेता लगातार राजनीति कर रहे हैं। वे सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। भले सरकारें अच्छा काम कर रही हैं पर इससे विपक्ष के तौर पर भाजपा संतुष्ट होकर नहीं बैठ रही है और न उसके ऊपर इस आह्वान का असर है कि संकट के इस समय में विपक्ष को सरकार के साथ सहयोग करना चाहिए। वह तो राजनीति कर रही है पर दूसरी विपक्षी पार्टियां राजनीति करने से डर रही हैं कि कहीं उनके ऊपर यह आरोप न लगे कि वे संकट के ऐसे समय में भी राजनीति कर रही हैं।

One thought on “विपक्ष का मतलब सिर्फ कांग्रेस नहीं

  1. ये विपक्षी नहीं सत्ता लोलुप हैं।जब हजारों लाखों लोग असहाय होकर भूखे पेट अपने बच्चों को लेकर सड़क पर पुलिस की बर्बरता सहते हुए अपने घर की ओर चले तो अपने को नेता कहने वाला कोई इनके साथ नजर नहीं आया।सिर्फ इसलिए कि वे जेल में डाल दिये जायेंगे।

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