विपक्ष, पीके की राजनीति अपने आप! - Naya India
हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप | बेबाक विचार| नया इंडिया|

विपक्ष, पीके की राजनीति अपने आप!

PK prashant Kishor

गजब बात है जो यूपी में विधायक, छोटी पार्टियां अपने आप अखिलेश यादव की और देखते हुए हैं। ऐसे ही विपक्ष के तमाम नेता चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर की और देखते हुए हैं! तभी संभव है अखिलेश यादव और प्रशांत किशोर बदले वक्त, बेकाबू घटनाओं के अगले बादशाह हों। कितनी मजेदार बात है जो मायावती की सोच का मतलब जान कर बसपा के विधायक अखिलेश यादव की तरफ भागते हुए हैं। भाजपा बनाम सपा के सीधे मुकाबले का वैसा ही मैदान यूपी में बनता लगता है, जैसे बंगाल में भाजपा बनाम तृणमूल का बना था। जो हो रहा है वह अपने आप हो रहा है। बसपा अपने आप बिखर रही है तो पंजाब में अकाली और बसपा का एलायंस भी वक्त की मजबूरी में ऐसा बना है कि भाजपा छह महीने बाद पंजाब में पूरी तरह अछूत होगी और उसके हिंदू वोट आप या कांग्रेस को ट्रांसफर होते हुए होंगे।

यह भी पढ़ें: राजनीति में उफान, लाचार मोदी!

congress party

वक्त ने, बंगाल ने प्रशांत किशोर को भी अखिल भारतीय राजनीति का मौका दिया है। किसने सोचा होगा कि वे शरद पवार के साथ बैठ उन्हें समझाते हुए होंगे कि आगे, सन् 2024 में क्या कुछ संभव है? वे 2024 में विपक्ष की माला बनाने वाली डोरी बनें या उनके रणनीतिकार, इतना तय है कि तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र जैसे प्रदेशों के दर्जन क्षत्रपों की पौने तीन सौ लोकसभा सीटो के साथ कांग्रेस, वाम मोर्चे की गणित में वे अब वह सब राजनीति करने में समर्थ हैं, जो महामारी, बरबाद आर्थिकी और लोगों की भूख-बेगारी-बेरोजगारी से स्वंयस्फूर्त बनती जाएगी।

यह भी पढ़ें: तीन साल पहले ही राजनीति शुरू

akhilesh yadav priyanka yadav

सचमुच समय और समय के हालातों ने वह पंडोरा बाक्स खोला है, जिसमें भाजपा के विधायक, सांसद, प्रादेशिक क्षत्रपों में राजनीति का दम आया है तो स्टालिन से ले कर अखिलेश यादव, ममता बनर्जी से ले कर शरद पवार, हेमंत सोरेन से ले कर तेजस्वी यादव सब इस आत्मविश्वास में हैं कि हम हो सकते हैं कामयाब! विपक्ष की राजनीति वापिस संभावनाओं का खेल बन गई है। सवाल है राहुल गांधी और सीताराम येचुरी का जिक्र क्यों नहीं? इसलिए कि इनका राष्ट्रीय राजनीति का कड़ाव स्थायी है। जब नरेंद्र मोदी और भाजपा को दिन-प्रतिदिन राहुल गांधी और कांग्रेस की ही आलोचना करनी है तो वहीं कांग्रेस और लेफ्ट दोनों को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए पर्याप्त है। नरेंद्र मोदी कितने ही मुकुल राय, ज्योतिरादित्य, जितिन प्रसाद आदि को भगवाई बनाएं इनमें कोई भी नरेंद्र मोदी के अगले तीन साल के मिशन में मददगार नहीं होगा। उलटे भाजपा के भीतर इन सबसे खिंचाव, अविश्वास बनेगा तो नरेंद्र मोदी लोगों को दूसरी पार्टियों की टूटी-फूटी बैसाखियों पर चलते दिखलाई देंगे।

सो, बदले वक्त का नंबर एक फर्क सात साला राजनीतिक वर्चस्व व वोटों को एक हुंकारे में मोड़ देने की नरेंद्र मोदी की ताकत का संक्रमित होना है। उनका अहंकार और उनकी सर्वज्ञता धीरे-धीरे ईश्वरीय प्रकोप का शिकार हो रही है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *