राज्यों के सीएम बदलें अपनी एप्रोच

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए बातचीत की तो उन्होंने टेस्टिंग और ट्रेसिंग पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि टेस्ट किए जाएं और संदिग्ध मरीजों को ट्रेस करके उनको आइसोलेट किया जाए या जरूरी हो तो अस्पतालों में भरती कराया जाए। पर ज्यादातर राज्यों के नेता इस एप्रोच में काम करते नहीं दिख रहे हैं। वैसे केंद्र की सरकार भी कम से कम अभी तक इस एप्रोच में काम नहीं कर रही है। गुरुवार तक देश भर में 50 हजार से भी कम लोगों की जांच होने का रिकार्ड है। 130 करोड़ की आबादी में 50 हजार जांच का कोई मतलब नहीं है, जबकि अमेरिका हर दिन एक लाख लोगों की जांच कर रहा है और फिर भी वहां इस बात का रोना है कि जांच कम हो रहे हैं।

असल में राज्यों के नेताओं को एप्रोच बदलने की जरूरत है। वे अभी तक इस एप्रोच में काम कर रहे हैं कि टेस्ट नहीं हो रहे हैं तो मामले कम आ रहे हैं और इसलिए यह अच्छा है। उन्हें अपनी छवि की चिंता है या इस बात की चिंता है कि अगर ज्यादा मामले बढ़े और सरकार इलाज नहीं मुहैया करा पाई तो लोगों के बीच पोल खुलेगी। दक्षिण और पश्चिम भारत के राज्यों को छोड़ दें तो बाकी राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत जर्जर है। न अस्पताल हैं, न आईसीयू बेड्स हैं, न डॉक्टर हैं, न स्वास्थ्य के उपकरण हैं तो ऐसे में राज्य क्या करेंगे? तभी बिहार में सरकार को सबसे ज्यादा बौखलाहट हुई, जब प्रवासी मजदूरों का दिल्ली और दूसरे राज्यों से पलायन हुआ। पिछले 30 साल में बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं का पूरी तरह से भट्ठा बैठ चुका है। 30 साल पहले बने सरकारी अस्पतालों की भी हालत खराब है।

तभी राज्यों की खास कर उत्तरी, पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में यह एप्रोच देखने को मिल रही है कि ज्यादा जांच न हो। बिना जांच के ही यह प्रचार किया जा रहा है कि सामुदायिक संक्रमण नहीं हो रहा है। अस्पतालों में भरती होने वाले या इलाज के दौरान मर जाने वाले लोगों के सैंपल लेकर इस बात की पुष्टि करने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है कि उनकी मौत कोरोना वायरस की वजह से हुई है या किसी और कारण से। यह एप्रोच महामारी को निमंत्रण देने वाली है। ज्यादा जांच नहीं होगी या संख्या ज्यादा नहीं दिखेगी, इसका यह मतलब नहीं होगा कि संक्रमण नहीं है। इन राज्यों में लोगों की जैसी एप्रोच दिख रही है उससे यह भी लग रहा है कि लोग भी संक्रमण छिपा रहे हैं। जैसे दिल्ली के निजामुद्दीन में हुए तबलीगी जमात के मरकज से लौटे लोगों को तलाश करने और उनकी जांच करने के लिए गए डॉक्टरों और पुलिस की टीम पर हमले हुए हैं। बिहार में कम से कम तीन जिलों- मुंगेर, कटिहार और मधुबनी में ऐसे हमले हुए। पुलिस पर हुए हमले की जानकारी खुद राज्य के पुलिस प्रमुख गुप्तेश्वर पांडेय ने दी। मध्य प्रदेश में भी डॉक्टरों पर हमले हुए हैं। यानी एक तरफ सरकार ज्यादा मामले सामने नहीं आने से संतुष्ट है तो दूसरी ओर लोग भी संक्रमण छिपाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में आगे बढ़ कर सरकारों को खुद संक्रमण का पता लगाना होगा।

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