विपक्ष से भी अव्यवस्था

एक तरफ सरकार लोगों को भ्रमित कर रही है कि भारत विश्व गुरू बना रहे है, जल्दी ही देश की अर्थव्यवस्था पांच खरब डॉलर की होगी। और जो संकट दिख रहे हैं ये सारे वक्ती हैं। इनको भारत की सरकार ने दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले बेहतर तरीके से हैंडल किया है। तो दूसरी ओर देश की विपक्षी पार्टियां अलग भुलावा बनाए हुए है। इनको भ्रम है कि इन्होंने सरकार को चारों तरफ से घेर लिया है। एक तरफ हाथरस का मामला है, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार के कामकाज के बहाने भाजपा को बेटियों का और दलितों का विरोधी बताया जा रहा है तो दूसरी ओर कृषि से जुड़े कानूनों को लेकर आंदोलन है, जिसके सहारे विपक्ष को लग रहा है कि वह सरकार को किसान विरोधी साबित कर देगी।

यह भ्रम इसलिए है क्योंकि चाहे हाथरस का मुद्दा हो या किसान आंदोलन हो या सरकार के खासमखास टेलीविजन चैनल के टीआरपी घोटाले का मामला हो या रिया चक्रवर्ती को जमानत मिलने के बाद मचा न्याय का हल्ला हो, ये सब ऐसे मुद्दे हैं, जिनकी हवा अपने आप थोड़े  समय में निकल जानी है। जैसे नरेंद्र मोदी के पहले पांच साल के कामकाज के दौरान कांग्रेस नेता और राहुल गांधी समझते रहे कि उनका सूट-बूट की सरकार का प्रचार भाजपा को बैकफुट पर ले आया है और चौकीदार चोर का नारा तो नरेंद्र मोदी को हवा में उड़ा देगा या देश के अलग अलग हिस्सों में होने वाली लिंचिंग ने सरकार की छवि खराब कर दी है। अंबानी-अडानी से उनकी दोस्ती बता कर या दस लाख के सूट का हल्ला बनवा कर या राफेल में गड़बड़ी का मुद्दा उठा कर कांग्रेस और राहुल गांधी मुगालते में थे कि नरेंद्र मोदी को हरा लेंगे। चुनाव में उलटे भाजपा की सीटें बढ़ गईं।

उसी तरह थोड़े दिन के बाद आप देखेंगे कि अभी वाले सारे मुद्दे हाशिए में हैं और विपक्ष किसी अन्य मुद्दे पर हल्ला मचाए हुए है। इससे ऐसा भी लगता है जैसे सरकार और भाजपा ही विपक्ष को मुद्दे दे रही है ताकि वे उसे घेरते रहें, हल्ला मचाते रहें। थोड़े दिन के बाद मुद्दे अपने आप बदल जाते हैं। विपक्षी पार्टियों को समझना चाहिए कि जिस तरह के मुद्दे वे उठा रहे हैं उनसे थोड़े समय की सुर्खियां मिल सकती हैं। अगर उनके आधार पर देश की राजनीति बदलनी है या सरकार बदलनी है तो विपक्ष को उससे आगे कुछ और करना होगा। विपक्ष का असली संकट उनका आपसी अविश्वास, उनके संगठन की अव्यवस्था और हर नेता का अपना अहंकार है।

सोचें, आज विपक्ष का कौन नेता किसके साथ बात कर रहा है? उत्तर प्रदेश में हाथरस की बेटी के साथ अगर बुरा हुआ है तो क्या विपक्षी पार्टियों ने सरकार को घेरने के लिए साझा रणनीति बनाई? सब इस बहाने अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं। कांग्रेस को इसमें अवसर दिख रहा है। उसके नेता राहुल और प्रियंका दोनों सक्रिय हो गए। पर सबको पता है कि कांग्रेस के पास न मशीनरी है, न नेता हैं, न कार्यकर्ता हैं। यहीं काम कांग्रेस अगर विपक्ष के साथ साझा करते करती तो उसका असर ज्यादा होता। पर वह किसके साथ साझा करे? सपा और बसपा दोनों उसको अपना दुश्मन मान रहे हैं। कांग्रेस ने खुद ही यह दुश्मनी का भाव बढ़ने दिया है। चाहे उत्तर प्रदेश हो या दिल्ली और पश्चिम बंगाल, केरल हो या तेलंगाना और आंध्र प्रदेश सब जगह विपक्ष आपस में ही लड़ रहा है। राजस्थान से लेकर मध्य प्रदेश तक बहुजन समाज पार्टी की कोशिश कांग्रेस को निपटाने की है तो कांग्रेस का प्रयास बसपा को खत्म करके उसके दलित वोट बैंक पर कब्जा करने का है।

चाहे उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा हों, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस हो, दिल्ली में आम आदमी पार्टी हो या दूसरा कोई भी क्षत्रप हो, सब इस भ्रम में हैं कि भाजपा कमजोर होगी तो उन्हें मौका मिलेगा इसलिए अभी वे क्यों अपनी जमीन किसी और के साथ शेयर करें। इस भ्रम में सारी पार्टियों का भट्ठा बैठना तय है। धीरे धीरे सारी पार्टियों की जमीन खिसक रही है। वे घर बैठ कर भाजपा के कमजोर होने और उसकी चुनी हुई सरकारों के गलती करने की उम्मीद कर रहे हैं तो उनको निराशान होगी। क्योंकि न तो भाजपा का मौजूदा नेतृत्व पहले की तरह है और न उसकी सरकारें पहले जैसी हैं। उत्तर प्रदेश में जिस तरह से योगी आदित्यनाथ सरकार चला रहे हैं क्या इसी तरह से कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह या रामप्रकाश गुप्त ने सरकार चलाई थी? उन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से, राजनीतिक मर्यादा का ध्यान रखते हुए सरकार चलाई थी, तभी विपक्ष भी बचा रहा था और विपक्ष को मौका मिला था। योगी की सरकार में बचे रह जाना और मौका पा जाना आसान नहीं है। इसके लिए सबको अपनी अपनी राजनीतिक जमीन साझा करनी होगी।

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