हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप | बेबाक विचार| नया इंडिया| Politics Congress Opposition Parties कांग्रेस भी पीछे नहीं है

कांग्रेस भी पीछे नहीं है

Congress rally against inflation

विपक्ष की ज्यादातर पार्टियां कांग्रेस के साथ दुश्मन जैसा बरताव कर रही हैं और उसी के वोट में सेंध लगा कर उसकी जगह लेना चाहती हैं। इस समय ज्यादातर विपक्षी पार्टियां अपने लिए संभावना देख रही हैं। भाजपा की कट्टरपंथी राजनीति के बरक्स देश की राजनीति में उनको अपने अनुकूल हालात दिख रहे हैं। लेकिन मजेदार बात यह है कि कांग्रेस भी सहयोगी पार्टियों के प्रति दोस्ताना रवैया रखने और आगे बढ़ कर समझौता करने की बजाय उनको दुश्मन ही मान रही है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों के बीच एक-दूसरे को आजमाने का खेल चल रहा है। हो सकता है कि बाद में किसी मुकाम पर साझा बने लेकिन अभी कांग्रेस भी विपक्षी पार्टियों की तरह ही हमले कर रही है। Politics Congress Opposition Parties

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कांग्रेस पार्टी के पास एक ही दांव है कि वह अपना विरोध करने वाली हर पार्टी को भाजपा की बी टीम ठहरा दे। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के नेता ममता बनर्जी को ही भाजपा की बी टीम बता रहे हैं। सोचें, इस समय ममता खुद को पूरे देश में नरेंद्र मोदी का विकल्प मान रही हैं। दोनों पार्टियों के बीच घमासान छिड़ा है और कांग्रेस के नेता उनको भाजपा की बी टीम बता रहे हैं। दिल्ली में कांग्रेस के नेता जी-तोड़ प्रयास करते हैं यह साबित करने के लिए अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भाजपा की बी टीम है। कांग्रेस के नेता हर मौके पर यह कहते हैं कि आप का मकसद भाजपा को फायदा पहुंचाना है। कर्नाटक में कांग्रेस के नेता एचडी देवगौड़ा की पार्टी जेडीएस को भाजपा की बी टीम बताते हैं।

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सोचें, ये सभी पार्टियां कांग्रेस की सहयोगी रही हैं। कर्नाटक की मौजूदा विधानसभा में ही कांग्रेस ने जेडीएस के साथ मिल कर सरकार बनाई थी। लेकिन उसके नेता जेडीएस को भाजपा की बी टीम बता रहे हैं। आम आदमी पार्टी की भी पहली 49 दिन की सरकार कांग्रेस ने ही बनवाई थी। ममता तो खैर कांग्रेस की ही नेता हैं और उनकी पार्टी मनमोहन सिंह की सरकार में शामिल रही है। वे खुद भी मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री थीं। फिर भी कांग्रेस उनको भाजपा की बी टीम बताती है। अपने साथ रही विपक्षी पार्टियों को भाजपा की बी टीम बताने का कोई राजनीतिक फायदा कांग्रेस को नहीं हो सकता है। उलटे उसकी अपनी साख भी खराब होती है। वह विपक्षी पार्टियों की साख खराब करने के लिए इस तरह के प्रचार करती है लेकिन इससे उसकी साख पर भी असर होता है।

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कांग्रेस को इस समय ऐतिहासिक जिम्मेदारी निभानी है। जिस तरह से संसद के पिछले सत्र में कांग्रेस ने पहल करके विपक्षी पार्टियों को साथ लिया और पेगासस जासूसी मामले पर सरकार को कठघरे में खड़ा किया उसे संसद के बाहर भी आजमाने की जरूरत है। आज विपक्ष के पास मुद्दों की कमी नहीं है। अगर कांग्रेस सरकार को घेरने वाले मुद्दों को लेकर विपक्ष को साथ लाने की पहल करती है तो उसे कामयाबी मिल सकती है। अगर कामयाबी नहीं मिलती है तब भी कम से कम यह तो होगा कि कांग्रेस की पहल की। मतदाताओं में यह मैसेज जाना भी मामूली नहीं है कि कांग्रेस विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास कर रही है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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