विपक्ष, राहुल की गुमशुदी का साल - Naya India
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विपक्ष, राहुल की गुमशुदी का साल

एक तो महामारी, ऊपर से राजनीति के सारे पत्ते नरेंद्र मदी की जेब में तो विपक्ष भला कैसे राजनीति करता हुआ हो सकता है? प्रधानमंत्री मोदी की वक्त की बादशाहत में राजनीति और लोकतंत्र ही जब सांस के संकट में है तो राहुल गांधी हो या अखिलेश यादव या शरद पवार या कोई भी एक्सवाईजेड पार्टी और नेता के बस में है क्या! पूछा जा सकता है कि तब तेजस्वी यादव ने कैसे मोदी-नीतिश को बिहार में थकाया? अपनी थीसिस है कि वह जनता के कारण था। वहां भी तेजस्वी और राहुल गांधी ने राजनीति कम की गलतियां ज्यादा की तभी जनता की चाहना के बावजूद वे हार गए।

दरअसल पूरा विपक्ष और खासकर कांग्रेस, राहुल गांधी सन् 2020 में भी इस हकीकत को नहीं बूझ पाए कि यदि नरेंद्र मोदी के एक आव्हान पर हिंदू रात नौ बजे नौ मिनट के लिए ताली-थाली बजा दीया जला वायरस को भगाने के टोटके वाली बुद्धी लिए हुए हो गया है तो यह हिंदूओं का मोदीकरण है। इसलिए पुरानी राजनीति छोड़ों और हिंदुओं को रिझाने के लिए पहले हिंदू बनो। झूठ बोलने वाले मास्टरमाइंड बनों तो हिंदू दीया लिए गुमनामी से निकाल बाहर करेंगे।

अपनी राय में सन् 2020 की सबसे बड़ी सियासी गपशप यह है कि कांग्रेस के पुराने-बुजुर्ग-अनुभवी नेताओं और राहुल गांधी-प्रियंका गांधी दोनों अभी भी नहीं समझे कि पार्टी का उद्धार तभी संभव है जब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का नाम सुन कर हिंदू सोचे कि यह गांधी-इंदिरा की अखिल भारतीय हिंदू कांग्रेस कमेटी है। सन् 2020 औवेसी उर्फ अगले जिन्ना के अखिल भारतीय बनने का प्रारंभ वर्ष है। बिहार के चुनाव ने साबित किया है कि मुसलमान जहां भी मेजोरिटी में है वहां वह नरेंद्र मोदी के आगे अपने जिन्ना को जीताने की आग पाल चुका है। और यह नरेंद्र मोदी-अमित शाह की हिंदू राजनीति में सोने पर सुहागा है।  मतलब कांग्रेस-विरोधी पार्टियों को मुसलमानों के वोट धीरे-धीरे कम होने है। दस-बीस साल बाद भारत में चुनाव सचमुच 1947 से पहले के कांग्रेस बनाम मुस्लिम लीग के पैटर्न पर भाजपा बनाम ओवैसी पार्टी में हुआ करेंगे तब राहुल गांधी और प्रियंका गांधी और कांग्रेस कैसी गुमनामी में चले जाएंगे इसका बेसिक आईडिया विपक्ष को नहीं हो पा रहा है। कांग्रेस और विपक्ष भीतर की निज चिंताओं में है जबकि असली संकट बाहरी याकि हिंदू मानस में आउट होते जाने का है। खासकर लोकसभा, केंद्र की सत्ता के संदर्भ में।

हां, सन् 2020 में फिर जाहिर है कि प्रदेश में कमलनाथ, तेजस्वी, उद्धव, चंद्रेशखर राव, ममता बनर्जी और जनता चाहे जिस मूड में हो लेकिन देश की राजनीति दिल्ली की हुकूमत से ही नियंत्रित रहेंगी। इसलिए अखिल भारतीय पैमाने पर हिंदुओं में विपक्ष तभी गले उतरेगा जब राहुल गांधी और प्रिंयका गांधी हिंदुओं की रामनामी ओड में हवा बनाएं कि कांग्रेस सच्ची-समझदार हिंदूवादी पार्टी है और भाजपा ढोंगी-मूर्ख पार्टी है जिससे हिंदुओ का विनास ही विनाश ही है। ऐसा मैसेज इस एप्रोच से कतई नहीं बन सकता कि कांग्रेस कार्यसमिति जिला कांग्रेस संगठनों को अहमद पटेल के लिए श्रदांजलि कार्यक्रम आयोजित करने का निर्देश दे और मोतीलाल वोरा या तरूण गोगोई के लिए ऐसे शोकसभा की जरूरत न समझी जाएं। हां, मुझे कांग्रेस के एक नेता ने ही बताया कि अहमद पटेल के लिए जिलों में शोकसभा के आयोजन कराएं गए और उससे मुसलमानों को अधिक से अधिक जोड़ने की कोशिश हुई! इससे जमीनी हिंदू कांग्रेसी कार्यकर्ता चिढे।

हां, यह छोटी-टुच्ची बात है लेकिन आज के भारत का सच है तो राहुल गांधी, प्रियंका गांधी को हिंदू बहुमत की सच्चाई मान वोट पकाने के लिए मंदिरों में साष्टांग लेटना होगा। ब्राह्यणों को सिर पर बैठाना होगा। पूरे विपक्ष को गांठ बांध लेना चाहिए कि वह जातिवादी राजनीति छोड़े। दंबग पिछड़ी जातियों को टिकट देना बंद करें और बिना जांत की कसौटी पर टिकट ब्राह्ण-फारवर्डो को ज्यादा से ज्यादा बांटे ताकि कांग्रेस के हिंदू रंग को सच्चा मान छोटी-छोटी जातियां मिलकर पार्टी के ब्राह्यण-मुसलमान-दलित उम्मीदवारों को वैसे ही वोट देने लगे जैसे नेहरू के वक्त में देती थी। सोनिया गांधी और अहमद पटेल के टिकट फार्मूलों, वोट राजनीति ने भाजपा-नरेंद्र मोदी को चमकाया था लेकिन इस बात को कांग्रेस-विपक्ष सन् 2020 में भी नहीं समझ पाए है, तभी गुमनामी गहरी है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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