Politics नए नेताओं के उभरने का वक्त!
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नए नेताओं के उभरने का वक्त!

हां, सन् 2022 के साल में नए नेता जलवा बनाते हुए होंगे। नरेंद्र मोदी की कला घटेगी और नए क्षत्रप, नए नेता उभरेंगे। दो साल पहले नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ और अमित शाह को ले कर जो भाव था, वह 2024 और 20292034  तक के आम चुनाव के लिए हिंदू प्रधानमंत्रियों की कतार बनाए हुए था। वह भाव अब उस सियासी मुकाम पर है जिसमें स्वंय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए सियासी और निजी जीवन के महामृंत्युजय यज्ञ होने लगे है तो उत्तरप्रदेश में जातिय समीकरण ताकतवर बन रहे है। अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल, चरणजीतसिंह चन्नी बिना सामने आए भी मोदी के लिए चुनौती बने है। विधानसभाओं के चुनाव अचानक भाजपा के लिए जी का जंजाल हो गए है। यह तब जब विपक्ष बिखरा हुआ है। विपक्ष के पास न मीडिया है और न पैसा। न ही उसके पास हिंदू-मुस्लिम धर्म की राजनीति है और न खैरात और फ्री बांटने के सात साला मोदी मॉडल जैसा कोई रिकार्ड है। और तो और विपक्ष के पास भाजपा जैसे तगड़े विधायक व चुनाव ल़ड सकने लायक संगठन मशीनरी भी नहीं है!

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बावजूद इसके क्या गजब बात जो उत्तराखंड हो या गोवा या उत्तरप्रदेश सत्तावान मंत्री व विधायक भाजपा के जहाज से भागते हुए है। मानों भाजपा का जहाज डुबने वाला हो। पंजाब में हालात यह है कि 70 हजार कुर्सियों के लिए सात सौ लोग भी मोदी को सुनने नहीं पहुंचे। मणिपुर का जहां सवाल है तो वहां वैसे भी भाड़े के एलायंस पर भाजपा है।    

इसका अर्थ यह नहीं कि विपक्ष के दिन आ गए है। जो होता हुआ है वह नए चेहरों के उभरने की परिस्थितियां  है जिनसे नरेंद्र मोदी की अपराजेयता में निश्चित ही छेद बनेंगे। नतीजतन सन् 2024 आते-आते नामुमकिन  नहीं जो हिंदू राजनीति की जब लुटिया डुबने जैसा हल्ला बने तो संघ परिवार को समझ ही नहीं आए कि करें तो क्या करें।

सोचे, पंजाब में लड़ाई होगी कांग्रेस बनाम आप में! न भाजपा, न बादल और न अमरेंद्रसिंह। चरणजीत चन्नी और अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस बनाम आप में होगी चुनावी लड़ाई। ऐसे ही सबसे बड़े उत्तरप्रदेश में मोदी-शाह-योगी के आगे सीधा ल़डते हुए एक अकेले अखिलेश यादव! इस बारीक बात को समझे कि चुनाव अखिलेश के लिए जीवन-मरण वाले नहीं है बल्कि नरेंद्र मोदी के लिए है। मोदी-शाह-योगी तीनों के लिए है। मायावती आउट, औवेसी आउट, कांग्रेस आउट और एक अकेला अखिलेश यादव सीधे नरेंद्र मोदी के सामने खड़ा।

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इसलिए यदि अखिलेश ने भाजपा का गुब्बारा पंचर कर दिया या मोदी-शाह के लिए जोडतोड से सरकार बनाने की भी नौबत ला दी तो उसके आगे कैसे प्रभाव होंगे? ऐसे ही कांग्रेस और राहुल-प्रिंयका गांधी को ले कर भले लोग माने रहे कि मोदी के सामने उनका कोई मतलब नहीं लेकिन यदि उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में भाजपा तनिक भी पंचर हुई तब वह साल के आखिर के विधानसभा चुनावों में सचमुच मरे मनोबल से चुनाव लड़ती हुई होगी।

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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