कानून की मशाल लेकर चलने वाले - Naya India
हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप| नया इंडिया|

कानून की मशाल लेकर चलने वाले

जिस दिन सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे वरिष्ठ जजों ने प्रेस कांफ्रेंस करके उस समय के चीफ जस्टिस के कामकाज की शैली पर सवाल उठाए थे वह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में मील के पत्थर का दर्जा रखता है। लोग हैरान थे पर करोड़ों लोगों के मुंह से वाह निकली थी। हालांकि उस प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद जस्टिस रंजन गोगोई जब चीफ जस्टिस बने तो उन्होंने जैसे फैसले दिए, अपने खिलाफ दर्ज हुए यौन उत्पीड़न के मामले में जैसे काम किया और बाद में जैसा आचरण किया उससे चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस ले मिली सारी पुण्यता खत्म हो गई। बाकी सारे जज भी रिटायर होते गए और नेपथ्य में चले गए। उन जजों के पहले से और उनके बाद  भी देश की सर्वोच्च अदालत में ऐसे चेहरे मौजूद हैं, जिन्होंने कानून और न्याय की मशाल थाम रखी है और सारे खतरे उठाते हुए उस मशाल की लौ जलाए हुए हैं। फली एस नरीमन, दुष्यंत दवे और राजीव धवन का नाम ऐसे लोगों में लिया जा सकता है, जिन्होंने हमेशा गलत को गलत कहने की हिम्मत दिलाई।

कोरोना वायरस के संकट के समानांतर जब लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूरों के पलायन की ऐतिहासिक मानवीय आपदा आई और उसमें सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का पक्ष स्वीकार करते हुए मजदूरों को राहत देने का फैसला नहीं किया तो सबसे पहली प्रतिक्रिया फली एस नरीमन की थी। उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘अपैलिंगली’ यानी बहुत खराब, भयावह, डरावना फैसला किया है। इसके बाद जब कर्नाटक हाई कोर्ट ने मजदूरों को घर पहुंचाने की व्यवस्था करने का फैसला सुनाया तब भी उन जजों को सैल्यूट करने वालों में फली नरीमन पहले थे। उन्होंने इसे ताजा हवा के झोंके की तरह बताया और सबको यह फैसला पढ़ने की सलाह दी। असल में वे एक विरासत को पिछले करीब पांच दशक से अपने कंधों पर लेकर चल रहे हैं। जिस समय देश में इमरजेंसी लगाई गई उस समय वे इंदिरा गांधी की सरकार में एडिशनल सॉलिसीटर जनरल थे और उन्होंने यह सूचना मिलते ही इस्तीफा दिया था।

दूसरा नाम, दुष्यंत दवे का है। बिना किसी हिचक के उन्हें मौजूदा समय का सबसे सजग, सक्रिय, सामाजिक व कानूनी सरोकारों की चिंता करने वाला और सार्वजनिक कानूनविद् कहा जा सकता है। उन्होंने साबित किया है कि कानून का पेशा उनके लिए सिर्फ पैसे कमाने या कोई पद हासिल करने का जरिया नहीं है। उन्होंने जन सरोकारों की रक्षा और संविधान के प्रावधानों को बचाने के लिए हर बार अपने को आगे किया। चाहे प्रवासी मजदूरों के पलायन का मामला हो, कार्यपालिका के आदेशों से आम लोगों के हितों की रक्षा का मामला हो, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की चिंता हो, मीडिया और सोशल मीडिय में नफरत फैलाने वाले भाषणों-बयानों का मामला हो, अभिव्यक्ति की आजादी का मामला हो या कोरोना के संकट के बीच न्यायपालिका और विधायिका दोनों की गैरहाजिरी का मामला हो, ये सारे मुद्दे दुष्यंत दवे ने उठाए। उन्होंने न सिर्फ इनसे जुड़े मुकदमे अदालत मे लड़े, बल्कि सार्वजनिक रूप से लिख कर अपना पक्ष सार्वजनिक किया और इस क्रम में उन्होंने बड़े खतरे उठाए। सोशल मीडिया में भक्त लंगूरों की गालियां झेलने के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ एक याचिका भी दायर की गई है, जिसमें उनका वरिष्ठ वकील का तमगा वापस लेने की मांग की गई है।

तीसरा नाम राजीव धवन का है। अयोध्या मामले में राजीव धवन मुस्लिम पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उनको पता था कि वे इस वजह से मुस्लिमपरस्त कहे जाएंगे और देश की बड़ी आबादी की नफरत का शिकार होना पड़ सकता है। पर यह जोखिम लेकर उन्होंने कानून का काम किया। हालांकि उनकी पहचान सिर्फ इससे नहीं है। वे अपनी सोच में बहुत स्पष्ट रहे हैं और कभी इस बात की परवाह नहीं की है, जो सत्ता में है उसके मन की बात कही जाए। तभी 2009 में जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए अपने सत्ता के शिखर पर थी तब उन्होंने बोफोर्स तोप सौदे को लेकर कानूनी गड़बड़ियों का खुलासा किया था। उन्होंने अंग्रेजी के एक अखबार में लेख लिख कर बताया था कि किस तरह से मुकदमे को कमजोर किया गया, क्वात्रोच्चि को भारत से बाहर जाने दिया। उन्होंने यूपीए सरकार के अटॉर्नी जनरल मिलन बनर्जी की भूमिका पर भी सवाल उठाए थे। राजीव धवन ने सीधे दिवंगत राजीव गांधी को कठघरे में खड़ा किया था। उनमें यह कहने की हिम्मत थी कि जनहित याचिका ने आम लोगों की मदद की है पर साथ ही पूंजीपतियों, वकीलों और जजों को भी फायदा पहुंचाया है। वे बोलने की आजादी की रक्षा के लिए आज भी प्रशांत भूषण के साथ खड़े हैं और पहले भी संविधान से छेड़छाड़ के हर मसले पर वे एक पक्ष बन कर अदालत में खड़े रहे हैं।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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