भाजपा के मुख्यमंत्रियों पर दबाव - Naya India
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भाजपा के मुख्यमंत्रियों पर दबाव

पिछले सात साल में पहली बार हो रहा है भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री दबाव में हैं। भाजपा शासित राज्यों में पार्टी के अंदर राजनीति हो रही है। जहां भाजपा का शासन नहीं है, जैसे राजस्थान या महाराष्ट्र वहां भी पार्टी के अंदर राजनीति तेज हो गई है। इसका भी एक कारण वहीं है, जो ऊपर बताया गया है। सात साल में पहली बार ऐसा हुआ है या कम से कम दिख रहा है कि भाजपा के आला नेता दबाव में हैं। नरेंद्र मोदी और अमित शाह बैकफुट पर हैं। कोरोना प्रबंधन, आर्थिक, बंगाल की हार आदि ऐसे मसले हैं, जिन पर पार्टी के अंदर चर्चा शुरू हो गई है। इससे केंद्रीय कमान कमजोर हुई है और आलाकमान के इकबाल पर भी सवाल उठा है। तभी प्रदेश में नेता अंदरखाने की तिकड़मी राजनीति में जुट गए हैं। भाजपा के मुख्यमंत्रियों या प्रदेश नेताओं पर दूसरा कारण यह है कि चुनावी तैयारियां चल रही हैं और मौजूदा हालात को देखते हुए पार्टी परेशान है।

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इस लिहाज से उत्तर प्रदेश सबसे अहम राज्य है। वहां अगले साल फरवरी-मार्च में चुनाव होने वाले हैं। उससे पहले हुए पंचायत चुनावों और विधान परिषद के चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा। कोरोना प्रबंधन की वजह से सरकार की छवि बिगड़ी है तो सामाजिक समीकरण भी बिखरा हुआ दिख रहा है। इस बीच प्रधानमंत्री के करीबी पूर्व आईएएस अधिकारी को दिल्ली से लखनऊ भेजे जाने से भी सत्ता समीकरण बिगड़ा है। प्रदेश के संगठन महामंत्री और एक उप मुख्यमंत्री ने खुले तौर पर अलग मोर्चा खोला है। इससे भी मुख्यमंत्री पर दबाव बढ़ा है और प्रदेश संगठन में बिखराव दिख रहा है। इस बीच यह चर्चा चल ही रही है कि मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के बीच सब कुछ ठीक नहीं है। सात साल में यह पहली बार हुआ है कि भाजपा के किसी सीएम के बारे में ऐसी बात चर्चा में आई है। यह अपने आप में अनहोनी बात है और इसका कई राज्यों में असर दिख रहा है।

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राजस्थान में भाजपा के नेताओं ने खुल कर कहा है कि वसुंधरा राजे के बगैर भाजपा सत्ता में नहीं आ पाएगी। बिहार में चिराग पासवान के प्रति भाजपा नेताओं के प्रेम को जानते हुए भी नीतीश कुमार ने चिराग की पार्टी तुड़वा दी और पांच सांसदों को अलग करा दिया। उधर कर्नाटक में मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के समर्थक विधायकों ने एक के बाद एक बैठकें करके आलाकमान को बता दिया कि अगर येदियुरप्पा को हटाना संभव नहीं है। जानकार सूत्रों का कहना है कि कर्नाटक के कई विधायकों ने दिल्ली का दौरा किया और दिल्ली से लौट कर येदियुरप्पा के खिलाफ बयान दिए। कहा जा रहा है कि पार्टी आलाकमान की शह पर उनके ऊपर दबाव बनाया गया लेकिन वे किसी दबाव में नहीं आए। पार्टी के महासचिव और प्रदेश प्रभारी अरुण सिंह बेंगलुरू में तीन दिन बैठे और विधायकों से एक एक कर बात की।

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मुख्यमंत्रियों पर दबाव की शुरुआत उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह को हटाने से हुई थी। पहली बार हुआ था कि विधायकों के दबाव में भाजपा आलाकमान को अपने चुने हुए मुख्यमंत्री को हटाना पड़ा था। इससे यह मैसेज गया कि आलाकमान चाहे नरेंद्र मोदी ही क्यों न हों उनका झुकाया जा सकता है। इसके बाद इस तरह के अभियान कई जगह शुरू हो गए। उत्तराखंड के मौजूदा मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत भी दबाव में हैं और सुदूर त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देब भी दबाव में हैं। प्रदेश के एक दर्जन विधायकों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोला है। बताया जा रहा है कि भाजपा छोड़ कर तृणमूल कांग्रेस में लौटे मुकुल रॉय ने अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर वहां भाजपा विधायकों में बगावत की स्थिति पैदा कर दी है। दो साल बाद होने वाले चुनाव तक बिप्लब देब को रखें या बदलें की दुविधा में पार्टी ने संगठन महामंत्री बीएल संतोष और पूर्वोत्तर का मामले देखने वाले सचिव को अगरतला भेजा है।

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मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर बेवजह दबाव बनाने का प्रयास चल रहा है। मीडिया में खबर आई की प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री नरोत्तम मिश्रा किसी कैबिनेट बैठक में से नाराज होकर निकल गए। ध्यान रहे कांग्रेस के विधायकों को तोड़ कर भाजपा की सरकार बनवाने के समय नरोत्तम मिश्रा भी काफी सक्रिय थे और मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। अब नरोत्तम मिश्रा के अलावा पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय, प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा, पार्टी के संगठन महामंत्री सुहास भगत आदि के भी किसी न किसी राजनीति में शामिल होने की खबर है। दबाव की चर्चाओं के बीच मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दिल्ली आए तो प्रधानमंत्री से मिलने के साथ साथ मध्य प्रदेश के दो बड़े नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों नरेंद्र सिंह तोमर और थावरचंद गहलोत से भी मिले। सो, मध्य प्रदेश में भी राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा भी दबाव में हैं। उनकी कोशिश है कि किसी तरह से पूर्व मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल को प्रदेश की राजनीति से निकाला जाए। अगर वे केंद्र में मंत्री बन जाते हैं तो सरमा का काम आसान हो जाएगा।  हरियाणा के मुख्यमंत्री भी दबाव में हैं लेकिन वे पार्टी की अंदरूनी राजनीति की वजह से नहीं हैं, बल्कि किसान आंदोलन की वजह से परेशान हैं।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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