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राजनीतिक नुकसान के दो बरस

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके गृह मंत्री अमित शाह को दूसरे कार्यकाल के दो बरस में जितना राजनीतिक नुकसान हुआ है उतना उनके पूरे राजनीतिक करियर में नहीं हुआ होगा। भाजपा ने पिछले दो साल में अपने कई राजनीतिक सहयोगी गंवा दिए। महाराष्ट्र में दशकों से भाजपा की सहयोगी रही शिव सेना ने उसका साथ छोड़ दिया। शिव सेना की तरह ही सबसे पुरानी सहयोगियों में से एक अकाली दल ने कृषि कानूनों और किसान आंदोलन के मुद्दे पर भाजपा का साथ छोड़ दिया। महाराष्ट्र में राजू शेट्टी, बिहार में उपेंद्र कुशवाहा, असम में हाग्राम मोहिलारी जैसे अनेक छोटे छोटे क्षत्रपों ने भाजपा का साथ छोड़ दिया। हो सकता है कि भाजपा को अभी इसके नुकसान का अंदाजा नहीं हो रहा हो पर आने वाले दिनों में सहयोगियों की कमी उसे परेशान करेगी।

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लोकसभा चुनाव जीतने के बाद अगस्त के महीने में अनुच्छेद 370 का फैसला कराने और नागरिकता कानून बदलवाने के बाद लग रहा था कि अब आगे कोई भी चुनाव जीतने से भाजपा को कोई नहीं रोक सकता है। लेकिन इन दोनों फैसलों के बाद दो राज्यों- महाराष्ट्र व हरियाणा में में विधानसभा के चुनाव हुए। भाजपा ने महाराष्ट्र की सत्ता गंवा दी और हरियाणा में उसे इतना नुकसान हुआ कि उसे दुष्यंत चौटाला को उप मुख्यमंत्री बना कर उनकी मदद से सरकार बनानी पड़ी। हरियाणा में भाजपा के वोट और सीटें दोनों घट गए और कांग्रेस की सीटें दोगुनी से ज्यादा हो गईं। महाराष्ट्र में शिव सेना, कांग्रेस और एनसीपी ने साझा सरकार बना ली। भाजपा ने अपना सबसे पुराना और सबसे करीबी वैचारिक सहयोगी यानी शिव सेना को गंवा दिया।

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इसके बाद सुप्रीम कोर्ट से राम मंदिर का फैसला आया लेकिन भाजपा ने प्रचार किया कि यह प्रधानमंत्री मोदी की वजह से हुआ है क्योंकि मोदी है तो मुमकिन है। इसके तुरंत बाद झारखंड विधानसभा का चुनाव हुआ। पार्टी अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाने का प्रचार करती रही और चुनाव हार कर सत्ता से बाहर हो गई। मंदिर के फैसले के दम पर जीतने का भरोसा पाले भाजपा ने उस चुनाव में भी अपने एक सहयोगी आजसू को छोड़ दिया। इसके बाद अनुच्छेद 370, नागरिकता संशोधन कानून और राम मंदिर के मुद्दे पर भाजपा ने दिल्ली का चुनाव लड़ा और 70 में से सिर्फ आठ सीटें जीत सकी। यानी भारी बहुमत से लोकसभा का चुनाव जीतने के आठ महीने में चार राज्यों में चुनाव हुए और भाजपा को चारों राज्यों में नुकसान हुआ। बिहार विधानसभा के चुनाव में जरूर भाजपा जीती, लेकिन वह जीत भी नीतीश कुमार की है क्योंकि पार्टी ने उनके चेहरे पर चुनाव लड़ा था। लेकिन वहां भी नीतीश को निपटाने के लिए भाजपा ने चिराग पासवान के जरिए एक मकड़जाल बुना था, जिसमें आने वाले दिनों में भाजपा खुद फंस जाए तो हैरानी नहीं होगी।

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कोरोना वायरस की महामारी और आर्थिक तबाही के बीच भाजपा ने इस साल पांच राज्यों का चुनाव लड़ा। इसमें पश्चिम बंगाल का चुनाव कई मायनों में निर्णायक था। करीब 30 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले बंगाल में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराने की भाजपा की क्षमता की परीक्षा थी तो सीएए, एनआरसी, किसान आंदोलन, कोरोना प्रबंधन आदि मुद्दों पर भी एक तरह का जनादेश था। इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने जैसे अपने को दांव पर लगाया वह बेमिशाल था। इतनी रैलियां, इतनी सभाएं, इतने रोड-शो हुए कि सारी दुनिया हैरान रह गई कि यह कैसी सरकार और कैसी सत्तारूढ़ पार्टी है, जो एक राज्य के चुनाव को इस तरह लड़ रही है। मोदी और अमित शाह सबने दो सौ सीट जीतने का दावा किया पर इतना सब कुछ करने के बावजूद भाजपा बहुमत तो दूर सौ सीटों का आंकड़ा भी नहीं पार सकी। यह भाजपा ब्रांड राजनीति के लिए सबसे बड़ा झटका था कि ममता बनर्जी पहले से ज्यादा सीटों के साथ चुनाव जीतीं।

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भाजपा इस बात का संतोष कर सकती है कि उसने असम में सरकार बचा ली और पुड्डुचेरी में ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस के साथ मिल कर सरकार बना ली। पर असम की जीत राज्य सरकार के पांच साल या केंद्र सरकार के कामकाज पर नहीं हुई, बल्कि सीएए विरोधी ताकतों के पार्टी बना कर चुनाव लड़ जाने की वजह से हुई। राज्य में भाजपा और कांग्रेस गठबंधन के बीच वोट का अंतर सिर्फ एक फीसदी की है। तभी सरकार बनाते समय भाजपा को बड़ा समझौत करना पड़ा और छह साल पहले कांग्रेस छोड़ कर आए हिमंता बिस्वा सरमा को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। बड़ी मुस्लिम आबादी वाले राज्य केरल में भाजपा अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद कर रही थी पर पिछली बार जीती एक सीट भी उसने इस बार गंवा दी।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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