Prime Minister Narendra Modi सबसे बड़ा संकट इमेज का
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सबसे बड़ा संकट इमेज का

Prime Minister Narendra Modi

लाख टके का सवाल है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने अब सबसे बड़ा संकट क्या? जवाब है- इमेज का संकट! प्रधानमंत्री मोदी ने बड़ी सावधानी और बड़े जतन से अपनी एक छवि बनाई थी। उस छवि के ईर्द-गिर्द ही वे सारी राजनीति करते रहे हैं। उनकी छवि क्या गढ़ी गई थी कि वे हिंदुओं के सबसे बड़े रक्षक हैं, सबसे बड़े राष्ट्रवादी हैं, सबसे बहादुर हैं, उनका सीना 56 इंच का है, उनके रहते चीन-पाकिस्तान भारत से डरे रहेंगे, वे अपनी बात से पीछे नहीं हटते हैं, बड़ी सादगी से रहते हैं, अपने वेतन से ही अपना खर्च चलाते हैं, परिवारवाद के घनघोर विरोधी हैं आदि आदि। लेकिन करीब साढ़े सात साल के राज में ये सारी छवि एक एक करके टूट रही हैं।

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केंद्रीय कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा छवि टूटने का सबसे ताजा उदाहरण है। ऐसा नहीं है कि वे पहले अपने फैसले से पीछे नहीं हटे हैं। लेकिन तब वे फैसले पर इतना अड़े नहीं थे। इस बार वे एक साल तक अड़े रहे। एक साल तक खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी कृषि कानूनों को न्यायसंगत ठहराते रहे और इसका विरोध करने वालों को आतंकवादी, खालिस्तानी, देश विरोधी और नकली किसान बताते रहे। एक साल बाद अचानक उन्होंने हाथ जोड़ कर माफी मांगते हुए कानून वापस लेने का ऐलान किया। सवाल है कि जन आंदोलन के सामने झुक जाने से किसी प्रधानमंत्री की छवि कैसे टूटेगी, छवि तो अच्छी होनी चाहिए? लेकिन नरेंद्र मोदी के मामले में इसका उलटा है। उन्होंने, उनकी सरकार या उनकी पार्टी ने कभी भी इस आंदोलन को सम्मान नहीं दिया था। दूसरे, जिस समय आंदोलन अपने चरम पर था और किसान मर रहे थे उस समय उन्होंने इसे वापस नहीं लिया। प्रधानमंत्री ने इस आंदोलन को तब वापस लिया, जब उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनाव आए और उनको हारने की फीडबैक मिली। सोचें, इस समय आंदोलन की कहीं चर्चा नहीं हो रही थी, अखबारों और चैनलों पर आंदोलन की खबर नहीं थी और आंदोलन पहले के मुकाबले काफी कमजोर हो गया था, लेकिन चुनाव आया तो कानून वापस हो गए। सो, सहज रूप से यह माना गया कि प्रधानमंत्री ने चुनावी हार की चिंता में अपनी छवि की चिंता किए बगैर कानून वापस लिया, इससे उनकी गढ़ी गई छवि पर असर पड़ा है।

इसी तरह महान राष्ट्रवादी और चीन-पाकिस्तान को झुका देने वाले नेता की गढ़ी गई झूठी छवि चीन के लगातार अतिक्रमण और सरकार की चुप्पी से टूटी है। चीन पूर्वी लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में बाराहूती तक भारत की सीमा में घुसा है। लेकिन प्रधानमंत्री जिद ठान कर बैठे हैं कि न कोई घुसा है और न कोई घुस आया है। सेटेलाइट की तस्वीरों के जरिए अरुणाचल प्रदेश से लगती सीमा के पास चीन के गांव बसाने की खबरें आ रही हैं लेकिन भारत सरकार सूत्रों के हवाले से बता रही है कि वह गांव वहां 1959 से है। इस सफाई के बाद नई तस्वीरें आईं, जिनमें दिखाया गया कि ये गांव 2019 में नहीं थे। अरुणाचल प्रदेश के भाजपा के अध्यक्ष रहे और पार्टी के सांसद तापिर गावो ने वीडियो बना कर बताया कि चीन भारत की सीमा में अंदर तक घुसा हुआ है। भाजपा के सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी हर दिन न कोई घुसा है और न कोई घुस आया हैके जुमले से प्रधानमंत्री का मजाक उड़ा रहे हैं। चीन ने चारों तरफ से भारत को घेरा है, जमीन कब्जा किया है, हथियार तैनात कर रहा है जबकि भारत उसके साथ कारोबार बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री के स्तर पर आत्मनिर्भर भारत का झूठा दावा सीधे होता है और उसी के बीच चीन के साथ भारत का कारोबार बढ़ कर एक सौ अरब डॉलर से ज्यादा की ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंचा है।

PM protocol and CM

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ऐसे ही सादगी वाला मिथक भी टूटा है। हाल के दिनों में ऐसी अनेक छोटी-बड़ी घटनाएं हुईं या खबरें आईं, जिनसे सादगी वाला मिथक टूटा। प्रधानमंत्री ने साढ़े आठ हजार करोड़ रुपए का विशेष विमान अपने लिए खरीदा या सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत 15 एकड़ में प्रधानमंत्री का नया घर बन रहा है, जैसी खबरों ने सादगी से रहने और अपने वेतन से ही काम चलाने के मिथक को एक्सपोज किया। मोदी सरकार ने गांधी परिवार सहित सबकी एसपीजी सुरक्षा खत्म कर दी। अब करीब छह सौ करोड़ रुपए के सालाना बजट से एसपीजी सिर्फ अकेले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा करती है। यानी हर महीने प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर 50 करोड़ रुपए का खर्च होता है। ऊपर से सोशल मीडिया में इस बात का प्रचार है कि वे कितनी महंगी घड़ी पहनते हैं, कितना महंगा उनका चश्मा होता है, कितना महंगा पेन होता है और वे कितनी बार कपड़े बदलते हैं। पिछले दिनों जब वे कृषि कानून वापस लेने की घोषणा करने टेलीविजन पर आए तो उन्होंने जो शॉल ओढ़ी थी वह पश्मीना शॉल थी, मीडिया में जिसकी अनुमानित कीमत सवा लाख रुपए बताई गई।

प्रधानमंत्री की एक बड़ी पूंजी वंशवाद का खास कर गांधी परिवार का विरोध करने की रही है। लेकिन पिछले सात साल में उन्होंने अलग अलग राजनीतिक वंश के इतने नेताओं को प्रमोट किया कि इस मुद्दे की धार खत्म है। उनकी पार्टी में वंशवाद तो फल-फूल रहा ही था कांग्रेस से भी थोक के भाव उन्होंने ऐसे नेता लिए, जो किसी न किसी राजनीतिक वंश से जुड़े थे। ऊपर से उनके शासन में विश्वासपात्रवाद को इतना बढ़ावा मिला, जिसकी मिसाल नहीं है। सरकार या शासन में तरक्की पाने का एक ही पैमाना बना दिया गया और वह पैमाना है विश्वासपात्रवाद का है। इसी पैमाने पर खट्टर, रावत, देब या ठाकुर खोजे गए मुख्यमंत्री बनाने के लिए। इसी वजह से एक एक करके पुराने नेताओं की छुट्टी की गई। इसे लोगों ने देखा और महसूस किया। यह सब जानते है कि एक डरा हुआ या हमेशा आशंकित नेता ही ऐसा किया करता है।

पेगासस जासूसी का मामला भी कोई बहादुरी की बात नहीं है। इस खुलासे से पता चला है कि सरकार अपने ही नागरिकों की जासूसी करा रही थी। पत्रकारों से लेकर नेता, अधिकारी और जजों तक की जासूसी कराए जाने की खबरों का खुलासा हुआ है। सरकार इस मामले को दबाती रही और सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जांच के आदेश दिए हैं। अपने ही नागरिकों की जासूसी कराना किसी साहसी सरकार का काम नहीं हो सकता है। अपने चहेते और विश्वासी अधिकारियों को निश्चित कार्यकाल के बाद भी सेवा विस्तार देने के लिए अध्यादेश के जरिए कानून बनाना भी सरकार की घबराहट को बताता है। प्रधानमंत्री को पता है कि उनकी जीत और उनकी उपलब्धियां किसी ठोस धरातल पर नहीं खड़ी हैं, बल्कि सिर्फ एक गढ़ी गई धारणा पर आधारित हैं। जैसे ही वह धारणा टूटेगी, सब कुछ खत्म हो जाएगा। सो, सबसे बड़ी चिंता यहीं है कि वह धारणा टूटने लगी है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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