राष्ट्र के नाम - Naya India
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राष्ट्र के नाम

सब कुछ राष्ट्र के नाम पर है। भारत को महान बनाने के नाम पर है। गंगा-बनारस सब देश का गौरव बढ़ाने के लिए हैं। लोगों का मरना भी राष्ट्र के लिए है। अस्पताल, दवा और टीके के लिए भटकना और इस तरह मरना कि अंतिम संस्कार भी न हो पाए और यह सब होने के बाद भी चुप रहना राष्ट्र के लिए है। आखिर लोगों की लाशों पर ही तो देश को महान बनना है फिर लाशें चाहे गंगा में बहाई जा रही हो या गंगा के किनारे दफनाई जा रही हो या महाश्मशान बने देश में सतत जल रही चिताओं पर जलाई जा रही हो। पिता के कंधे पर पड़ी 11 साल की बेटी की लाश हो या ऑटोरिक्शा में पत्नी की बाहों में दम तोड़ते पति की लाश हो, सब राष्ट्र के लिए हैं!  सारा झूठ भी राष्ट्र के लिए है और सारी अनैतिकता भी राष्ट्र के लिए ही है। गौर करें विभिन्न कवियों की रजनाओं के कुछ अंशों को

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राष्ट्र के लिए

आइए!
हम सब एक साथ
दवा के अभाव में मरें
इस तरह कि
अंतिम संस्कार भी न हो
हम टीके के जाल में
छटपटाएं
अव्यवस्था में पटपटाएं
और कभी झुलस कर मरें
कभी हुलस कर मरें
कभी भूख से मरें
कभी बेकारी से
कभी महामारी से
मरते रहें
राष्ट्र निर्माण करते रहें
राष्ट्र की नींव में धंसें हम
हत्यारे की चाल में फंसें हम
हवा को तरसें
पानी को तरसें
पर उफ न करें
क्योंकि हमारी लाशों पर
एक महान देश बनेगा
धर्म का झंडा
आसमान तक तनेगा
और एक दिन बचा हुआ देश
एक साथ गाएगा
राष्ट्रगीत

आओ!
हवन कुंड में कूदें!
हमारी मांस के चिरायंध गंध से
हवा में ऑक्सीजन बढ़ेगा
सेंसेक्स आसमान चढ़ेगा
और राष्ट्र निर्माता
एक नया झूठ गढ़ेगा
आइए!
हम सब
झूठ की बलिवेदी पर
सत्य को हलाल करें
सत्य हमेशा
सबसे बड़ी रुकावट रहा है
किसी भी महान राष्ट्र के
नवनिर्माण में

– हूबनाथ पांडेय

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बनारस -गंगा

कितना बनारस बचा है बनारस में
कितनी गंगा बची है बनारस की गंगा में

जितनी बची है
जीवन में नैतिकता
बस उतनी ही बची है गंगा
उतना ही बचा है बनारस

बाजार में जितनी हया बची है
जितना बचा है आंख में पानी
बस उतनी ही बची है
बनारस में गंगा
उतना ही बचा है बनारस में बनारस

– निलय उपाध्याय

दुख कोई सहता है

एक पिता
ग्यारह साल की
कोरोना संक्रमित बेटी का शव
अंत्येष्टि के लिए
अपने कंधे पर लेकर
जा रहा है

पड़ोसियों ने अर्थी को
कंधा देने से
मना कर दिया

कभी कभी ऐसा भी होता है
दुख कोई सहता है
मगर एक अकेला शव
समूची सभ्यता के बारे में
कुछ कहता है

-पंकज चतुर्वेदी

मेरे शहर के हैं सवाल कुछ

न खाता न बही है
जो तुम बोलो, वही है
न्यूज ये छप रही है
सब कुछ बिल्कुल सही है
मगर
मेरे शहर के हैं सवाल कुछ
शहर हुआ सुनसान क्यों
धधक रहे श्मशान क्यों
सांसों पर घमासान क्यों
मेरे शहर के हैं सवाल कुछ
सच पर एफआईआर क्यों
रासुका की मार क्यों
झूठ की जय-जयकार क्यों
निष्ठुर है सरकार क्यों
मेरे शहर के हैं सवाल कुछ

यूं खतरे में जान क्यों
जारी है मतदान क्यों
रैली आलीशान क्यों
बनते हो अनजान क्यों
मेरे शहर के हैं सवाल कुछ
न खाता न बही है
जो तुम बोलो, वही है
न्यूज ये छप रही है
सब कुछ बिल्कुल सही है
मगर
मेरे शहर के हैं सवाल कुछ

-हिमांशु बाजपेयी 
कुछ भूख से मरे, कुछ भय से
जो आस्तिक थे वे ईश्वर की कृपा से मरे
कुछ खुशी से मरे की छोटी होंगी अब बैंक की कतारें
जो हड्डियों के आखिरी हिलोर तक सरकार से सवाल करते हुए लड़ सकते थे
वे मरे सरकार की बेशर्म हिंसक हंसी से
कुछ को घृणा ने मारा, कुछ को शक्ति ने
कुछ को ऐश्वर्य ने मारा, कुछ को भक्ति ने
महामारी में मरने वाले सब के सब लोग
महामारी से नहीं मरे थे।

-विहाग वैभव

 

निष्कर्ष

सारा हिसाब-किताब करने के बाद
लगभग यह निष्कर्ष निकल पाया कि
1000 वोटों पे 3 मौतें आम है
4200 जलने का दाम है
बेड, ऑक्सीजन और वेंटिलेटर
ये सब किराना का सामान है।

– शुभांकर

 

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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