वक्त मंदिर और किसानों के चंदे का!

खबर है कि राम मंदिर के लिए रिर्काड तोड़ चंदा इकठ्ठा हो रहा है। तभी धारणा बनती है कि हिंदू राजनीति अभी भी पीक पर है। मंदिर के चंदे के बहाने शहर-गांव-कस्बों में जो जज्बा बना है वह मंदिर उद्घाटन के वक्त क्या वोट की आंधी बनवाए हुए नहीं होगा? संभव है। बावजूद इसके अपनी जगह यह भी तथ्य है कि किसान आंदोलन के लिए पंजाब, सिख संगत, हरियाणा-पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान में किसानों के लिए जो चंदा, जो सेवा भाव है वह क्या कम है? कोई माने या न माने अपना मानना है कि दुनिया भर में खास कर ब्रिटेन-कनाडा-अमेरिका में सिख जो चंदा या लॉबिंग कर रहे हैं वह रिकार्ड तोड़ है। इसका भारत का विदेश मंत्रालय, भारत सरकार, नरेंद्र मोदी के हिंदू भक्त जवाब दे ही नहीं सकते हैं। यदि मंदिर आंदोलन चलेगा, हिंदू राजनीति का जलवा रहेगा तो दुनिया में बाइडेन प्रशासन हो या बोरिस जॉनसन, ट्रूडो सरकार, यूरोपीय देशों में मोदी सरकार लगातार जवाबदेह बनी रहेगी।

उस नाते देश में मंदिर और चंदे से यदि 20-25 करोड़ हिंदू वोटों की एकजुटता है तो साथ ही समाज-देश में वह विभाजकता बन रही है, जिसके वोटों की गोलबंदी कम नहीं होगी। तभी अगले पांच विधानसभा चुनाव भी गौरतलब हो गए है। सवाल है कि पश्चिम बंगाल और असम में पंजाब-हरियाणा- यूपी-राजस्थान आदि के किसान आंदोलन का सीधा जुड़ाव भले न बना हो लेकिन किसान आंदोलन की खबर तो वहां के किसानों के घर पहुंची होगी। इन चुनावी राज्यों में भी पेट्रोल-डीजल के दामों का अनुभव तो हो रहा होगा। या यह माना जाए कि देशद्रोहियों, खालिस्तानियों-पाकिस्तानियों-चीनियों की साजिश के प्रोपेगेंडा के चलते असमी, आदिवासी, बांग्लाभाषी सभी जयश्री राम का नारा दिल-दिमाग में बनाए मतदान केंद्र पहुंचेंगे?

खबर नहीं है कि पश्चिम बंगाल और असम में राम मंदिर के लिए कितना चंदा इकठ्ठा हुआ? अपना मानना है कि इन चुनावी राज्यों में भी भाजपा-संघ मशीनरी ने मुहिम में कमी नहीं रख छोड़ी होगी। वहां किसान आंदोलन का असर न्यूनतम बताया जा रहा है। आंदोलन से दूर के प्रदेशों में हवा बना दी गई है कि किसान ठंड़े पड़ रहे हैं। वक्त के साथ आंदोलन ठंड़ा पड़ जाएगा। ऐसा वे ही सोच सकते हैं, जिनको सिख समुदाय के इरादों, हौसलों का अनुमान नहीं है। किसान आंदोलन का असली रंग मार्च-अप्रैल में फसल कटाई के बाद मई से देखने को मिलेगा। तब तक प्रदेशों के चुनाव नतीजे भी आ चुके होंगे। लोकप्रियता, मुद्दों, लीडरशीप आदि की  सियासी हकीकत का मामला पांच विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद के अगले छह महीनों में यूपी चुनाव की तैयारी के साथ ही खुलेगी।

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