किसानों की ‘अमीरी’ देखी नहीं जा रही!

प्रचार हो रहा है कि ये कैसे किसान हैं, जो जिंस की पैंट-जैकेट पहनते हैं, पिज्जा खाते हैं, मसाज कराते हैं, बड़ी गाड़ियों से आते हैं और ट्रैक्टर पर डीजे बजा कर डांस करते हैं। अब सोचें, यह क्या मानसिकता है? इससे क्या देश के किसानों की वास्तविकता जाहिर नहीं होती है? असल में देश के लोग किसानों को दरिद्र और दीन-हीन देखने के आदी हैं। उन्होंने किसानों की फटेहाल तस्वीर ही देखी है, जो आधे-अधूरे चिथड़ों में लिपटा हो, नंगे पैर हो और हाथ जोड़े दो वक्त की रोटी के लिए गिड़गिड़ा रहा हो। यह देश के ज्यादातर हिस्सों के किसानों की स्थिति है, सबसे उत्तम काम करने वालों की हालत भिखारियों की तरह हैं। देश का मध्य वर्ग चाहता है कि मुंशी प्रेमचंद की कहानियों से निकल कर होरी-धनिया या घीसू-माधव सामने खड़े हो जाएं तो उसी को किसान माना जाए। वे किसान को ऐसे ही फटेहाल या पेड़ से लटक कर आत्महत्या करते हुए देखने के आदी हो गए हैं। इसलिए हैरान हैं ये कैसे किसान हैं?

दरअसल सरकार की दिक्कत यह है कि वह इस असलियत को भी देश के सामने नहीं आने देना चाहती है कि पंजाब का किसान अमीर है या कम से कम देश के दूसरे हिस्सों के किसानों के मुकाबले खुशहाल है। असल में सरकार का कानून पंजाब और हरियाणा के किसानों को भी बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश या दूसरे हिस्सों के किसानों की तरफ फटेहाल बनाने वाला है। इसलिए सरकार नहीं चाहती है कि पंजाब के किसानों की हकीकत दूसरे लोग जानें। इसलिए उनकी ‘अमीरी’ को बदनाम करने का प्रयास किया जा रहा है।

पंजाब का किसान क्यों खुशहाल है या क्यों इतनी तीव्रता के साथ आंदोलन कर रहा है? इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि वहां मंडियों की व्यवस्था है, जिसमें किसानों की फसल केंद्र सरकार के तय किए हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर बिकती है। अगर इतने भर से पंजाब का किसान बाकी किसानों से बेहतर जीवन जी रहा है तो क्या यहीं व्यवस्था पूरे देश में नहीं लागू करनी चाहिए? इसकी बजाय प्रधानमंत्री ने बिहार के चुनाव प्रचार में कहा कि बिहार ने 2006 में जो व्यवस्था लागू की, वहीं व्यवस्था उन्होंने पूरे देश में लागू कर दी है। गौरतलब है कि बिहार में 2006 में मंडियों की व्यवस्था खत्म कर दी गई थी, जिसके बाद वहां का किसान लगभग पूरी तरह से बरबाद हो गया और आज किसानों की औसत आमदनी में बिहार सबसे नीचे है। अंग्रेजी के कारोबारी अखबार ‘बिजनेस टुडे’ की रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब में एक किसान परिवार की औसत सालाना आय दो लाख 16 हजार 708 रुपए है, जबकि बिहार के एक किसान परिवार की औसत आय 42 हजार 684 रुपए है।

सोचें, पंजाब के एक किसान परिवार की आय बिहार के एक किसान परिवार की आय के मुकाबले पांच गुने से भी ज्यादा है और प्रधानमंत्री बिहार के कृषि और अनाज खरीद के मॉडल की तारीफ कर रहे हैं और उसी मॉडल को पूरे देश में लागू करने की बात गर्व से कह रहे हैं! क्या यह बिहार के लिए शर्म की बात नहीं है कि वहां का किसान देश में सबसे कम सालाना कमाई वाला किसान है? फिर वहां की व्यवस्था क्यों देश में लागू होनी चाहिए? अगर पंजाब में किसान परिवार की आय सबसे ज्यादा है और सरकार किसानों की आय बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है तो वह पंजाब का मॉडल क्यों नहीं पूरे देश में लागू करती है? क्या यह व्यवस्था बेहतर नहीं होगी कि मंडियों में या मंडियों के बाहर किसानों की फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी से कम पर खरीद-बिक्री को गैरकानूनी बना दिया जाए? हालांकि ऐसा नहीं है कि पंजाब के कृषि मॉडल में कमियां नहीं हैं। वहां भी हरित क्रांति को सफल बनाने के लिए जिस तरह से खेती की गई, उससे जमीन की सेहत बिगड़ी है और ग्राउंड वाटर टेबल बहुत नीचे चला गया है। परंतु इस समय बात खेती की नहीं हो रही है, बाद फसलों के कारोबार की हो रही है। अगर खेती की बात होती तब तो केंद्र सरकार को उस पर कानून बनाने का अधिकार ही नहीं है क्योंकि वह राज्यों का विषय है। किसानों ने यह बात केंद्रीय कृषि मंत्री के सामने उठाई तो उन्होंने कहा कि तीनों कानून ट्रेड यानी कारोबार से जुड़े हैं, जिस पर केंद्र को कानून बनाने का अधिकार है। सो, यह पूरा आंदोलन कृषि उत्पादों की खरीद-बिक्री और भंडारण से जुड़ा है, जिस मामले में पंजाब का मॉडल देश के बाकी किसी भी राज्य के मुकाबले सबसे अच्छा है।

यहीं कारण है कि पंजाब और हरियाणा या पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों के किसान खुशहाल हैं। दूसरे, अगर आंदोलन के दौरान भी किसान मस्ती से रह रहे हैं तो यह वहां की संस्कृति का भी प्रतीक है। दिल्ली की सीमा पर बैठे पंजाब और हरियाणा के किसान जिस अंदाज में रह रहे हैं उसी अंदाज में वे अपने यहां भी रहते हैं। जो अमीर नहीं है, वह भी फटेहाल नहीं है। वह जो अपने घर में खाता-पीता है वहीं धरने प्रदर्शन में भी खा-पी रहा है। पर चूंकि देश के लोगों ने किसान फटेहाल ही देखा है या सरकार को भी किसानों को गरीब बनाए रख कर उनको मजदूर बनाना है इसलिए किसानों की यह अमीरी देखी नहीं जा रही है। तभी कई लोगों ने सोशल मीडिया में यह पूछा कि किसान जब सलफास खाकर जान देता है तब तो चर्चा नहीं होती और आज पिज्जा खा रहा है तो हजम नहीं हो रहा है! असल में सरकारें यहीं चाहती हैं कि किसान सलफास ही खाए।

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