चीन की दुखती रग पर हाथ

अमेरिका ने चीन की दुखती रग पर हाथ रखा है। उसने कहा है कि अमेरिका के कई शहरों में चीन के कौंसुलेट के जरिए जासूसी की जाती है। भारत ने यह बात पाकिस्तान के बारे में तो कही है पर चीन के बारे में अभी तक एक बार भी यह बात नहीं कही गई है। लेकिन यह हकीकत है कि चीन के कौंसुलेट दुनिया भर में जासूसी के काम करते हैं। अगर यह बात सिर्फ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कह रहे होते तो शायद यकीन नहीं किया जाता पर यहीं बात अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट ने कही है। उसके सामने रखे गए दस्तावेजों से उसे पता चला होगा, जिसके आधार पर उसने यह बात कही है।

अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट ने कहा है कि चीन जासूसी कर रहा है, वह कोरोना वैक्सीन के निर्माण से जुड़ा डाटा चुरा रहा है, उसके हैकर्स दुनिया भर की कंपनियों और सरकारों के नेटवर्क में सेंधमारी कर रहे हैं और उन्होंने हजारों, लाखों करोड़ रुपए की बैद्धिक संपदा चुराई है। जस्टिस डिपार्टमेंट के मुताबिक चीन ने दुनिया भर की बड़ी कंपनियों के ट्रेड सेक्रेट्स चुराए हैं। तभी अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कहा कि अगर चीन को नहीं बदला गया तो वह पूरी दुनिया को बदल देगा। उन्होंने कहा कि चीन को रास्ते पर लाने के लिए समान विचारधारा वाले देशों को एक साथ आना होगा। चीन के खिलाफ पहली बार इस तरह खुल कर अपील की गई है। इसका कारण यह है कि अमेरिका ने चीन को रंगे हाथ पकड़ा है। ह्यूस्टन में चीन की कौंसुलेट में बड़ी संख्या में दस्तावेज जलाए जाने की खबरों के बाद उसे बंद कराया गया है। कुछ और अमेरिकी शहरों में चीनी कौंसुलेट बंद कराए जा सकते हैं।

इसी तरह चीन की एक दुखती रग कोरोना वायरस के प्रचार का आरोप है। विश्व स्वास्थ्य संगठन, डब्लुएचओ के बारे में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि वह चीन के हाथों बिक गया है। उसने दो अधिकारियों को चीन भेजा है इस बात की जांच के लिए चीन से किस तरह से इस वायरस का प्रचार हुआ। पर यह जांच सिर्फ लीपापोती है क्योंकि सब जानते हैं कि जिस समय चीन वायरस फैला रहा था उस समय डब्लुएचओ ने उस पर परदा डाला। सो, भारत को दुनिया के देशों के साथ मिल कर स्वतंत्र जांच की मांग करनी चाहिए। यूरोप में कई देशों ने चीन के खिलाफ जांच और उसके ऊपर जुर्माना लगाने की मांग की है। अमेरिका भी चाहता है और राष्ट्रपति ट्रंप कह चुके हैं वे चीन को जिम्मेदार ठहराएंगे। अगर इस समय भारत और बाकी देश मिल कर चीन को जिम्मेदार ठहराते हैं और स्वतंत्र जांच की मांग करते हैं तो चीन बैकफुट पर आएगा। वह लाख चाह कर भी इस मसले पर दुनिया के देशों का समर्थन नहीं हासिल कर सकेगा।

इसी तरह वन चाइन पॉलिसी का मामला है। जिस तरह से ब्रिटेन ने चीन की धमकियों की परवाह किए बगैर हांगकांग के मसले पर स्टैंड लिया है उसी तरह भारत को भी लेना चाहिए। भारत को हांगकांग में लोकतंत्र बहाली की मांग का समर्थन करना चाहिए और वहां के लोगों को डराने, धमकाने के लिए लाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का विरोध करे। इसी तरह भारत को चाहिए कि वह तिब्बत का मुद्दा उठाए। जिस तरह से अमेरिका ने भारत से चलने वाली तिब्बत की निर्वासित सरकार को एक मिलियन डॉलर की मदद दी है उसी तरह भारत को उसकी गतिविधियों का समर्थन करना चाहिए। दलाई लामा को सिर्फ आध्यात्मिक गतिविधियों तक सीमित करने की बजाय उनकी राजनीतिक गतिविधियों का समर्थन करना चाहिए। ऐसे ही ताइवान का भी समर्थन करना चाहिए। पिछले दिनों चीन ने डब्लुएचओ की असेंबली में एक देश के तौर पर ताइवान को शामिल नहीं होने दिया था। भारत और दूसरे देशों को इसका दबाव बनाना चाहिए कि ताइवान को बहुपक्षीय मंचों पर जगह मिले।

चीन की एक दुखती रग दक्षिण चीन सागर है। वह अपनी विस्तारवादी नीतियों के तहत उस इलाके में अपनी घुसपैठ करता रहता है। फिलीपींस, वियतनाम आदि देश इसका विरोध करते हैं। इस इलाके में चीन को रोकने का प्रयास होना चाहिए। ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और जापान के साथ मिल कर भारत ने एशिया प्रशांत में जो समूह बनाया है उसकी गतिविधियां बढ़ाई जानी चाहिए। कुल मिला कर भारत को आगे बढ़ कर चीन को अलग थलग करने के वैश्विक प्रयासों में शामिल होना चाहिए और उसे और गति देनी चाहिए। अभी सही समय है, जब दुनिया में चीन के प्रति नफरत का भाव पैदा हुआ है और भारत में भी लोग चीन के ऊपर से निर्भरता खत्म करने के लिए तैयार हो गए हैं।

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