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कंगाली में आटा गीला

ज्यादा दिन नहीं बीते, जब भारत सरकार ने बहुत जोश के साथ कहा कि अगले साल विकास दर आठ से साढ़े आठ फीसदी रहेगी। भारत की ओर से आर्थिक सर्वेक्षण में यह बात कही गई थी। उसके बाद रिजर्व बैंक ने इस साल की पहली दोमासिक मौद्रित नीति समीक्षा में कहा कि 7.8 फीसदी विकास दर रहेगी। सबको पता है कि चालू वित्त वर्ष की विकास दर पिछले साल की निगेटिव विकास दर के पैमाने पर है इसलिए अगले साल सात-आठ फीसदी की विकास दर का कोई खास मतलब नहीं है। लेकिन अब यह भी मुश्किल दिख रहा है। भारत सरकार ने दूसरी बड़ी घोषणा खुदरा महंगाई दर को लेकर की थी और कहा था कि यह 5.7 फीसदी रहेगी। तीसरी बड़ी घोषणा वित्तीय घाटे को लेकर की थी और कहा था कि यह 6.8 फीसदी रहेगा। लेकिन अब इन लक्ष्यों का क्या होगा?

भारत बड़ी अर्थव्यवस्था वाले उन देशों में से है, जिनकी अर्थव्यवस्था कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित हुई। भारत की न सिर्फ अर्थव्यवस्था रसातल में गई, बल्कि आम आदमी की निजी अर्थव्यवस्था भी खत्म सी है। दुनिया के दूसरे किसी देश में शायद ऐसा नहीं हुआ। भारत में ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सरकार ने आम आदमी की कोई मदद नहीं की। उन्हें नकद पैसे नहीं दिए। रोजगार के अवसर नहीं बनाए गए। सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले एमएसएमई सेक्टर में 60 लाख उद्यम बंद हुए। पिछले एक दशक से ज्यादा समय में पहली बार हुआ कि सबसे कम आमदनी वाले कृषि सेक्टर में रोजगार बढ़ा और मनरेगा में काम की मांग 2014 के मुताबिक चार गुना बढ़ गई। अभी कोरोना का यह घाव भरा भी नहीं था कि युद्ध का संकट शुरू हो गया। यह भारत के लिए कोढ़ में खाज की तरह है।

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अब भारत सरकार और देश के नागरिकों को अर्थव्यवस्था में वी या के शेप की भी रिकवरी के बारे में भूल जाना चाहिए। कम से कम इस वित्तीय वर्ष में इसकी संभावना बहुत कम है क्योंकि दुनिया के कोरोना की महामारी से निकलते ही यूक्रेन पर रूस के हमले का संकट खड़ा हो गया है। यह संकट आने वाले दिनों में गहरा होगा, जिसका आर्थिक और भू-राजनीतिक असर बहुत बड़ा होगा। समूचा यूरोप इससे प्रभावित होगा और एशिया में भारत वह देश होगा, जिस पर इसका सबसे ज्यादा असर होगा। भारत सरकार इस बात से आश्वस्त है कि रूस के ऊपर पाबंदी अमेरिका, नाटो और यूरोपीय संघ लगा रहे हैं, जिसे मानने की बाध्यता नहीं। बाध्यता वाली पाबंदी संयुक्त राष्ट्र संघ लगा सकता है लेकिन खुद रूस वीटो पावर वाला देश है और ऊपर से उसे चीन का भी समर्थन है इसलिए वह पाबंदी नहीं लगेगी और तब भारत का रुस के साथ कारोबार चलता रहेगा। लेकिन उस कारोबार का क्या असर होगा, जब तेल से लेकर खाने की वस्तुओं तक की कीमत आसमान छूने लगेगी?

भारत अपने तेल की जरूरत का 80 फीसदी आयात करता है और भारत के कुल आयात बिल में अकेले तेल के आयात बिल का हिस्सा 25 फीसदी होता है। रूस के यूक्रेन पर हमला करते ही कच्चे तेल की कीमत एक सौ डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई। ध्यान रहे रूस खुद ही तेल का बड़ा निर्यातक है। आने वाले दिनों में तेल की कीमतों में और बढ़ोतरी की आशंका है। भारत सरकार ने चुनावों की वजह से पिछले करीब तीन महीनों से पेट्रोल, डीजल की खुदरा कीमत स्थिर रखी है। तेल की कीमतों में जब बढ़ोतरी रोकी गई थी तब कच्चा तेल 73 डॉलर से नीचे जाना शुरू हुआ था। सोचें, सौ डॉलर से ऊपर की कीमत होती है तो भारत को कितनी बढ़ोतरी करनी होगी। माना जा रहा है कि प्रति लीटर 15 से 20 रुपए तक की बढ़ोतरी होगी और गैस की कीमतें दोगुनी हो सकती हैं। तेल की कीमतें बढ़ेंगी तो खुदरा महंगाई में बढ़ोतरी होगी और तब रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों को निचले स्तर पर रखना मुश्किल होगा और अगर ब्याज दरों में बढ़ोतरी होगी तो विकास की जो भी रफ्तार बन रही है वह थम जाएगी। सरकार का आठ-साढ़े आठ फीसदी का विकास अनुमान कच्चे तेल की कीमत 70-75 डॉलर प्रति बैरल रहने के अनुमान पर आधारित है। विकास की रफ्तार थमने के साथ साथ सरकार का चालू खाते का घाटा बढ़ेगा। सो, कुल मिला कर सरकार और आम आदमी दोनों की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं।

गुरुवार को रूस के हमले के बाद प्रधानमंत्री ने वित्त मंत्री और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से बात की, जिसमें इस युद्ध से पैदा हो रही समस्या से निपटने के उपायों पर चर्चा की गई। इस चर्चा का पहला असर यह दिखा कि शुक्रवार को इस कारोबारी हफ्ते के आखिरी दिन शेयर बाजार में सुधार हुआ। गुरुवार को शेयर बाजार में 27 सौ अंक की गिरावट हुई थी। शुक्रवार को इसे रोका गया तो उसका कारण यह है कि सरकार इस समय शेयर बाजार में गिरावट का जोखिम नहीं ले सकती है। एलआईसी का सबसे बड़ा आईपीओ आना है। इस महारत्न कंपनी में पांच फीसदी हिस्सेदारी बेच कर भारत सरकार 60 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई करने की सोच रही है। अगर बाजार में गिरावट रही तो विनिवेश का न्यूनतम लक्ष्य हासिल करना भी मुमकिन नहीं रहेगा। इस चिंता में शेयर बाजार को उठाए रखने का प्रयास होगा। लेकिन अर्थव्यवस्था को संभालने का कोई भी कृत्रिम प्रयास मौजूदा हालात में कारगर होता नहीं लग रहा है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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