हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप | बेबाक विचार| नया इंडिया| Taliban take control afghanistan जावेद मियां, तालिबान बर्बर है जबकि संघ...

जावेद मियां, तालिबान बर्बर है जबकि संघ…

पहली बात सलाम नसीरूद्दीन शाह को। इसलिए नहीं कि उन्होंने हिम्मत दिखाई, बल्कि इसलिए कि उन्होंने पुरी दुनिया का यक्ष प्रश्न इस्लाम के आगे एक वाक्य में रखा कि- जो लोग तालिबान की कामयाबी का जश्न मना रहे हैं, उन्हें अपने आप से पूछना चाहिए कि, “उन्हें बदलाव चाहिए, मॉडर्न इस्लाम चाहिए या वो बीते दशकों की बर्बरता के साथ रहना चाहते हैं।” फिर 71 साला नसीरूद्दीन शाह का भारतीय मुसलमानों के लिए यह वाक्य- “हिंदुस्तानी” या भारतीय इस्लाम हमेशा दुनिया भर के इस्लाम से अलग रहा है, और उन्हें उम्मीद है कि “ख़ुदा वो वक्त न लाए कि वो इतना बदल जाए कि हम इसे पहचान भी न सकें”…”मैं एक भारतीय मुसलमान हूं… और जैसा कि मिर्जा गालिब एक अरसा पहले फरमा गए हैं- मेरा रिश्ता अल्लाह मियां बेहद बेतकल्लुफ़ है। मुझे सियासी मज़हब की कोई ज़रूरत नहीं है।” Taliban take control afghanistan

काश! नसीरूद्दीन शाह के ये दो वाक्य मुस्लिम अवाम में घर-घर प्रचारित हो। लेकिन प्रचार हुआ जावेद अख्तर की आरएसएस बनाम तालिबानी बयान का! हिसाब से बॉलीवुड की दुनिया में मुस्लिम चेहरों, शाहरूख, सलमान खान, आमिर खान, जावेद अख्तर आदि तमाम क्रिएटिव मुस्लिम चेहरों को नसीरूद्दीन शाह के बयान का समर्थन कर, आगे बढ़ कर माहौल बना देना चाहिए था कि हिंदुस्तानी मुसलमान तालिबान और उस जैसी विचारधाराओं से सावधान रहे। हिंदुस्तानी इस्लाम सबसे अलग है और बहुसंख्यक हिंदुओं की सेकुलर या हिंदुवादी सरकार के बावजूद सह अस्तित्व में जीने में विश्वास रखता है।

लेकिन जावेद अख्तर ने आरएसएस की तालिबान से तुलना कर उलटे हिंदुओं और मुसलमानों को भड़काया-उकसाया कि जैसे तालिबान एक इस्लामी राष्ट्र चाहता है, वैसे ये लोग (आरएसएस) हिंदू राष्ट्र चाहते हैं…..तालिबान बर्बर है और उसके कृत्य निंदनीय हैं लेकिन जो लोग आरएसएस, बजरंग दल और बीएचपी जैसे संगठनों का समर्थन करते हैं, वो सब एक जैसे ही हैं।

Taliban take control afghanistan

Read also तालिबान का खतरा और मोदी की जयकार!

तय मानें जावेद अख्तर का बयान मुस्लिम घरों में ज्यादा फैला होगा और तालिबान इसलिए जस्टिफाई हुआ क्योंकि आरएसएस, बजरंग दल और वीएचपी भी वैसे ही हैं! ….सोचें, तालिबान को इस्लामी राष्ट्र, झंडा, शरिया कानूनों में अफगानिस्तान को बदलने में कितने घंटे लगे? जबकि मोदी सरकार, आरएसएस, बजरंग दल और वीएचपी का हिंदू राष्ट्र कहां है? क्या तालिबानी या इस्लामी मुल्क झटका मीट, पोर्क (सूअर का मांस), शराब के खानपान को रत्ती भर भी बरदाश्त कर सकते हैं? दूसरी ओर क्या संघ और मोदी सरकार में गौवध पाबंदी के अखिल भारतीय कानून बनाने की हिम्मत है? क्या फ्रांस, यूरोपीय देशों की तरह बुर्के पर पाबंदी, मस्जिदों के फैलाव को रोकने आदि जैसा कोई काम आरएसएस-भाजपा सरकारें करते हुए हैं?

तभी हिंदू की बात करना, हिंदू वोटों की राजनीति करना, संविधान अनुसार अपनी विचारधारा में कानून बदलना या बनाना या सियासी तानाशाही बनाना या चंद प्रतिक्रियावादी लंगूर नौजवानों के बीफ प्रकरण जैसी बातों पर जावेद अख्तर का हिंदू राष्ट्र, आरएसएस को कलंकित करना प्रमाण है कि बॉलीवुड के कथित क्रिएटिव मुस्लिम चेहरे वहीं मानसकिता लिए हुए हैं जो ओवैसी की है।

हां, इतिहास का सत्य है और यह जावेद अख्तर एंड पार्टी को भी मालूम है कि हिंदुओं ने हर तरह के मुस्लिम राज में जीवन जीया है। ऐसा सैकड़ों साल चला। अकबर के राज में भी हिंदू जीया है तो औरंगजेब के बर्बर राज में भी जीया है। उस नाते 1947 के बाद के हिंदू राज में नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी के 75 साला राज में बराबरी के जितने अधिकारों, लोकतांत्रिक, मानवाधिकारों, संविधान व्यवस्थाओं में मुसलमान सुकून से जीया है वैसा पाकिस्तान, कथित आजाद कश्मीर, बांग्लादेश या खाड़ी व अरब के देशों में न जीया है और न जीते हुए है। इसलिए फिर नसीरूद्दीन शाह को सलाम जो उन्होंने सौ टका रियलिटी से कहा- भारतीय इस्लाम हमेशा दुनिया भर के इस्लाम से अलग रहा है, और उन्हें उम्मीद है कि “ख़ुदा वो वक्त न लाए कि वो इतना बदल जाए कि हम इसे पहचान भी न सकें।”

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

View all of हरिशंकर व्यास's posts.

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

देश

विदेश

खेल की दुनिया

फिल्मी दुनिया

लाइफ स्टाइल

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
IPL Final : David Warner ने बताया कौन जीतेगा मुकाबला, तस्वीर शेयर कर …