nayaindia Article 370 : ऐसे दो साल पहले कभी नहीं!
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ऐसे दो साल पहले कभी नहीं!

Article 370 | सन् 2019-20 के दो वर्षों की तुलना वाले वर्ष भारत के इतिहास में ढूंढे नहीं मिलेंगे। पहला तथ्य कि ये दो वर्ष जनता द्वारा छप्पर फाड़ जिताने के तुरंत बाद के हैं। आजाद भारत के इतिहास में नेहरू से ले कर डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ऐसा कभी नहीं हुआ कि इधर शपथ हुई और उसके बाद कलह ही कलह के काम! तर्क के नाते ठीक बात है कि जम्मू-कश्मीर से 370 हटाना, सीएए कानून, राम मंदिर निर्माण का काम मामूली नहीं है। इस नाते चाहे तो इन दो सालों को उपलब्धियों के अभूतपूर्व वर्ष कह सकते हैं। जो कोई नहीं कर पाया वह नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने कर दिया। तब जरा ठंडे दिल-विवेक से सोचें क्या कश्मीर समस्या का समाधान हो गया? क्या मुसलमान और पाकिस्तान ठंडे पड़ गए? सीएए बना तो क्या बांग्लादेशी भारत से बाहर जा रहे हैं? मंदिर बन रहा है तो क्या रामजी का आशीर्वाद बना है? इतना बड़ा काम है तो रामजी, शिवजी, लक्ष्मीजी क्यों भारत के हिंदुओं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से रूष्ट हैं? ऐसा क्यों लग रहा है कि भारत से कोई बड़ा पाप हुआ है जो महामारी की सर्वाधिक मार हिंदुओं को झेलनी पड़ रही है? क्यों भाग्यशाली मोदी बदकिस्मती में महामारी की भयावहता का कलंक बनवा रहे हैं?

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Article 370 : इन दो सालों की कथा में सचमुच पाप-पुण्य, सत्य-झूठ, मूर्खता-समझदारी का सत्व-तत्व है। मैं बार-बार ऐसे शब्द लिखता हूं क्योंकि राष्ट्र जीवन कुल मिला कर बेसिक बात वाले कुछ शब्दो से ही बना-बिगड़ा होता है। मैं मानता हूं कि वैश्विक पैमाने, समकालीन इतिहास में भी सन् 2020-21 का वर्ष अकल्पनीय और विनाशक है। कहने वाले कहते ही हैं कि अमेरिका, ब्रिटेन को देखो, वे भी वायरस, बीमारी, मौत के मारे हैं। तो जैसा उनका साल वैसा हमारा साल! मगर इस तरह सोचना भी हमारे और उनके फर्क का प्रमाण है। महामारी आपदा है, ज्ञान-विज्ञान-अनुभव का सत्य है तो इसमें मायने-समझने वाली बात है कि अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोप याकि विकसित-सभ्य देशों के प्रधानमंत्रियों-राष्ट्रपतियों ने कोविड-19 का क्या सत्य माना, कैसा व्यवहार, कैसे फैसले लिए? जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्या सोचा, क्या किया?

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जवाब है अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय देशों ने माना कि वायरस से मरेंगे। मौत को रोकने के लिए तत्काल लॉकडाउन, इमरजेंसी मेडिकल व्यवस्था बना लगातार चुस्त-एलर्ट, टेस्ट-ट्रेस-रिस्पांस में उन्हें रहना है। दूसरी सोच, दो टूक फैसला कि वैक्सीन बने, वह लगे, तभी नॉर्मल वक्त लौटेगा। क्या ऐसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सत्य बोध, संकल्प, फैसले थे? अमेरिका, ब्रिटेन ने वायरस को चुनौती माना। टीका बनाने के लिए अरबों रुपए विज्ञान में खर्च किए और ज्योंहि बना पूरी आबादी के टीके का काम।… इन देशों ने मानव विकास के क्रम में चुनौती और जवाब की वैज्ञानिकता-सत्य में कोविड-19 को हैंडल किया ठीक विपरीत नरेंद्र मोदी ने हर वह काम किया जो या तो नकल से (जैसे बिना तैयारी के लॉकडाउन) था या झूठ-अंधविश्वास के वे फैसले थे, जिनसे आज दुनिया के आगे भारत की श्मशान, गोबर की तस्वीरें हैं। दीया, ताली-थाली, काढ़ा, रामदेव का अनुभव वह सच्चाई लिए हुए है, जिससे सन् 2020-21 का वक्त कुल मिला कर सन् 1918-20 (स्पेनिश फ्लू में भारत की बरबादी और करोड़ों लोगों की मौत) की पुनरावृत्ति है।

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वह अंग्रेजों की गुलामी का वक्त था जबकि आज…? तभी एक मायने में लगता है अंग्रेज अपनी सत्ता में खोये अपने में मस्त मरते हुए आम लोगों की बेफिक्री में थे तो वहीं सत्ता रूप, चरित्र क्या आज नहीं है? तब भी अंग्रेज लाट साहिब दुखियारों के बीच दौरे करते हुए, आंसू पोंछते, लकड़ी-कफन की व्यवस्था की चिंता करते हुए नहीं थे तो सन् 2019-20 के दो वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सत्ता का वैसा ही तो व्यवहार है। मोदी कहां संक्रमितों के बीच दौरे करते, लकड़ी-कफन पहुंचवाते और घर-घर टीका पहुंचाने या उसके लिए जरूरी जोर-जबरदस्ती करते हुए हैं?.. अंग्रेजों की सत्ता ने लोगों को अपने हाल पर मरने को जैसे छोड़ा था वैसा ही क्या इन दो सालों में नहीं दिखा। फिर भले बात किसानों की है, धरने पर बैठी बूढ़ी अम्माओं की हो या सांस की बूंद-बूंद के लिए तड़पते-मरते मरीजो की। … तभी अपना यह निष्कर्ष नोट रखें कि ये दो वर्ष असल में वह आधार वर्ष, वह नींव हैं, जिस पर अगले तीन वर्षों में अपने आप बरबादी का विशाल लाक्षागृह बनता हुआ होगा। अगले दो साल और ज्यादा खराब होंगे।(Article 370)

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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