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गद्दी पर रहेंगे, शासन क्या करेंगे!

दूसरे कार्यकाल के दो साल पूरे होते-होते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वहीं स्थिति है, जो 2014 से पहले तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हो गई थी। वे अपने आखिरी तीन साल प्रधानमंत्री रहे यानी गद्दी पर बैठे रहे लेकिन शासन नहीं कर पाए। उन्होंने अगले तीन साल सिर्फ घटनाओं पर प्रतिक्रिया दी। हवा के साथ बहते रहे और अंत नतीजा कांग्रेस की ऐतिहासिक पराजय का निकला।

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नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा भी उसी नतीजे पर पहुंचेगी यह अभी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि मनमोहन सिंह के मुकाबले मोदी प्रो एक्टिव होकर स्थितियों को संभालने का प्रयास करेंगे। परंतु मोदी सरकार का घटनाओं पर अब नियंत्रण नहीं है। इकबाल भी धीरे धीरे खत्म हो रहा है। सरकार की साख और विश्वसनीयता सात साल में सबसे निचले स्तर पर है। पहली बार ऐसा हुआ है कि उनके समर्थकों के मन में भी अविश्वास पैदा है। कोराना वायरस का संक्रमण शुरू होने से पहले सब कुछ मोदी के कंट्रोल में दिख रहा था। लेकिन पहले संकट ने ही सब कुछ संभाल लेने की उनकी क्षमता पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया। वे कोरोना संकट को नहीं संभाल सके, देश का आर्थिक संकट उनके काबू में नहीं आया, चीन को नहीं संभाल सके, जिसने भारत में घुस कर जमीन कब्जा कर ली, वे किसान आंदोलन को नहीं संभाल सके, महंगाई को नहीं संभाल सके, पेट्रोल की कीमत सौ के पार पहुंच गई तो खाने का तेल भी दोगुना-तिगुना महंगा हुआ और इन सबके बीच चुनाव भी नहीं जीत सके।

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नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत बड़े जबरदस्त तरीके से हुई थी। उन्होंने दशकों पुराना आरएसएस, भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के एजेंडे को पूरा कर दिया था। अनुच्छेद 370 हटा कर, नागरिकता कानून में संशोधन लाने के साथ सुप्रीम कोर्ट से राम मंदिर के निर्माण की अनुमति के काम छह महीने में हो गए थे।  सबने उसी समय मान लिया था कि 2024 जीतने से उनको कोई नहीं रोक सकता।

यह कुछ कुछ वैसे ही था, जैसे 1971 में इंदिरा गांधी के दूसरी बार चुनाव जीत कर सरकार बनाने के बाद हुआ था। इंदिरा गांधी ‘गरीबी हटाओ’ के नारे पर चुनाव जीती थीं और उसके तुरंत बाद उन्होंने इतिहास बनाने वाला काम किया था। उसी साल उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक लड़ाई जीती और उसका विभाजन करा कर बांग्लादेश बनवाया। तब उनकी लोकप्रियता चरम पर थी। किसी ने सोचा नहीं था कि अगले दो-तीन साल में हालात ऐसे बिगड़ेंगे कि उनको इमरजेंसी लगानी होगी और बेआबरू होकर सत्ता से बाहर जाना होगा।

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दूसरे कार्यकाल में सितंबर 2019 में अमेरिका जाकर अबकी बार ट्रंप सरकार का नारा लगाना मोदी की ऐतेहासिक गलती थी। उन्होंने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी थी। उसके बाद दिल्ली के शाहीन बाग और देश के दूसरे हिस्सों में सीएए विरोधी आंदोलन शुरू हुआ तो बेपरवाह बैठे रहे। हजारों लोगों के सड़क पर बैठे होने से लाखों लोग रोज परेशान हो रहे थे पर सरकार को लग रहा था कि वह मुस्लिम आंदोलनकारियों को बदनाम कर रही है, इसलिए सरकार ने आंदोलन खत्म कराने की पहल नहीं की। तभी पहली बार यह सवाल लोगों के मन में आया कि यह कैसी सरकार है या सरकार कहां है? सरकार को जो काम करना चाहिए वह उसने नहीं किया। ठीक यही कहानी किसान आंदोलन में दोहराई गई। सरकार और भाजपा को लगता रहा कि वे किसानों को खालिस्तानी बता कर उनको बदनाम कर रहे हैं पर छह महीने चले इस आंदोलन ने सरकार की साख पर सबसे बड़ा बट्टा लगाया है।

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कोरोना वायरस की महामारी की पहली और दूसरी दोनों लहर के लिए सरकार की गलतियां जिम्मेदार हैं। पहली लहर आ रही थी तब देश में नमस्ते ट्रंप कार्यक्रम की तैयारी हो रही थी और जब दूसरी लहर आ रही थी तब कोरोना के खिलाफ जंग जीत जाने का ऐलान करके चुनावी प्रचार था। कोरोना संक्रमण से लाखों लोगों की मौत, करोड़ों लोगों की बीमारी, करोड़ों प्रवासी मजदूरों के पलायन और करोड़ों लोगों की बेरोजगारी ने सरकार के अस्तित्व पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इस संकट के समय लोगों को सरकार के दर्शन नहीं हुए। लोग अपने छोटे-छोटे बच्चों को कंधे पर लिए पैदल चल रहे थे और सरकार उन पर डंडे बरसा रही थी। लोग ऑक्सीजन के लिए भटक रहे थे, अस्पताल में बेड्स और दवाओं के लिए भागदौड़ कर रहे थे, श्मशान में अंतिम संस्कार के लिए कतार में खड़े थे, अब भी वैक्सीन के लिए भटक रहे हैं और उन्हें कहीं सरकार नहीं दिख रही है। वे पूरी तरह से लाचार और असहाय भटक महसूस कर रहे थे और अब भी कर रहे हैं। लोगों की इस लाचारगी और असहायता ने सरकार की साख खत्म कर दी है। अगर घटनाओं को क्रमबद्ध तरीके से रखें तो सीएए विरोधी आंदोलन, हाउडी मोदी कार्यक्रम, नमस्ते ट्रंप कार्यक्रम, प्रवासी मजदूरों का पलायन, लद्दाख में चीन का भारतीय जमीन कब्जा करना और भारतीय जवानों का शहीद होना, केंद्रीय कृषि कानून और उसके  विरोध में शुरू हुआ किसान आंदोलन, कोरोना संक्रमण को संभालने में सरकार की नाकामी, बेरोजगारी, आर्थिक संकट और इस संकट से निपटने के लिए सरकारी संपत्तियों को बेचने का फैसला आदि कुछ ऐसी घटनाएं हैं, जिनसे सरकार का इकबाल स्थायी तौर पर खत्म हुआ है। अब किसी भी प्रचार से उसे वापस नहीं हासिल किया जा सकता है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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