योगी के साथ रूपानी जैसा बरताव! - Naya India
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योगी के साथ रूपानी जैसा बरताव!

भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने योगी को समझनें में गलती की। पार्टी के सर्वोच्च नेताओं ने योगी को भी वैसा ही मुख्यमंत्री मान लिया, जैसा गुजरात में विजय रूपानी को या हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर को मानते रहे। उनको यही लगा कि जैसे उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत को बदल दिया वैसे ही उत्तर प्रदेश में जब चाहेंगे तब योगी को बदल देंगे या जैसा चाहेंगे वैसा इस्तेमाल कर लेंगे। योगी ने भी शुरू के चार साल अपने को इस तरह से इस्तेमाल होने दिया, लेकिन अब वे खुल कर अपनी शिकायतों को इजहार कर रहे हैं। उन्होंने पार्टी की ओर से लखनऊ भेजे गए संगठन महामंत्री बीएल संतोष को अपनी शिकायतें बताई हैं। कहा जा रहा है कि उन्होंने पार्टी और संगठन में अनदेखी किए जाने का आरोप लगाया है।

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अगर यह बात सही है तो योगी की नाराजगी समझ में आती है। बताया जा रहा है कि योगी ने कहा कि केंद्रीय नेतृत्व ने कभी उनकी परवाह नहीं की। उन्होंने कहा बताया है कि जिलाध्यक्षों की नियुक्ति में उनकी राय नहीं ली जाती है। किसको राज्यसभा में भेजना है और किसको विधान परिषद का सदस्य बनाना है, यह भी ऊपर से तय किया जाता है। जाहिर है विधान परिषद वाली नाराजगी दिल्ली से भेजे गए एके शर्मा की वजह से है। एके शर्मा प्रधानमंत्री कार्यालय में तैनात आईएएस अधिकारी थे। वे गुजरात में भी नरेंद्र मोदी के साथ रहे थे। उनको वीआरएस दिला कर अचानक दिल्ली से लखनऊ भेजा गया और एमएलसी बनाने को कहा गया। इसके साथ ही यह चर्चा चली कि वे उप मुख्यमंत्री होंगे और गृह व कार्मिक विभाग संभालेंगे।

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ऐसा लग रहा है कि उनको भेजे जाने तक योगी के सब्र का बांध टूट गया और उन्होंने शर्मा को सरकार में शामिल करके कोई उच्च पद देने से मना कर दिया। बाद में बताया गया कि शर्मा ने पूर्वांचल में कोरोना प्रबंधन का किया है और प्रधानमंत्री इससे काफी खुश हैं। इसके बावजूद योगी ने उनको मंत्री नहीं बनाया है। योगी ने अब तक जब सब कुछ केंद्रीय नेतृत्व के कहने से किया तो अब ऐसा क्या हो गया कि उन्होंने अचानक तेवर बदल लिए? इसका कारण चुनाव है। अगले आठ महीने में चुनाव होने वाले हैं और योगी को पता है कि इस समय अगर वे समझौता करते हैं तो उनके लिए आगे मुश्किल हो सकती है। वे जानते हैं कि पिछली बार चुनाव में उनका चेहरा नहीं था और वे आलाकमान की कृपा से मुख्यमंत्री बने लेकिन इस बार वे अपने दम पर मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं ताकि आगे की राजनीति के लिए उनकी पोजिशनिंग हो।

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इसलिए उन्होंने एके शर्मा के बहाने अपनी पोजिशनिंग की है। उनको पता है कि अगर इस समय समझौता किया तो चुनाव तक और भी कई समझौते करने होंगे। इसमें उनकी चिंता के दो मुद्दे साफ दिख रहे हैं। पहला मुद्दा मुख्यमंत्री पद का दावेदार पेश करने का और दूसरा टिकट बंटवारे का। एंटी इन्कंबैंसी कम करने के लिए अनेक विधायकों की टिकट काटी जा सकती है। ऐसे में यह अहम होगा कि किसके करीबियों को ज्यादा टिकट मिलती है। अगर उम्मीदवारों की सूची केंद्रीय नेतृत्व द्वारा कराए गए सर्वेक्षणों के आधार पर बनती है तो उसमें मुख्यमंत्री और प्रदेश संगठन की कोई भागीदारी नहीं होगी। फिर सारे उम्मीदवार केंद्रीय नेतृत्व की पसंद के होंगे। चुनाव के बाद इसका असर देखने को मिल सकता है। अगर ऐसा होगा तो फिर चुनाव के बाद मुख्यमंत्री का फैसला भी आलाकमान की मर्जी से होगा।

दूसरा, मुद्दा मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करके चुनाव लड़ने का है। भाजपा ने इस साल असम के चुनाव में अपने मौजूदा मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के नाम का ऐलान नहीं किया था और चुनाव के बाद पूर्व कांग्रेसी हिमंता बिस्वा सरमा को मुख्यमंत्री बनाया। पिछले चार साल के अनुभव में योगी को अंदाजा हो गया है कि अगर इस समय वे दबाव में आए तो टिकटें सारी केंद्रीय नेतृत्व से तय होंगी और संभव है कि उनको मुख्यमंत्री का दावेदार घोषित करके चुनाव लड़ने की बजाय सामूहिक नेतृत्व में या नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ने की बात हो। तभी उन्होंने पैंतरा बदला और दबाव में आने से इनकार कर दिया। उनको इन खबरों से भी मदद मिली है, जिनमें कहा गया है कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ उनके चेहरे पर ही चुनाव लड़ना चाह रहा है। सो, कुल मिला कर चार साल तक रूपानी के जैसा बरताव करने के बाद योगी ने अब वह चोगा उतार दिया है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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