अमेरिका को लेकर पूर्वाग्रह छोड़ें

अमेरिका और इजराइल,  दुनिया के ये दो ऐसे देश हैं, जिनको लेकर भारत में सबसे ज्यादा मिथक गढ़े गए हैं और सबसे ज्यादा पूर्वाग्रह पाला गया है। दोनों के सबसे ज्यादा विरोधी भारत में मिलेंगे और सबसे ज्यादा पूर्वाग्रही भी। पढ़े-लिखे और विदेश मामलों की जानकारी रखने वाले वैदिक जी भी और भारत में चुनाव विश्लेषण को एक विधा के रूप में स्थापित करने वाले योगेंद्र यादव भी। ऐसे तमाम लोग एक जैसी सोच में अमेरिका में खोट निकालते रहेंगे। अमेरिका में हुए इस बार के चुनाव ने सबको मौका दिया है कि वे अमेरिकी लोकतंत्र, शासन, प्रशासन, प्रचार के तरीके, चुनाव के तरीके और लोगों के व्यवहार में कमी निकालें। सबके लिए हैरानी की बात है कि अमेरिका में भारत की तरह चुनाव आयोग नहीं है।

लोग इस पर हैरान हो रहे हैं कि जिसको पॉपुलर वोट ज्यादा मिलते हैं वह इलेक्टोरल कॉलेज के निश्चित संख्या में वोट नहीं मिलने पर हार जाता है। कई दिन तक गिनती चलती रहती है। ध्यान रहे यह बात वे लोग भी कह रहे हैं, जिनको भारत में लगता है कि इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम में गड़बड़ी हो सकती है। सोचें, इस हिप्पोक्रेसी के बारे में! भारत की बड़ी ऐसी जमात है, जो नरेंद्र मोदी की जीत को ईवीएम की गड़बड़ी बताती है और मिसाल देती है कि अमेरिका जैसे विकसित देश में बैलेट पेपर से चुनाव होता है। आज वहीं लोग कह रहे हैं कि अमेरिका में गिनती में इतना समय लग रहा है! जब बैलेट से चुनाव होगा तो गिनती में समय लगेगा ही। इसे लेकर हायतौबा मचाने की जरूरत नहीं है।

अगर पूर्वाग्रह छोड़ें तब समझ में आएगा कि कोरोना वायरस की महामारी के कारण किए गए बंदोबस्तों की वजह से भी गिनती में देरी हुई है। सोचें, बिहार में चुनाव हो रहा है। देश के सारे जानकार बिहार को राजनीतिक रूप से सबसे जागरूक राज्य मानते हैं, लेकिन 50 फीसदी वोटिंग में लोग हांफने लग रहे हैं। पांच साल पहले हुए मतदान का रिकार्ड नहीं टूट रहा है। बिहार में दो चरणों में 2015 के चुनाव के मुकाबले कम वोटिंग हुई है। सोचें, बिहार में पांच साल पहले का रिकार्ड नहीं टूटा और अमेरिका में 120 साल का रिकार्ड बन गया! 120 साल के इतिहास में कभी अमेरिका में इतने लोगों ने वोट नहीं डाले। यह भी रिकार्ड है कि अमेरिका के किसी राष्ट्रपति को इतने वोट नहीं मिले, जितने जो बाइडेन को अभी तक मिल चुके हैं। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि कोरोना महामारी को देखते हुए जिला यानी काउंटी स्तर पर प्रशासन ने अर्ली वोटिंग के बंदोबस्त किए, मेल इन बैलेट के नियमों में बदलाव किया, जिसे अदालतों ने मंजूरी दी और एबसेंटी बैलेट यानी अपने चुनाव क्षेत्र से बाहर रहने वाले लोगों के लिए अलग वोटिंग की व्यवस्था की गई। पूछा जाना चाहिए ऐसी एक चीज कौन सी है, जो लोकतंत्र को जिंदादिल बनाती है तो जवाब होगा, लोगों की भागीदारी। यह अमेरिकी लोकतंत्र की खूबसूरती है कि 33 करोड़ की आबादी वाले देश में 24 करोड़ वोटर हैं और उनमें से 16 करोड़ से ज्यादा यानी 75 फीसदी से ज्यादा लोगों ने वोट किया। 130 करोड़ की आबादी और 90 करोड़ मतदाता वाले देश भारत में पिछले चुनाव में 54 करोड़ यानी 60 फीसदी के करीब लोगों ने वोट डाले थे। वह भी तब, जब कोरोना जैसी कोई महामारी नहीं थी।

यह भी पूर्वाग्रह है या नासमझी है जो भारत में कहा जाता है कि अमेरिका में पॉपुलर वोट हासिल करने वाला चुनाव हार गया और इलेक्टोरल कॉलेज के ज्यादा वोट लेने वाला जीत गया।  पिछले चुनाव में हिलेरी क्लिंटन के साथ ऐसा हुआ था। हालांकि उनको इस बात की कोई शिकायत नहीं है और न उन्होंने चुनाव हारने के बाद अमेरिका में वोटिंग का सिस्टम बदलने की मांग की। इस बार भी पॉपुलर वोट में 40 लाख के ज्यादा अंतर से आगे चल रहे बाइडेन को इलेक्टोरल कॉलेज को वोट हासिल करने में पसीने छूट रहे हैं, लेकिन वे भी यह दावा नहीं कर रहे हैं कि उन्हें ज्यादा वोट मिल गए हैं तो उनको जीता हुआ माना जाए। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनको अपने सिस्टम की वैज्ञानिकता पर भरोसा है। यह भारत के विद्वान राजनीतिक जानकारों की नासमझी या हिप्पोक्रेसी है, जो वे अपने यहां की वोटिंग की खामी को नहीं देखते हैं। अभी बिहार का चुनाव चल रहा है तो जरा पिछले लोकसभा चुनाव में बिहार के इस तथ्य पर नजर डालें। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल को पॉपुलर वोट का 15.4 फीसदी वोट मिला। उसके उम्मीदवारों को 62 लाख 70 हजार वोट मिले और लोकसभा के लिए एक भी सदस्य नहीं चुना गया! सोचें, 96 लाख वोट लेकर भाजपा के 17 सांसद हैं और 62 लाख वोट लेकर राजद का एक भी सांसद नहीं है! इससे पहले यानी 2014 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी को 20 फीसदी के करीब वोट मिले थे और उसका एक भी सांसद नहीं जीत सका था। सो, अमेरिकी वोटिंग सिस्टम की खामी निकालने की बजाय पहले ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ वाले अपने सिस्टम की खामियों को दूर किया जाए।

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