संस्थाओं की ईमानदारी बेजोड़

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जॉर्जिया और मिशिगन में आगे चल रहे थे। लेकिन जब पोस्टल बैलेट खोले गए तो वे पिछड़ने लगे और लगातार पिछड़ते हुए मिशिगन में हार गए और जॉर्जिया में भी हारने की कगार पर पहुंच गए। तो उनकी पार्टी के प्रचार अभियान संभालने वालों ने अदालत का रुख किया और 24 घंटे के अंदर दोनों राज्यों की सर्वोच्च अदालत ने ट्रंप कैंपेन की याचिका खारिज करते हुए कहा कि न मतदान में कोई गड़बड़ी हुई है और न गिनती में कोई गड़बड़ी हो रही है। अब जरा, भारत के बारे में सोचें। मई 2019 में हुए चुनाव के बाद किसी ने वायनाड से राहुल गांधी के चुनाव को चुनौती दी थी। पिछले हफ्ते उस पर फैसला आया है। एक लोकसभा सीट पर चुनाव को दी गई चुनौती के मामले में एक साल पांच महीने बाद फैसला आया। चुनाव से जुड़े कई मामलों में अदालत का फैसला आने में ठीक पांच साल लगते हैं, तब तक अगला चुनाव आ जाता है। जिसने राष्ट्रपति चुनाव से पहले दोनों उम्मीदवारों की बहस देखी, वे मीडिया की आजादी के भी कायल हुए होंगे। क्या भारत में या रूस, चीन किसी भी देश में इस बात की कल्पना की जा सकती है कि कोई स्वतंत्र पत्रकार राष्ट्रपति और भावी राष्ट्रपति से मुश्किल सवाल पूछे या कुतर्क करने पर उसके माइक की आवाज बंद कर दे!

अमेरिका की न्यायपालिका पर सवाल उठाने वाले योगेंद्र यादव जैसे बुद्धिजीवी को यह मिसाल  याद रखनी चाहिए। पिछले दिनों उन्होंने एक लेख लिखा- अमेरिका के ‘महान लोकतंत्र’ के ‘जन्नत’की हकीकत। उनके हिसाब से न तो अमेरिकी लोकतंत्र महान है और न जन्नत है। उन्होंने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति खुल्लमखुल्ला पार्टी की पक्षधरता के आधार पर होती है। यह सही है कि अमेरिका में जिस पार्टी की सरकार होती है वहीं जजों की नियुक्ति करती है। लेकिन वह नियुक्ति ऐसे ही नहीं हो जाती है। उसकी प्रक्रिया लंबी चलती है और संसद  की मंजूरी के बगैर नियुक्ति मान्य नहीं होती है। ध्यान रहे 1993 से पहले भारत में भी केंद्र सरकार ही जजों की नियुक्ति करती थी और उसे संसद से मंजूर कराने की जरूरत नहीं होती थी। भारत में अब जज की जजों द्वारा नियुक्ति हैं लेकिन उसमें भी सरकार की अहम भूमिका होती है। ध्यान रहे पूरी प्रक्रिया में संसद की कहीं भूमिका नहीं होती है। जजों की नियुक्ति में सरकार की कैसी भूमिका होती है उसका अंदाजा पिछले कुछ दिनों से कॉलेजियम की ओर से भेजे जा रहे नामों के खारिज होने से लग रहा है। जजों के नियुक्त किए जज कैसा काम कर रहे हैं, इसकी पोल खुद सुप्रीम कोर्ट के जजों ने खोली है। अमेरिका में पार्टियों के प्रति प्रतिबद्धता रखने वाले जज नियुक्त होते हैं, यह भी सही है कि ट्रंप ने चुनाव से ठीक पहले अपनी पार्टी की पक्षधरता वाली एक महिला को सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त कराया है, यह भी सही है कि सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों में रिपब्लिकन पक्षधरता वाले छह जज हैं और चीफ जस्टिस सहित तीन जज डेमोक्रेटिक पक्षधरता वाले हैं। लेकिन यह इस बात की गारंटी नही है कि ट्रंप सुप्रीम कोर्ट जाकर मनचाहा फैसला ले आएंगे। सुप्रीम कोर्ट में बेशक उनकी पार्टी के समर्थक जज ज्यादा हैं, लेकिन फैसला वस्तुनिष्ठ ही होगा। ट्रंप अपने चीफ जस्टीस से पेनसीलवेनिया की काउंटी की बनाई चुनावी व्यवस्था पर स्थानिय और स्टेट सुप्रीम कोर्ट के सही ठहराने के फैसले पर वीटो नहीं लगवा पाए। संघीय सुप्रीम कोर्ट में रंजन गौगोई या अरूण मिश्रा टाइप जैसे जज कभी सुने नहीं।

योगेंद्र यादव को अमेरिकी लोकतंत्र इसलिए महान नहीं लगता है कि वहां चुनाव आयोग जैसी कोई संस्था नहीं है और 50 राज्यों के अपने अपने नियम हैं। भारत में तो चुनाव आयोग है तो वह क्या कर लेता है? चुनाव आयोग ने बदजुबानी के लिए एक नेता से स्टार प्रचारक का दर्जा छीना तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आप कौन होते हैं स्टार प्रचारक का दर्जा छीनने वाले, आपको इसका अधिकार नहीं है। यानी महान लोकतंत्र का चुनाव आयोग किसी नेता को प्रचार में बदजुबानी करने से भी नहीं रोक सकता है। चेतावनी देने और कभी कभी आलोचना कर देने के अलावा आयोग के पास कोई अधिकार नहीं है। चुनाव से जुड़े सारे मामले अदालतों में ही जाकर निपटते हैं।

योगेंद्र यादव को अमेरिका का लोकतंत्र इसलिए महान नहीं लग रहा है कि वहां चुनाव खर्च की कोई सीमा नहीं है। उन्होंने लिखा है कि राष्ट्रपति पद के दोनों उम्मीदवारों ने मिल कर 11 हजार करोड़ रुपए खर्च किए हैं। सोचें, योगेंद्र यादव कितनी सहजता से भारत की सचाई की अनदेखी कर दे रहे हैं। भारत में खर्च की सीमा तय है। लोकसभा चुनाव में कोई उम्मीदवार 60 लाख रुपए से ज्यादा नहीं खर्च कर सकता है। विधानसभा के उम्मीदवार को 28 लाख रुपए से ज्यादा खर्च नहीं करने हैं।पर चुनाव खर्च और उम्मीदवारों के हलफनामे आदि का अध्ययन करने वाली स्वतंत्र संस्था एडीआर ने बताया था कि 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में 10 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। जाहिर है ज्यादा खर्च तीन पार्टियों- भाजपा, कांग्रेस और जेडीएस ने किया होगा। फिर भी सारे उम्मीदवारों को भी मिला दें तो चार-पांच सौ करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च नहीं होना चाहिए था पर खर्च हुआ 10 हजार करोड़ रुपए। भारत में सीमा है तो एक राज्य में 10 हजार करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं और दुनिया के सबसे संपन्न देश में राष्ट्रपति के चुनाव में 11 हजार करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं!

उन्हें इस बात पर आपत्ति है कि अमेरिका में चुने हुए प्रतिनिधि कारपोरेट और उद्योग जगत के लिए पैसे लेकर सवाल पूछते हैं और इसे वहां मान्यता मिली हुई है। भारत में इसकी मान्यता नहीं है फिर भी पैसे लेकर सवाल पूछने के आरोप में सांसदों की सदस्यता गई है। नारदा स्टिंग में अनेक सांसद सवाल पूछने के लिए पैसे लेने की बात करते दिख रहे हैं और मजेदार बात यह है कि किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई है अभी तक। क्या उनको पता नहीं है कि क्रोनी कैपिटलिज्म भारत में कैसे फल-फूल रहा है? कैसे सत्ता में बैठे लोग एक या दो उद्योग घरानों को आगे बढ़ा रहे हैं? योगेंद्र यादव को इस बात से भी दिक्कत है वहां कानून पास कराने के लिए राष्ट्रपति और संसद में हमेशा टकराव होता रहता है। क्या यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं है? क्या वे इस बात से खुश हैं कि भारत का प्रधानमंत्री जो तय कर दे, उस पर संसद को कानून बनाना ही चाहिए! अगर ऐसा है तो फिर प्रधानमंत्री की मर्जी से संसद में पास किए गए कृषि कानूनों को लेकर वे क्यों सड़कों पर उतरे हुए हैं?

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