यूपी से ही दिल्ली का हिंदू पीएम - Naya India
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यूपी से ही दिल्ली का हिंदू पीएम

यह बात हिंदू राजनीति के संदर्भ में है। इसका यह तथ्य नोट रखें कि नरेंद्र मोदी ने भी बनारस से यूपी को साध कर दिल्ली की सत्ता बनाई है। हिंदू राजनीति से दिल्ली में तख्तपोशी का जरिया गंगा-यमुना मैदान है। तभी योगी आदित्यनाथ के लिए 2022 का विधानसभा चुनाव निर्णायक है। यदि वे अपने दमखम पर यूपी में दुबारा मुख्यमंत्री बन गए तो वे हिंदुओं के अगले स्वाभाविक प्रधानमंत्री होंगे। तब 2024 के लोकसभा चुनाव की जीत का श्रेय उनका होगा। तब तक नरेंद्र मोदी की दस साल की सत्ता इतनी मौतें, ऐसा दिवालियापन लिए हुए होगी कि उनके आगे योगी वक्त के बादशाह होंगे। अमित शाह क्यों नहीं? इसलिए कि मोदी और योगी के बीच यूपी के हिंदू वोटों में उनके महानायक बनने की गुंजाइश नहीं है। जब योगी यूपी से पूरे देश के साधु-संत समाज, भगवा राजनीति के प्रतीक नेता हैं तो न राम मंदिर में अमित शाह की भूमिका का मतलब है और न प्रदेश के बाकी भगवा विकास में अमित शाह श्रेय कमा सकते हैं। यदि हिंदू-मुस्लिम दंगे याकि बतौर गृह मंत्री सड़कों पर पानीपत की तीसरी लड़ाई का सिनेरियो भी अमित शाह बनवाए तब भी यूपी में तो सब कुछ योगी की कमान के श्रेय में होगा।

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तो गंगा-यमुना दोआब में हिंदू राजनीति का हर पहलू योगी आदित्यनाथ की पूजा बनवाने वाला है। जब ऐसा है तो संघ-भाजपा-सोशल मीडिया की लंगूरी सेना के पास अपने आप योगी भजन का विकल्प बनेगा। हिंदू विरोधी कथित ताकतों, राजनीति और नेताओं के आगे योगी आदित्यनाथ ही दहाड़ते हुए होंगे। इसलिए 2022 का विधानसभा चुनाव योगी आदित्यनाथ के लिए जीवन-मरण वाला चुनाव है। इससे पिछला सन् 2017 का विधानसभा चुनाव पूरी तरह नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा गया था। तब प्रदेश के कई नेताओं में एक नेता योगी आदित्यनाथ थे। जबकि अब वे अकेले नेता हैं और उनके काम, चेहरे और नाम पर चुनाव लड़ा जाएगा। सन् 2022 के चुनाव में यों मोदी का नाम जरूर होगा लेकिन उनके नाम-चेहरे के साथ बनारस शहर में भी अब ये चर्चाएं है कि कहां हैं अच्छे दिन? कहां हैं काम-धंधे? लोगों को कहां रोजगार, कहां इलाज, कहां टीके और इतनी महंगाई, पेट्रोल-डीजल इतना महंगा?

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सचमुच योगी आदित्यनाथ या भाजपा के हर मुख्यमंत्री की परेशानी में मोदी सरकार की असफलताओं की फेहरिस्त है। आगे के सभी विधानसभा चुनावों में प्रदेश भाजपा नेताओं को केंद्र सरकार की निगेटिविटी, मोदी सरकार के हाथों सात साल से हो रही बरबादी के तथ्यों से पार पा कर चुनाव जीतना है। हिंदू चेहरे के नाते दूसरे प्रदेशों में नरेंद्र मोदी का हिंदू ब्रांड चलेगा लेकिन यूपी में क्योंकि योगी का सौ टका खालिस-प्रामाणिक हिंदू चेहरा है तो लोग वहां हिंदू मोदी से नहीं, बल्कि योगी से आश्वस्त हो कर वोट डालते हुए होंगे।

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और वह जीत योगी को दिल्ली के पैमाने पर, अखिल भारतीय स्तर पर नंबर एक हिंदू नेता स्थापित कराने वाली होगी। तब योगी का दिल्ली सफर शुरू होगा। तब 2024 के लोकसभा प्रचार में योगी का फोटो सबसे बड़ा होगा। क्या यह सिनेरियो मोदी-शाह नहीं बूझे हुए होंगे? बिल्कुल है तभी पिछले तीन महीनों से कोशिश यह मैसेज बनाने की है कि योगी से यूपी संभल नहीं पा रहा है सो, मोदीजी ने अपने खास, प्रशासकीय अनुभव लिए अफसर का इस्तीफा करवा कर विधायक-मंत्री बनाने का फैसला किया। महामारी के वक्त वाराणसी में भी लापरवाही थी इसलिए पीएम ने एके शर्मा को वहां बैठाया। उनके चलते बनारस और पूर्वी यूपी के जिलों में चिकित्सा व्यवस्था बहाल हो पाई।

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इस तरह का हल्ला, प्रचार, मैसेजिंग यदि राजनीति नहीं है तो क्या है? तभी मजेदार मामला है जो मोदी-शाह का योगी के प्रति भाव बदला है और योगी भी चिमटा उठाए हुए है!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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