अधिकारियों की हिम्मत भी काबिले तारीफ

अमेरिका में ऐसा नहीं है कि लोकतंत्र बचाने के लिए सिर्फ नेता आगे आए और पार्टी लाइन तोड़ कर डोनाल्ड ट्रंप का विरोध किया। अमेरिकी अधिकारियों, जिनको ट्रंप ने ऊंचे पदों पर रखा था, उन्होंने भी हिम्मत दिखाई। भारत में जहां प्रधानमंत्री के सोचे आर्थिक सुधारों को लागू करने में दिक्कत होती है तो उनका चुना हुआ अधिकारी कहता है कि भारत में बहुत ज्यादा लोकतंत्र हो गया है वहीं अमेरिका में लोकतंत्र बचाने के लिए अमेरिकी अधिकारियों ने खुल कर ट्रंप का विरोध किया, उनको हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया और उनके कृत्यों को लोकतंत्र के लिए काला धब्बा कहा।

छह जनवरी को अमेरिका में हिंसा शुरू हुई नहीं कि राष्ट्रपति ट्रंप के सलाहकारों ने इस्तीफा देना शुरू कर दिया। अभी इलेक्टोरल कॉलेज में सिर्फ 12 वोटों का सर्टिफिकेशन हुआ था और हिंसा को देख कर ट्रंप के तीन सलाहकारों- स्टीफन ग्रीशम, सारा मैथ्यूज और रिक निकेटा ने इस्तीफा दे दिया। भारत में प्रधानमंत्री के सलाहकारों से इनकी तुलना करें। ट्रंप को सात करोड़ से ज्यादा वोट मिले हैं वे आगे भी प्रभावशाली बने रह सकते हैं, उन्होंने 2024 में फिर चुनाव लड़ने की इच्छा पहले जताई है, फिर भी इन सबकी परवाह किए बगैर सलाहकारों ने उनका साथ छोड़ा और उनकी आलोचना की।

अधिकारियों में एक अहम नाम टॉम बोसर्ट का, जिन्हें ट्रंप ने होमलैंड सिक्योरिटी एडवाइजर बनाया था। उन्होंने कैपिटल हिल में हुई हिंसा के लिए कहा कि यह सिर्फ गलत नहीं है, बल्कि गलत से भी आगे की चीज। उन्होंने इसे गरकानूनी बताते हुए कहा कि ट्रंप ने अमेरिकी लोकतंत्र की प्रतिष्ठा गिराई है। अमेरिका में राष्ट्रपति के बाद सबसे शक्तिशाली पद उसके चीफ ऑफ स्टाफ का होता है। ट्रंप के चीफ ऑफ स्टाफ रहे और अब भी राजदूत की भूमिका निभा रहे माइक मुलवनी ने ट्रंप के भाषण और हिंसा की आलोचना करते हुए कहा कि यह ट्रंप की जिम्मेदारी है कि वे लोगों को शांत कराएं और सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण सुनिश्चित करें। ट्रंप की कम्युनिकेशन डायरेक्टर रहीं अलीशा फराह ने पिछले ही महीने इस्तीफा दे दिया था और इस घटना के बाद उन्होंने भी ट्रंप की आलोचना की।

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