भाजपा विपक्ष में क्या कर रही है?

भारतीय जनता पार्टी देश के कई राज्यों में मुख्य विपक्षी पार्टी है और मजबूत भी है क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है और लौह पुरुष जैसे नेता का नेतृत्व उसके पास है। फिर भी विपक्ष के तौर पर भाजपा क्या कर रही है? कांग्रेस या दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों के विधायकों को तोड़ने की साजिश करने के अलावा मुख्य विपक्षी के तौर पर भाजपा कुछ कर रही है, इसकी मिसाल नहीं है। भाजपा किस राज्य में रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभा रही है? महाराष्ट्र में भाजपा संख्या के लिहाज से भी बहुत मजबूत है लेकिन क्या वह सरकार पर किसी तरह का दबाव बनाने में कामयाब हो रही है? दिल्ली में भाजपा के नेता कहते रहे थे कि कोरोना संकट के समय सरकार को काम करने देना चाहिए और सहयोग करना चाहिए लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा के नेता कोरोना के पीक समय में राज्य सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे! क्या यही मजबूत विपक्ष की निशानी है?

झारखंड में भारतीय जनता पार्टी बहुत मजबूत विपक्ष है। सरकार चला रही जेएमएम और भाजपा के बीच तीन सीटों का फर्क है। लेकिन भाजपा क्या कर रही है? क्या वह सरकार को अपने एजेंडे पर काम करने के लिए मजबूर कर सकती है? या क्या उसके विरोध से सरकार का एजेंडा बदल जाएगा? मजबूत विपक्षी पार्टी भाजपा के नेता राज्य के मुख्यमंत्री के खिलाफ महाराष्ट्र में सात-आठ साल पहले किसी युवती के यौन उत्पीड़न का आरोप लगा रहे हैं? क्या इस वजह से उसको मजबूत विपक्ष कहा जा सकता है? विपक्ष के तौर पर भाजपा का रचनात्मक एजेंडा क्या है वह उसने कभी नहीं बताया।

इसी तरह राजस्थान में भी भाजपा बहुत मजबूत है। लेकिन अपनी मजबूती का फायदा उठा कर उसने क्या किया? कांग्रेस को तोड़ कर अपनी सरकार बनाने की कोशिश? क्या इसी को मजबूत विपक्ष कहते हैं कि पूर्ण बहुमत की सरकार में तोड़-फोड़ करके अपनी सरकार बना ली जाए? अगर यह मजबूत विपक्ष की परिभाषा है तो फिर लोकतंत्र के लिए यह बड़े खतरे का संकेत है! लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष का मतलब होता है कि वह सरकार से सवाल पूछे, जनहित के मुद्दे उठाए, लोगों को जागरूक करे, संसद या विधानसभा में बहसों में हिस्सा ले, सरकार पर दबाव बनाए लेकिन भाजपा ने मजबूत विपक्ष की परिभाषा यह बना दी है कि सरकारी दल में तोड़-फोड़ करो, सरकार गिराओ, मुख्यमंत्री पर झूठे-सच्चे आरोप लगाओ!

दिल्ली की 70 सदस्यों की विधानसभा में भाजपा के आठ विधायक हैं। पिछली विधानसभा में सिर्फ तीन विधायक थे, तब भी अरविंद केजरीवाल की सरकार ने भाजपा को मुख्य विपक्षी पार्टी का दर्जा दिया, जिसे भाजपा ने सहर्ष स्वीकार किया और नेता प्रतिपक्ष के नाते उसके विधायक ने सारी सुविधाएं भी लीं। यह अलग बात है कि लोकसभा में 52 विधायक होने के बावजूद खुद भाजपा ने कांग्रेस को मुख्य विपक्षी पार्टी का दर्जा नहीं दिया। भाजपा के दिल्ली के विधायक हर दिन विधानसभा में हंगामा करते हैं, टेबल पर चढ़ जाते हैं, कागज फाड़ते हैं, धक्का-मुक्की करते हैं और मुख्यमंत्री को अनाप-शनाप बोलते हैं, क्या यहीं मजबूत विपक्ष की निशानी है?

हकीकत यह है कि विपक्ष में चाहे कांग्रेस रहे या भाजपा, किसी ने कोई बड़ी रचनात्मक भूमिका नहीं निभाई है और न कोई सार्थक आंदोलन खड़ा किया है। इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के विरोध में भी छात्रों ने आंदोलन किया और बाद में अराजनीतिक व्यक्ति जयप्रकाश नारायण ने उसका नेतृत्व किया। इसी तरह मनमोहन सिंह के राज के विरोध में अराजनीतिक लोगों अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल या बाबा रामदेव ने आंदोलन खड़ा किया। भाजपा के सारे मजबूत नेता उस समय सक्रिय थे लेकिन भाजपा ने मनमोहन सरकार के खिलाफ आंदोलन नहीं किया। भ्रष्टाचार के आरोप हों या निर्भया कांड जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालयों के छात्रों ने आंदोलन किया और बाद में दूसरे लोगों ने कमान संभाली। जिस तरह से 10 साल भाजपा चुपचाप बैठी रही थी या प्रतीकात्मक विरोध किया था वैसे ही आज कांग्रेस कर रही है। हां, छात्र, किसान या दूसरे लोग पहले की तरह ही आंदोलन कर रहे हैं लेकिन अब उनके आंदोलन को देशद्रोही ठहराया जा रहा है। यह भी कमजोर विपक्ष की नहीं, तानाशाह सरकार की निशानी है।

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