nayaindia कोरोना के बाद क्या-क्या बदलेगा? - Naya India
हरिशंकर व्यास कॉलम | गपशप| नया इंडिया|

कोरोना के बाद क्या-क्या बदलेगा?

कोरोना वायरस की महामारी को लेकर गंभीर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विमर्श के साथ साथ कुछ हल्की-फुल्की चर्चाएं भी चल रही हैं। सब अपने हिसाब से अंदाजा लगा रहे हैं कि कोरोना वायरस खत्म हो जाएगा या जब सब लोग इसके साथ जीना सीख जाएंगे तो जीवन कैसा होगा। इस बात से सब सहमत हैं कि दुनिया वैसी ही नहीं रहेगी, जैसे कोरोना के पहले थी।

भारत में भी कम से कम दो साल तक तो लोगों को लग रहा है कि उनकी आदतों में बदलाव होगा, सामाजिक व्यवहार बदलेगा, रिश्तों में बदलाव आएगा, लोगों का आर्थिक और खान-पान का व्यवहार बदलेगा, सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक व्यवहार भी बदलेगा। एक अलग किस्म की जीवनशैली विकसित होगी। हालांकि इस तरह की जीवनशैली अफोर्ड करना सबके वश की बात नहीं होगी।

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बहरहाल, अभी बीमारी से लड़ने के लिए जे छोटे-छोटे उपाय किए जा रहे हैं वे जीवन का स्थायी हिस्सा बनेंगे। जैसे लगातार हाथ धोते रहना और सैनिटाइजर का इस्तेमाल करना। बहुत समय नहीं बीता है, जब साबुन से हाथ धोना विलासिता होती थी। लेकिन धीरे धीरे मध्य और उच्च वर्ग के लोगों ने इसे जीवन का हिस्सा बनाया और अब संभव है कि और ज्यादा लोग इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। हालांकि एक बड़ी आबादी के लिए साबुन से हाथ धोना और सैनिटाइजर लगाना विलासिता ही होगी।

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अभी दुनिया भर के देशों में जहां रेस्तरां खुल रहे हैं वहां ह्यूमन इंटरैक्शन के बिना या ह्यूमन टच के बिना खाने की डिलीवरी पर विचार किया जा रहा है। रेस्तरां में जाने वाले लोगों के सिटिंग अरेंजमेंट को लेकर नए आइडियाज पर विचार हो रहा तो टेबल पर खाना सर्व करने के भी नए तरीके खोजे जा रहे हैं। भारत में भी देर-सबेर यह सब होगा। रेस्तरां से लेकर जरूरी सामान बेचने वाली दुकानों में भी बहुत कुछ बदला होगा। शारीरिक दूरी का ध्यान स्थायी रूप से रखा जाएगा। जो सामान खरीदने जाएंगे वे निश्चित दूरी रखेंगे और संभव है कि मास्क लंबे समय तक पहना जाता रहे। यह भी संभव है कि कोरोना के बाद ऑनलाइन डिलीवरी का बाजार तेजी से बढ़े।

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आपदा को अवसर बताने वाली सरकार के दो करीबी लोगो इस कारोबार में उतरने वाले हैं। रिलायंस समूह जियोमार्ट के नाम से और पतंजलि समूह वाले बड़े कारोबारी रामदेव ऑर्डरमी नाम से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तैयार कर रहे हैं। सो, तय मानें कि खरीद-बिक्री का पुराना तरीका बहुत बड़े पैमाने पर बदलेगा।

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यात्रा का तरीका भी बदल जाएगा। विशेष ट्रेनों में जो चीजें आज लागू की गई हैं वह स्थायी बन सकती हैं। लोग यात्रा करते समय कम सामान रखेंगे, दूरी का ध्यान रखेंगे, मास्क पहनेंगे और सैनिटाइजर का इस्तेमाल करेंगे। यह लंबे समय तक होगा। विमान यात्रा में भी इस तरह के बचाव के तमाम उपाय होंगे। यह भी सुझाव दिया जा रहा है कि विमानों में एयर होस्टेस को पीपीई किट्स पहनाया जाए, जिसे वे हर उड़ान के बाद बदलें। ऐसे कई अजीबोगरीब सुझाव आगे और दिए जाएंगे।

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नमस्ते स्थायी हो जाएगा। हाथ मिलाने की परंपरा धीरे धीरे खत्म होगी और गले मिलना तो पूरी तरह से बंद हो जाएगा। सोशल डिस्टेंसिंग का सिद्धांत मध्यवर्ग का खास तौर से शगल बनेगा। इससे सार्वजनिक जगहों पर व्यवहार सबसे ज्यादा बदलेगा। शादियों में भीड़भाड़ और बेवजह का धूमधड़ाका कम होगा। गहने, कपड़े का मोह कम हो सकता है क्योंकि जब सामाजिक समारोह कम होंगे और उनमें लोग कम आएंगे तो किसी दिखाने के लिए लोग महंगे कपड़े और गहने पहनेंगे। ऐसा हो तो अच्छा होगा, फिजूलखर्ची बंद होगी।

(आज ‘नया इंडिया’ की 11 वीं वर्षगांठ है। इसने आज अपने दस साल पूरे कर लिये हैं। आज गपसप की जगह पर कोरोना वाइरस की सही जानकरी के साथ। ताकि इस महामारी से होनी वाली मुश्किलों से आगाह करने का प्रयास )

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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